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कभी पानी में डूबे हुए राजघाट का मंदिर अब खंडहर लगने लगा है, सरदार सरोवर बांध का साइड इफेक्ट …

 

नर्मदा परिक्रमा भाग- 12

 

अक्षय नामदेव पानसेमल मेंद्राणा के राधा कृष्ण धाम से 24 मार्च 2021 को हमारी यात्रा आगे शुरू हुई। यहां से कुछ आगे से ही महाराष्ट्र की सीमा शुरू हो जाती है तथा दुकानों के साइन बोर्ड में मराठी भाषा का प्रचलन शुरू हो जाता है। मराठी भाषी साइन बोर्ड को देखकर मैं विचार मगन हो गया कि हमारे भारत में क्षेत्रवाद ,भाषावाद कितना अधिक हावी है वही जब हम विकास की बात करते हैं तो क्षेत्रवाद और  भाषावाद से परे जाकर बलिदान मांगते हैं। कल 23 मार्च 2021 को तेली भाटियान घाट का दर्शन कर बड़वानी जिले के ही एक और घाट राजघाट का दर्शन करने गए थे तब वहां का मंजर देखकर मेरा दिल दहल गया था।

दरअसल कभी खूबसूरत रहा बड़वानी नर्मदा तट का राजघाट नर्मदा घाटी विकास परियोजना की भेंट चढ़ चुका है। राजघाट गुजरात में बने सरदार सरोवर बांध परियोजना के डूब क्षेत्र में है। अभी मार्च के महीने में हम वहां तक इसलिए पहुंच पाए क्योंकि सरदार सरोवर बांध का पानी उपयोग होने के कारण वहां पानी कम हुआ है और राजघाट में जो मंदिर डूबे हुए थे वह अब खंडहर इस स्थिति में बाहर हैं। नर्मदा तट स्थित राजघाट का धार्मिक महत्व का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि बांध का पानी कम होने के बाद धार्मिक आस्था से जुड़े लोग वहां बराबर पहुंच रहे हैं तथा पानी के डुबान के कारण खंडहर हो चुके मंदिरों में अपने भगवान को ढूंढ रहे हैं। डुबान क्षेत्र के कारण जमीन दलदली एवं उबड़ खाबड़ हो चुकी है इसके बावजूद वहां पूजा सामग्रियों की दुकानें सज चुकी हैं हालांकि डुबान के कारण वहां स्थित पेड़ सूख चुके हैं। राजघाट से शहर जाने वाली सड़क लंबी दूरी तक बरसात के समय पूरी तरह डूब जाते हैं इसलिए डुबान क्षेत्र में व्यवसायिक पैमाने पर ईट का भी निर्माण चल रहा है।पहले जो मकान थे वे खंडहर हो चुके हैं। कुछ लोगों ने अपने मकान उजाड़ दरवाजा फाटक लकड़ी ले गए और कुछ लोगों ने अपने उस पुराने घर की यादों को भावना से जोड़ते हुए उसे वैसे ही रहने दिया है,,! भले ही सरकार ने उन्हें वहां से विस्थापित कर उनका पुनर्वास कर दिया हो परंतु उन लोगों की भावनाओं का क्या हुआ? उनकी भावनाएं विकास की बलिवेदी पर भेंट चढ़ा दी गई ना,,।

आज हम जिस मां नर्मदा की परिक्रमा पर है और हम से पहले  लाखों-करोड़ों साधु सन्यासी, नर नारी इस मां नर्मदा की परिक्रमा कर चुके हैं तथा आगे भी करते रहेंगे उस मां नर्मदा के सैकड़ों घाट तीर्थ स्थल सरदार सरोवर बांध सहित मध्यप्रदेश में नर्मदा सागर बांध, 28 मध्यमवर्गीय बांध एवं 3000 जल परियोजनाओं के निर्माण के कारण डूब चुके हैं। मतलब विकास की होड़ में हमारी धार्मिक आस्था के तट डूबा दिए गए। नर्मदा घाटी विकास परियोजना एवं सरदार सरोवर बांध के बारे में बचपन से सुनता आता था परंतु उसकी भयावहता एवं दुष्परिणाम के बारे में ठीक ठीक अब महसूस हुआ। महसूस हुआ कि कैसे गुजरात राजस्थान को सिंचाई के लिए जल देने के लिए मध्य प्रदेश के लगभग ढाई सौ से भी ज्यादा गांव डूबा दिए गए और 1 लाख से ज्यादा लोग इन गांव से विस्थापित कर दिए गए और ढाई लाख लोगों का पुनर्वास किया गया।कितना दर्द सहा होगा उन लोगों ने ?  बताते हैं कि सरदार सरोवर बांध की परिकल्पना आजादी के पहले से ही कर ली गई थी जिसका उद्घाटन 1965 में जवाहरलाल नेहरू ने किया था। शुरुआती सर्वे में इस बांध की ऊंचाई 98 मीटर तथा बाद में 121 मीटर रखी गई और 2002 के आते-आते इस बांध की ऊंचाई 138 मीटर कर दी गई। नींव सहित इसकी ऊंचाई 163 मीटर है।

सरदार सरोवर बांध के निर्माण के पीछे तर्क दिया गया था कि इससे गुजरात एवं राजस्थान के सूखाग्रस्त इलाके में सिंचाई एवं पेयजल की सुविधा होगी तथा मध्य प्रदेश को बिजली प्रदान की जाएगी परंतु इससे मध्य प्रदेश की जितनी बड़ी आबादी एवं भूभाग डुबान में प्रभावित हो रहा था उसे देखते हुए इस बांध के निर्माण के विरुद्ध बड़े-बड़े जन आंदोलन हुए जिसकी शुरुआत वर्ष 1989 से ही हो गई थी। कल मैं जिस डुबान वाले बड़वानी के  राजघाट में खड़ा था उसी राजघाट से वर्ष 1990 में हुए नर्मदा बचाओ आंदोलन के 6000 लोगों ने पदयात्रा करते हुए गुजरात के मुख्यमंत्री को ज्ञापन सौंपा था तथा सरदार सरोवर बांध का विरोध किया था। इसी सरदार सरोवर बांध के विरोध में 1994 से लेकर 1998 तक लगातार जन आंदोलन हुए। हरसूद और छनेरा जैसे नर्मदा तट के गांव बाबा आमटे , मेधा पाटकर तथाअरुंधति राय के जन आंदोलन का केंद्र बिंदु थी जिन्होंने यहां डूब में आने वाले लाखों लोगों के लिए पुनर्वास इत्यादि के लिए जन आंदोलन खड़ा किया। लगातार जन आंदोलनों , सुप्रीम कोर्ट की दखल से होता हुआ 94 करोड़ के प्रारंभिक बजट से प्रारंभ यह बांध अंत में 65 हजार करोड़ की राशि से पूर्ण हुआ जिसका उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 17 सितंबर 2017 को किया। 30 विशाल फाटक वाले इस 138 मीटर ऊंचे बांध में एक फाटक का वजन 450 टन है बांध में 4.73मिलियन क्यूसेक जल धारण क्षमता है

इतने बड़े जल क्षेत्र के भराव के कारण स्वभाविक रूप से मध्य प्रदेश में नर्मदा नदी के तट के ढाई सौ से ज्यादा गांव के लाखों लोगों का नुकसान हुआ है उन्हें विस्थापन एवं पुनर्वास का दंश भोगना पड़ा है और अभी भी भोग रहे हैं। नर्मदा तट की हमारी संस्कृति और हमारी विरासत को जो क्षति पहुंची है उसकी प्रतिपूर्ति किसी भी तरह से संभव नहीं है।

जब मैं राजघाट बड़वानी की बात कर रहा हूं तब मुझे स्वाभाविक रूप से प्रख्यात लेखक एवं साहित्यकार बड़े भैया प्रतिभू बनर्जी विद्यानगर पेंड्रा का वह लेख याद आ रहा है जो नर्मदा घाटी विकास परियोजना से नर्मदा तट के घाटों के विलुप्त होने को लेकर है जिसमें उन्होंने नर्मदा घाटी विकास परियोजना को स्मृति ध्वंस  परियोजना बताते हुए नर्मदा नदी की जैव विविधता पर मंडराते खतरे एवं आने वाले समय में नर्मदा नदी के अस्तित्व पर चिंता व्यक्त की है। उन्होंने ओमकारेश्वर के पास के धावड़ी कुंड जहां प्राकृतिक रूप से नर्मदेश्वर शिवलिंग का निर्माण होता था उस पौराणिक कुंड के नष्ट होने पर दुख जाहिर किया है। इसी तरह बरगी बांध के बनने के पहले जबलपुर के पास नांदिया घाट, लुकेश्वर तीर्थ, नंदीकेश्वर तीर्थ, और छोलिया घाट स्थित है जो अब डूब में आने के कारण विलुप्त हो चुके हैं। इसी तरह उन्होंने उस लेख में मंडला के ठाठी घाट, पद्मिनी घाट और महोदय संगम जैसे प्रमुख तीर्थ स्थलों के विलुप्त होने का जिक्र किया है। राजघाट बड़वानी के डूबे हुए तट को देखकर मेरा भी रोम रोम कांप उठा था। मैं नर्मदा नदी में बने नर्मदा घाटी विकास परियोजना के सरदार सरोवर बांध एवं अन्य परियोजनाओं के बारे में सोचते हुए मौन साधना में था कि अचानक मैंकला बेटी ने जैसे मुझे जगाया कहा पापा हम प्रकाशा पहुंच गए।

 

नर्मदे हर !                                                क्रमश:

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