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नर्मदा नदी का दक्षिण तट सांडिया घाट त्यागी महाराज का आश्रम जहां उत्तर से दक्षिण तट देखते बनता है …

नर्मदा परिक्रमा भाग-25

अक्षय नामदेव। 29 मार्च 2021 होली का दिन ऐसे में मां की याद ना आए ऐसा तो संभव नहीं ।

सुबह नेमावर से निकलते समय मैंने मैं कला से कहा था बेटी होली के दिन मां के हाथ से बनाया गया गुझिया पपड़ी और दही बड़ा याद है ना ? होली में आगंतुकों के लिए मां की तैयारियां कैसी रहती थी मैं और मैं कला इस पर बहुत देर तक चर्चा करते रहे।

नेमावर से निकलकर आज दिन भर हम नर्मदा तट के अनेक पवित्र घाटों का दर्शन पूजन किए। अब संध्या हो रही थी तथा हमें किसी उचित स्थान पर रुक कर अब विश्राम करना था। हम आगे बढ़े ही जा रहे थे कि अचानक एक लंबा पुल सामने आया और हम रुक गए। अरे यह तो मां नर्मदा है! हमें इसे पार नहीं करना है।

पुल के दाहिनी ओर बोर्ड टंगा था ” मांगरोल रामनगर जिला रायसेन”।

हम नर्मदा नदी पर बने पुल के पास खड़े होकर यहीं कहीं रुकने का विचार करने लगे। तभी हमारी नजर पुल के उस ओर दक्षिण तट पर गई,,। और अनायास मुंह से निकला,,,। गुरु वह तो वही जगह है जहां हम 21 मार्च को मुरारी दास ( सीताराम बाबा)के सांडिया घाट आश्रम में रुके थे। तिवारी भी ने आश्चर्य मिश्रित मुस्कान के साथ हां में हां मिलाया।

दरअसल दक्षिण तट की यात्रा के दौरान हम मुरारी दास यानी सीताराम बाबा सांडिया घाट के आश्रम रुक कर नर्मदा की आरती में भाग लिए थे औरभोजन प्रसाद किया था तथा उन्हीं के कहने पर हम त्यागी महाराज के आश्रम में रुके थे। जब हम सांडिया घाट से रवाना हुए थे तब सीताराम बाबा ने हमारा नंबर लिया था और अपना नंबर देते हुए कहा था कि जब आप उत्तर तट की यात्रा में आए तब मुझे फोन करना।मैं उत्तर तट आकर आपसे मुलाकात जरूर करूंगा और संयोग देखिए कि हम सांडिया घाट के उत्तर में खड़े हैं।

मैंने सीताराम बाबा को फोन लगाया। जय सीताराम बाबा। वह मेरी आवाज तुरंत पहचान गए। बाबा ने जवाब दिया -जय सीताराम पूछा- कहां हो?

मैंने कहा आपके आश्रम के सामने पुल पार हम उत्तर तट पर खड़े हैं! अच्छा मैं अभी आता हूं बाबा ने कहा। पांच मिनट के भीतर किसी भक्त की मोटरसाइकिल में बैठकर बाबा हमारे पास आ गए। मैंने बाबा का चरण स्पर्श किया।

बाबा ने पूछा कैसी चल रही परिक्रमा? हमने कहा मां नर्मदा की कृपा से सब कुशल मंगल है। बाबा बोले आज यही विश्राम करो। बाबा इसीलिए आप को फोन किया है। बाबा नर्मदा तट पर पास की एक जगह हमें रुकने के लिए दिखाए और बोले यही रुकना ठीक है। हमें भी बाबा की सलाह ठीक लगी। बाबा ने कहा अच्छा यहीं रहो ,मैं चलता हूं आरती का समय हो रहा है।

मांगरोल रामनगर में सीताराम बाबा ने हमें जो स्थान रुकने के लिए दिखाया वह स्थान एक बड़ा हाल था जो कथा वाचक महाराज कमलेश मुरारी का है जिसकी देखरेख में एक वृद्ध दंपत्ति हैं। दोनों ही अत्यंत धार्मिक एवं दयालु स्वभाव के जान पड़े।दरअसल उस वृद्ध माता के मातृत्व भाव ने हीं हमें वहां आकर्षित किया और हम वहां रुकने के लिए तैयार हुए। थोड़ा परिचय के बाद अब वे हमारी अम्मा थी और वृद्ध हमारे बाबूजी। हमने उस बड़े हाल में हम अपना सामान रख अपनी चटाईयां बिछा दी और बैठ गए। अम्मा ने हमें चाय पिलायीऔर कहा कि यदि घाट दर्शन करने जाना है तो जल्दी जाओ, अंधेरा हो रहा है। अम्मा जी, कहकर मैं निरुपमा और मैं कला अपने जरूरी सामान लेकर नर्मदा नदी की ओर चले गए। तिवारी तट पर ही रुक गए।

संध्या और गहरा रही थी इसलिए हमने टॉर्च भी रख ली थी। हम पुल के नीचे सीढ़ियों से उतरे और रेत पर चलते हुए बहते जल की ओर जा रहे थे। मैं वहां तट पर अंधेरे में ही सब्जी की रखवाली करने वाले किसान से आवाज लगाकर पूछा, भैया हम परिक्रमा वासी हैं कहां नहाना उचित होगा? उसने अपनी क्षेत्रीय भाषा में कहा, बाबूजी फिकर ना करो। यहां पानी बिल्कुल कम है आराम से नहा लो। नियम भी यही है कि पहली बार यदि आप किसी जल के स्रोत में स्नान के लिए जा रहे हैं तो उसकी गहराई इत्यादि का अंदाजा होना चाहिए। जानकारों से पूछने में क्या बुराई है?

रंगोत्सव की शाम हमने नर्मदा में जीभर स्नान किया। मैं कला तो नहाने में इतनी मगन थी कि पानी से बाहर आने को ही तैयार नहीं थी। सुबह फिर स्नान करने आ जाएंगे। ऐसा विश्वास दिलाने के बाद ही वह बाहर निकली। तब तक निरुपमा मां नर्मदा में पूजन अर्चन करने में लग गई थी। हम बाहर आए और हमने भी मां नर्मदा की आराधना की। दीपदान किया तथा दूर तक जाते दीपों को देखते रहे। प्रार्थना की मां ऐसे ही हमें बुलाते रहना।

यहां दीपदान के बाद हम वापस तट पर आ गए। देखा तिवारी तट पर खड़े होकर दक्षिण तट सांडिया आश्रम में हो रही नर्मदा आरती का दर्शन लाभ ले रहे थे। हम भी वहीं खड़े होकर सीताराम बाबा की नर्मदा आरती का दूरदर्शन करते रहे। उसके बाद हमने तट पर ही गोल बाबा की कुटिया में स्थित समाधि में दीप जलाया तथा हम सब वापस अम्मा बाबूजी के पास पहुंचे। वे हमारा इंतजार ही कर रहे थे। उन्होंने मां नर्मदा की आरती की। हम सब उस में सम्मिलित हुए। जिस हाल में हम रुके थे वही मां नर्मदा विराजमान है।

अम्मा ने हमें पेड़े का प्रसाद खिलाया। ऐसा पेड़ा कि मुंह में खाते ही घुल गया! फिर वह पपड़ी और रसगुल्ला प्लेट में लेकर आ गई। सबको खूब प्यार से खिलाया। मैंने पेड़े की तारीफ की तो मुझे और पेड़े लाकर दे दिए। फिर वह भोजन की तैयारी में जुट गई। निरुपमा साथ रखा राशन का सामान निकालकर रसोई में रख दिया और और मैं कला के साथ भोजन बनाने में अम्मा का सहयोग करने लगी।

तिवारी भी सब्जी काटने में सहयोग देने लगे और मैं चटाई में लेट कर बाबू से बात करने लगा। बाबू ने बताया यहां से 12 किलोमीटर पिपरिया के पास हमारा गांव है खापरखेड़ा । यह मेरा सुना हुआ नाम था। मैं बाबूजी से कहने लगा बाबूजी हमारे देशबंधु वाले बाबू भी खापरखेड़ा के रहने वाले थे। उन्होंने कहा कौन? मैंने कहा मायाराम सुरजन जी। अरे उन्हें कौन नहीं जानता? बाबू बोले।वह हमारे गांव के प्रतिष्ठित परिवार के हैं परंतु लंबे समय से वह बाहर रहे। काफी समय हुआ इस दुनिया में नहीं रहे।बड़े ईमानदार पत्रकार रहे। कभी-कभी खापरखेड़ा आते थे। बाबूजी के मुंह से मायाराम सुरजन जिन्हें हम बाबूजी कहते थे तारीफ सुनकर बहुत अच्छा लगा।

अचानक अम्मा ने बाबूजी को आवाज लगाकर किसी काम में लगा दिया और मैं

मां नर्मदा की महिमा के बारे में सोचने लगा। आज होली है और मैं सुबह मां को याद करते हुए गुझिया पपड़ी की बात कर रहा था ,,, और शाम को नर्मदा तट पर वही सब मिल रहा है!कौन ऐसा होगा जो अनजानों को पेड़ा ,रसगुल्ला पपड़ी खिलाएगा? यह माताजी नर्मदा का ही तो रूप है ।

कुछ देर लेटे लेटे झपकी सी आ गई और मैं कला ने जगाया पापा खाना खा लो,, देखा तो चूल्हे के पास वही माताजी रोटी बेल रही थी और निरुपमा मिट्टी के बर्तन(कल्लो) में रोटी सेंक रही थी। भोजन बनाने का कार्य पूर्ण हो चुका था और हम सभी भोजन करने की तैयारी करने लगे। दाल, चावल, रोटी सब्जी। अम्मा थाली लगाने लगी और एक-एक करके हम सबके सामने रखने लगी। ऐसा लगा मां अन्नपूर्णा स्वयं नर्मदा तट में आकर हमें भोजन परोस रही हैं।

हम सब ने भर के भोजन किया। दिन भर धूप में भ्रमण हम थक तो गए ही थे हम सोने की कोशिश करने लगे और उधर निरुपमा और अम्माजी भोजन करते हुए बात कर रही थी। इनकी बातों के बीच में बाद हमें जल्दी ही नींद आ गई।

सुबह नींद खुली तो देखा अम्माजी हाल की साफ सफाई कर रही हैं। आवाज सुनकर हम भी अपनी चटाई से उठकर बैठ गए।

नर्मदे हर अम्माजी। नर्मदे हर बेटा। नींद अच्छी आई। हां अम्मा अच्छी नींद आई। चलो मुखारी कुल्ला कर लो मैं चाय बना रही हूं। अम्मा रोज इस हाल की इतनी ही सफाई करती हो? थक जाती होगी।

जे हमाओ रोज के काम आओ। अम्मा ने अपने क्षेत्र की बोली में कहा। फिर बताने लगी कि अभी तो कुछ नहीं है बरसात में जब बाढ़ आती है तो इसी हाल में घुटने घुटने तक कीचड़ भर जाता है। हम यह जगह छोड़ कर चले जाते हैं। इस साल हाल की सफाई कराने में तीन हजार रुपए लगे थे। हम लोगों ने जो मेहनत की थी सो अलग। अम्मा ने बातों ही बातों में बारिश के समय नर्मदा तटीय क्षेत्रों में बाढ़ की समस्या के कारण उत्पन्न होने वाली परिस्थिति का विवरण रख दिया था। दैनिक क्रिया से निवृत्त होकर हमने अम्मा के हाथों से बनी चाय पी फिर शाम को मैं कला से किए वादे के अनुसार उसके साथ स्नान करने नर्मदा चले गए।

नर्मदा तट में सुबह का नजारा अलग था और रात्रि का अलग। अब हम वहां से चारों तरफ स्पष्ट देख पा रहे थे। दक्षिण तट का सांडिया घाट, त्यागी महाराज का आश्रम उत्तर तट एवं दक्षिण तट को जोड़ने वाला ऊंचा पुल सब कुछ हमें दिखाई दे रहा था। हम वहां देर तक स्नान करते रहे। यहां नर्मदा का जल दूर तक घुटने तक ही है। नर्मदा नदी के भीतर बैठकर भी आप आराम से स्नान कर सकते हैं। जमीन पकड़कर तैरने का नाटक भी कर सकते हैं। मैं और मैं कला यह नाटक देर तक करते रहे और तट पर खड़ी निरुपमा हम पर शब्द बाण चलाती रही।

काफी शब्द बाण सहने के बाद हम नदी से बाहर निकले और कपड़े बदल कर मां नर्मदा का पूजन अर्चन किया। तट पर गोल बाबा की कुटिया में जाकर उनकी समाधि का दर्शन किया तथा वापस अम्मा के पास पहुंच गए। अम्मा अपने गायों को सामने वाले खेत में बांध कर रखती हैं सो उन्हें चारा खिलाने गई थी। लौट कर आई तब तक हम जाने के लिए तैयार हो गए थे। उन्होंने हमें फिर से चाय पिलाई। हम अम्मा से जाने की आज्ञा मांगने लगे तो अम्मा कहने लगी भैया दो-चार दिन रुक जाओ,,।

मन तो हमारा कह रहा था कि हम महीने भर यही अम्मा के पास रुक जाएं और यहां रोज नर्मदा तट का आनंद लें, परंतु हमें आगे बढ़ना था। अम्मा रूंआसी होने लगी। हम अपना सामान समेट अम्मा और बाबू को कुछ द्रव्य दे कर चरण स्पर्श किया और आगे बढ़ने की अनुमति मांगी। देखा अम्मा और बाबूजी की आंखों में प्रेमांश्रु थे। उनका प्रेम देखकर हमारी आंखें भी छलछला गई। भैया फिर आना कह कर वह अपने आंचल से अपनी आंखों में छलक आए आंसुओं को पोंछने लगी। भरे ह्रदय से हमने उनसे फिर मिलने का वादा कर विदा लिया।

 

 हर हर नर्मदे

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