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परिक्रमा रास्ते में फाल्गुनी बयार और मालवा क्षेत्र का प्रसिद्ध भगोरिया मेला …

नर्मदा परिक्रमा भाग- 21

अक्षय नामदेव। 28 मार्च 2021 रविवार फाल्गुन पूर्णिमा होलिका दहन के दिन हम मंडलेश्वर से आगे परिक्रमा के लिए रवाना हुए। कोरोनावायरस 19 के प्रकोप के कारण नर्मदा तटीय नगरों में पुलिस विशेष रुप से सक्रिय दिखाई दे रही थी। रास्ते में अनेक स्थानों पर पुलिस बैरिकेड लगाकर वाहनों की चेकिंग मास्क, सीट बेल्ट इत्यादि के नाम पर जांच कर रही थी फिर भी परिक्रमा वासियों के लिए उनका रुख कुछ नरम ही दिखाई पड़ा। अनेक नगरों में लॉकडाउन के कारण बाजार बंद था परंतु नर्मदा घाटों में रौनक कम नहीं हुई थी।

हम पथराड, कोठावा, कुंडी, बड़ेल के रास्ते आगे बढे जा रहे थे कि अचानक एक गांव में हमें मेला जैसा दृश्य दिखाई दिया। मुख्य मार्ग में गांव के शुरू में ही मोटरसाइकिल स्टैंड बनाया गया था जिसमें सैकड़ों मोटरसाइकिल कतार बद्ध खड़ी थी तथा उतनी ही बेतरतीबी से रास्ते में भी खड़ी थी। मुख्य मार्ग में मेले जैसी भीड़ थी। सैकड़ों दुकानें जिसमें मनिहारी, सौंदर्य प्रसाधन, कपड़े, मिठाइयां, खिलौने, रंग गुलाल और यह सब कुछ जो मेले में बिकता है सजी हुई थी। इन दुकानों में उंगली भीड़ का क्या कहना। दुकानदार की जैसे लॉटरी खुली हुई थी। हमने एक जगह रुक कर पूछा यह कौन सा बाजार है? जवाब मिला बाजार नहीं, भगोरिया मेला है।

अरे,, मैं तो भूल ही गया था कि आज होलिका दहन है और होलिका दहन के काफी पहले से मालवा अंचल में भगोरिया पर्व की धूम मच जाती है। भगोरिया मालवा अंचल खासकर नर्मदा तट के दोनों ओर रहने वाले आदिवासियों का प्रमुख त्यौहार है। यह खास फागुन महीने में होली का डांग गड़ने के बाद मेले की शक्ल में मनाया जाता है जिसमें हाट बाजार मेले की शक्ल ले लेते हैं और आदिवासी समाज के युवक युवतियां सज धज कर अपने अभिभावकों के साथ भगोरिया मेले में होली त्यौहार से संबंधित सामग्री के अलावा गणगौर पूजा के बाद होने वाली शादियों के सामान खरीद लेते हैं। इस लिहाज से भगोरिया पर्व का जितना महत्व आदिवासी समाज के लिए है उससे ज्यादा महत्त्व मालवा अंचल धार झाबुआ अलीराजपुर खरगोन बड़वानी अंचल में रहने वाले व्यापारियों के लिए है क्योंकि वर्ष भर में जितनी खरीदी आदिवासी समाज के लोग नहीं करते उससे ज्यादा खरीदी भगोरिया मेले में करते हैं इसलिए इस मेले में व्यापारी विशेष तैयारी के साथ पहुंचते हैं।

फागुन महीने में जब बसंती बयार बहने लगती है तब आयोजित होने वाले इस मेले का इंतजार इस मालवा अंचल के आदिवासी युवक युवतियां करते हैं तथा पूरी तैयारी के साथ भगोरिया मेला पहुंचते हैं। समय के साथ भगोरिया मेले का स्वरूप बदल गया है। इस भगोरिया मेले को लेकर समाज में कुछ भ्रांतियां भी थी उन भ्रांतियों को दूर करने का काम आदिवासी समाज के अग्रणी लोगों ने किया है।

आज से लगभग 30 वर्ष पूर्व भगोरिया मेला मालवा अंचल के आदिवासियों का प्रणय पर्व माना जाता था अर्थात इस मेले में पहुंचकर युवक युवतियां अपने पसंद के जीवन साथी का चुनाव करते थे परंतु यह गुजरे जमाने की बात है । आदिवासी समाज वर्तमान में शिक्षा पर विशेष ध्यान दे रहा है। समाज की नई पीढ़ी रूढ़िवादिता एवं परंपराओं के नाम पर जो बाधाएं थी उन बाधाओं को पार कर शिक्षा से जुड़कर समाज की मुख्यधारा में आ रहे हैं। अपनी नर्मदा परिक्रमा के दौरान हमने यह पाया है कि समय के साथ मालवा अंचल का आदिवासी समाज प्रगति के पथ पर अग्रसर है। पूरी परिक्रमा के दौरान हमें गांव गांव स्कूल, कॉलेज, छात्रावास मिले हैं जिससे आदिवासी समाज में शिक्षा का प्रचार प्रसार हुआ है। इसके बावजूद आदिवासी समाज में होलिका दहन के पूर्व तक आयोजित होने वाले इस भगोरिया मेला की परंपरा कायम है और यही कारण है कि आदिवासी समाज इस मेले में बढ़-चढ़कर भाग लेता है। भगोरिया मेला के बारे में पहले पढ़ा था खासकर होली के अवसर पर छपने वाले विशेषांक में भगोरिया पर्व से संबंधित आलेख अवश्य होते थे। यह संयोग ही है कि आज हम जब नर्मदा परिक्रमा मार्ग में हैं और आज  होलिका दहन है तब हम साक्षात भगोरिया मेला का दर्शन कर पा रहे हैं। हम मेले से दूर आगे जाते जा रहे थे और रास्ते भर हमें सजे धजे ग्रामीण युवक युक्तियां मिले जो मेले की ओर आ रहे थे।

 

                         हर हर नर्मदे

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