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रेवा सागर में नर्मदा नदी संगम तक समुद्र की रोमांचकारी यात्रा …

नर्मदा परिक्रमा भाग – 15

अक्षय नामदेव । 25 मार्च 2021 दिन गुरुवार तिथि एकादशी समय 1:00 बजे। नाव वाले ने आकर सूचना दी सभी परिक्रमा वासी अपना सामान लेकर समुद्र तट जल्दी चलें। नाव तट पर लग गई है। हम तो जैसे पहले से ही तैयार बैठे थे। हम सभी परिक्रमा वासियों ने जल्दी समान समेट लिया। भगवान विमलेश्वर एवं मां नर्मदा को शीश नवाया और नर्मदे हर के जयघोष के साथ हम समुद्र तट की ओर चल पड़े।

समुद्र के समीपी तट को देखने का यह पहला अवसर था। तेज धूप के बीच हम पैदल चलते रहे। वहां जहां नाव तत्पर खड़ी थी वहां जाने के लिए सड़क जैसी आकृति बनी थी। इस सड़क के दोनों ओर नमक के खेत थे। नमक उत्पादक किसान समुद्र के खाली जमीन पर खेत जैसा निर्माण कर देते हैं। जब ज्वार आता है और समुद्र का पानी तट की ओर बढ़ता है तब इन खाली खेतों में समुद्र का पानी भर जाता है तथा भाटा आने पर समुद्र का पानी नीचे चला जाता है। गहरे खेतों में जो पानी रह जाता है वही वाष्पीकरण के बाद नमक का रूप ले लेता है इस तरह परत दर परत नमक जम जाती है जिसे बाद में नमक उत्पादक किसान पत्थर की तरह खोदकर निकाल लेते हैं। यह प्रक्रिया चलती रहती है। और आगे चलने पर समुद्र की खाली जमीन पर बड़ी-बड़ी झाड़ियां उग आई है। नावों को तट की ओर लाने के लिए चौड़ी नहर जैसी गहरी आकृति बनी हुई है। जब ज्वार आता है तो इन्हीं नहरों में पानी भर जाता है और इन नहरों के सहारे नाव समुद्र की ओर जा पाती है। धार्मिक उत्साह और समुद्र में नाव में बैठने की उत्सुकता के उतार-चढ़ाव के बीच आखिर हम उस चौड़ी नहर तक पहुंच गए जहां ज्वार का पानी भरा हुआ था और हमारी नाव लगी हुई थी। वहां कि स्थानीय लोग इसे नावड़ी कह रहे थे जिसकी चौड़ाई 10 फीट और लंबाई लगभग 20 फीट की थी। इसी नावड़ीसे हमें रेवा सागर संगम पार करना था। नहर में खड़ी नाव तक जाने के लिए लकड़ी का पुल बनाया गया था जिसे पारकर नाव में बैठना था। मां नर्मदा का पावन स्मरण कर हम सभी परिक्रमा वासी एक करके नाव में बैठ गए। लगभग 40 परिक्रमा वासियों को नाव में लगी पटिया पर व्यवस्थित रूप से बैठाने के बाद नाव के सहायक ने नाव का इंजन स्टार्ट किया परंतु लीवर फिटना बैठने के कारण इंजन स्टार्ट नहीं हो रहा था। हम शांत बैठे रहे। तब दूसरे सहायक ने पास खड़ी नाव से लीवर लेकर आया और तब हमारे नाव की इंजन स्टार्ट हुई। अत्यंत काला धुआं फेंकते हुए फट फट की जोर आवाज करते हुए अब हमारी नाव आगे बढ़ने लगी। मुख्य नाविक एवं दो सहायक सहित नाव चलाने वाले तीन लोग थे।

हमारी नाव जैसे-जैसे आगे बढ़ने लगी, हम जोर जोर से नर्मदा मैया की जय, नर्मदा मैया की जय का जयघोष करने लगे। इस तरह समुद्र में नाव में सपरिवार बैठने का पहला अवसर था। इसके पहले कभी भेड़ाघाट एवं प्रयागराज में नाव में बैठकर नौकायन किया था जिसमें कम दूरी में भ्रमण के बावजूद लाइफ जैकेट अनिवार्य रूप से पहनाया गया था परंतु यहां समुद्री नाव में हमारा लाइफ जैकेट हमारी नर्मदा मैया ही थी। बेटी मैंकला काफी देर तक शांत मुद्रा में समुद्र की ओर देख रही थी। मैंने यूं ही बेटी से पूछ लिया बेटा डर तो नहीं लग रहा? नहीं पापा बिल्कुल नहीं,,।

अब हम समुद्र के तट को लगभग दो किलोमीटर पीछे छोड़ चुके थे और नहर समाप्त हो चुका था तथा नाव समुद्र में प्रवेश कर चुका था।

हम बीच-बीच में नर्मदा मैया की जय हनुमान की जय, धनपुर वाली दुर्गा मैया की जय का जयघोष करते जा रहे थे। क्यों ना करें जय घोष उनका? अब यह नैया उन्हीं की मर्जी होगी तो पार होगी,,।

दरअसल जिस समुद्र को हम रेवा सागर संगम का पौराणिक नाम देते हैं वह भूगोल में खंभात की खाड़ी या अरब सागर के नाम से प्रचलित है। हमें इसी अरब सागर (खंभात की खाड़ी) को लगभग 3 घंटे में पार करके नर्मदा नदी के उत्तर तट पर पहुंचना है। पहले आधे घंटे में हमारा स्वागत सुंदर साइबेरियन पक्षियों ने किया जो जल क्रीड़ा के साथ समुद्र में अपना शिकार ढूंढ रहे थे। वे हमारी नाव के आसपास बड़ी संख्या में मंडराने लगे। साथी परिक्रमा वासी अपने साथ रखा खाद्य फेंक फेंक कर उन साइबेरियन पक्षियों को देने लगे और काफी देर तक यही क्रम चलता रहा

हमारी नाव और गहराई की ओर चली जा रही थी। यदि आप धार्मिक आस्थावान व्यक्ति नहीं है तो निश्चित रूप से यह यात्रा अत्यंत डरावनी है परंतु आप तो आस्थावान हैं तभी तो मां नर्मदा की कठिन परिक्रमा में निकले हैं ।आपको तो पहले से पता है कि इस तरह नाव से आपको समुद्र पार करना है फिर डर का सवाल ही नहीं है।

हम अब आपस में चर्चा करते हुए भक्ति भाव के साथ मां रेवा सागर संगम को पार करते जा रहे हैं। यह यात्रा लगभग 30 किलोमीटर की है परंतु आप के पास मायलोमीटर थोड़ी है जो आप नापते रहे कि कितनी दूरी आ गए और कितनी दूरी बची है? मैं और मेरे साथी परिक्रमा वासी कल्पना अपने अपने मोबाइल से फोटो ग्राफी में मस्त थे। 25 मार्च 2021 को रेवा सागर संगम यात्रा के दौरान मैं कई बार फेसबुक लाइव रहा और अपने फेसबुक के मित्रों को इस आध्यात्मिक रोमांचित कर देने वाली समुद्र यात्रा का दर्शन कराता रहा। इस बीच नर्मदा मैया का जयघोष चलता रहा। इस बीच अपने दादा भाई का भी स्मरण आया जिन्होंने वर्ष 1982 के आसपास मां नर्मदा की परिक्रमा पैदल 3 साल 3 महीने 13 दिन में की थी। उन्होंने ही मुझे इस परिक्रमा में समुद्र यात्रा के बारे में बताया था। वे बताते थे कि उस समय पाल वाली नाव चलती थी जिसने नाविकों को चप्पू चलाना पड़ता था। कई बार हवा विपरीत दिशा में चलने से नाव कई किलोमीटर पीछे धकेल दी जाती थी इस तरह समुद्र पार करने में दो ढाई दिन भी लग जाते थे परंतु आज हम जिस नाव में जा रहे हैं वह डीजल इंजन से चल रही है।

लगभग डेढ़ घंटे लगातार हमारी नाव चलने के बाद नाविक ने आवाज लगाई कि यहीं वह जगह है जहां नर्मदा मैया आकर समुद्र में मिली है,! वहां पर समुद्र का जल बिल्कुल मटमैला था।हमने बीच समुद्र में माता नर्मदा को प्रणाम किया। माई की बगिया अमरकंटक से जो जल पात्र में रखा था उसमें से कुछ जल रेवा सागर संगम में अर्पित किया। निरुपमा ने चुनरी चढ़ाई, पुष्प अर्पित किया तथा मैंने समुद्र को भेंट किया जाने वाला वस्त्र समुद्र में स्पर्श कराकर नाविक को देकर दक्षिणा दी उन्हें प्रणाम किया। जो हमें पार लगाए वही तो सब कुछ है ना,,। यही तो हमारे सनातन धर्म की परंपरा है। हम आस्थावान हैं। यही भारत वर्ष की विशेषता है।” इतनी ममता नदियों को भी यहां माता कह कर बुलाते हैं, इतना आदर इंसान तो क्या पत्थर भी पूजे जाते हैं ” ।

नाविक ने रेवा सागर संगम का जल झुक झुक कर एक जेरीकेन से निकालता और परिक्रमा वासियों के पात्र में डालता जा रहा था। मां नर्मदा की भक्ति एवं आस्था में हम बिल्कुल निर्भय हो माता की गोद में अठखेलियां ले रहे थे। दूर-दूर तक सिर्फ पानी ही पानी नजर आ रहा था ।तट का कोई नामोनिशान नहीं दिख रहा था। गहराई कितनी होगी इस पर भी कोई विचार मन में ना आया, उस समय जब हम आस्था के ज्वार में डूबे हुए थे।

सूरज सिर पर था उसकी तेज धूप समुद्र के जल में पड़ कर ऐसे दिख रही थी मानो समुद्र में चांदी की चटाई यहां से वहां तक बिछी हुई हो।

हमारी नाव यात्रा आगे बढ़ती जा रही थी। इतने बड़े समुद्र में हमें कोई जलपोत, कोई ना कोई जहाज देखने को नहीं मिला। लगभग ढाई घंटे के बाद अब हमें उत्तर की ओर समुद्र के भीतर कुछ संयंत्र दिखने लगे थे । यह तेल शोधन संयंत्र थे जो यह एहसास करा रहे थे कि अब उत्तर तट समीप है परंतु जिसे हम समीप मान रहे थे वह दूर ही था मृग मरीचिका की तरह। पूरे 3 घंटे की यात्रा के बाद हमारी नाव रेवा सागर संगम अर्थात खंभात की खाड़ी के उत्तर तट पर पहुंची। समय 4:00 बजे थे।वहां उस समय ज्वार की स्थिति बनी हुई थी इसलिए हमारी नाव वहां खड़ी हुई जहां बड़े जलपोत खड़े होते हैं। हम नाव से पक्की सीढ़ी पर चढ़ गए और पुल के द्वारा समुद्र तट पर पहुंच गए। यह दहेज घाट है जिसे मीठी तलाई कहते हैं।नाविक कह रहा था कि यदि यहां तट पर ज्वार की स्थिति ना बनती तो घुटने भर कीचड़ पर चलकर समुद्र के किनारे पहुंचना पड़ता। हमने रेवा सागर संगम को उत्तर तट से फिर एक बार प्रणाम किया। कृतज्ञता भरी दृष्टि से देखते हुए नाविकों का अभिवादन किया।

मां नर्मदा की जय बोलते हम समुद्र में बने पुल से बाहर ही निकले थे कि तट पर ही परिक्रमा वासियों की सेवा करने की ललक के साथ 10_ 15 लोगों का एक दल खड़ा था। वहां धूप तेज थी कोई छांववाली जगह नहीं थी फिर भी वे नाव का इंतजार कर रहे थे। वे हम लोगों से आग्रह करने लगे कि कुछ चाय पानी और खिचड़ी की व्यवस्था करके वे रखे हैं। आप सभी रुक का ग्रहण कर लीजिए। कुछ आंशिक वाले वृक्ष जो समुद्र तट मे पाए जाते हैं वहां उन्होंने हमें रोक कर मुंह हाथ धूलाया और सामा की बनी खिचड़ी प्रसाद तथा चाय पानी ग्रहण कराया। उनसे पूछने पर बस उन्होंने इतना ही बताया कि हम पास के गांव के हैं परिक्रमा वासियों की सेवा के लिए हमने समिति बनाई है उसी के माध्यम से हम यह सेवा कार्य करते हैं। उनकी यह सेवा भावना हमें प्रभावित किए बगैर नहीं रह सकी। इधर हमारी गाड़ियां लगभग 1 घंटे बाद दक्षिण तट के अंकलेश्वर से उत्तर तट के भरूच के बीच बने गोल्डन ब्रिज पार कर मीठी तलाई में आ गई थी और हम मीठी तलाई से मां नर्मदा की उत्तर तट की यात्रा प्रारंभ कर आगे बढ़ गए।

हर हर नर्मदे।

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