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नर्मदापुरम का सेठानी घाट जहां अठखेलियां ले रहीं हैं मां नर्मदा …

नर्मदा परिक्रमा भाग- 8

 

अक्षय नामदेव। त्यागी महाराज सांडिया घाट पिपरिया जिला होशंगाबाद से 22 मार्च 2021 दिन सोमवार को रवाना होने के बाद हम दोपहर लगभग 12 बजे होशंगाबाद पहुंचे। होशंगाबाद का नाम अब मध्यप्रदेश की शिवराज सरकार ने नर्मदा पुरम कर दिया है, फिर भी अभी शासकीय कार्यालयों के नाम पट्टिकाओं में होशंगाबाद ही लिखा हुआ है।

होशंगाबाद के घाट पूरे देश के सबसे अच्छे घाटों में माने जाते हैं जिसमें सबसे विशाल एवं सुंदर शिलाओं से निर्मित सेठानी घाट तीर्थयात्रियों, परिक्रमा वासियों के लिए आकर्षण का केंद्र है।

हम सीधे सेठानी घाट ही पहुंचे। नर्मदा तट पर सेठानी घाट का निर्माण 19वीं सदी में जानकी देवी नामक धार्मिक महिला ने कराया था जो समृद्ध परिवार की थी इसलिए नर्मदा तट का यह घाट सेठानी घाट के नाम से प्रसिद्ध हुआ।यहां सेठानी घाट पहुंचते ही हमारा मन नर्मदा मैं अठखेलियां करने के लिए आतुर होने लगा। वैसे तो हम नर्मदा तट पिपरिया से स्नान ध्यान करके निकले थे परंतु सेठानी घाट का गहरे चौड़े पाट में नर्मदा की गंभीरता देखते ही बन रही थी।

खड़ी दुपहरिया में भी नर्मदा के तट पर आध्यात्मिक वातावरण बना हुआ था। अनेक तीर्थयात्री और परिक्रमा वासी नर्मदे हर नर्मदे हर का जयघोष करते हुए मां नर्मदा में डुबकी लगा रहे थे। ऐसे वातावरण ने हमें एक बार फिर मध्यान्ह स्नान के लिए प्रेरित किया। हम यहां सेठानी घाट में नर्मदा के निर्मल जल में लगभग एक घंटा स्नान करते रहे। कुछ वस्त्र भी साफ करने थे उन्हें भी धो कर सुखा लिया। इस बीच वहां नर्मदा तट पर बच्चों की जल क्रीड़ा भी देखते रहे। लॉकडाउन के कारण वहां पुलिस तैनात थी परंतु परिक्रमा वासियों के लिए कोई विशेष पाबंदी जैसी बात नहीं थी। जल क्रीड़ा करने वाले बच्चों को अवश्य एक महिला पुलिस वहां से खदेड़ती रही।

स्नानादि से निवृत्त होकर हम सेठानी घाट में बैठे पुरोहित से पूजा पाठ कराने का आग्रह किया। पुरोहित तुरंत तैयार हो गए और उन्होंने पूरे मनोयोग से मां नर्मदा की आरती, पूजन संपन्न कराया। पुरोहित का चरण स्पर्श कर दक्षिणा दी। पुरोहित अत्यंत सरल संतोषी थे उन्होंने बहुत प्रेम पूर्वक हमें आशीर्वाद दिया तथा आगे की परिक्रमा सफलतापूर्वक संपन्न हो कहकर शुभकामनाएं दी।

पूजन आदि से निवृत्त होकर हमें भोजन करना था। दोपहर के लगभग 1:30 बज चुके थे। अब हमें भोजन की आवश्यकता महसूस हो रही थी परंतु हमें होटल में भोजन नहीं करना था। ऐसे में तिवारी ने सुझाव दिया कि यहां की दीनदयाल रसोई में भोजन करना उचित होगा। दरअसल जब हम सेठानी घाट में स्नान और भोजन कर रहे थे तब हमारे मार्गदर्शक तिवारी नर्मदा तट के ऊपर स्थानीय जानकारों से अच्छे भोजन के प्रबंध जहां हो ऐसे ही स्थान की जानकारी ले रहे थे। वहां एक जानकार सज्जन ने उन्हें बताया कि यहां की अंत्योदय रसोई अत्यंत साफ-सुथरी है। जिस समय हमारी नर्मदा परिक्रमा यात्रा चल रही थी उस समय मध्य प्रदेश के अनेक शहरों में लॉकडाउन होने लगा था। इन परिस्थितियों में मुझे भी तिवारी का सुझाव अच्छा लगा और हम दीनदयाल अंत्योदय रसोई जहां ₹10 के कूपन में भोजन मिलता है वहां भोजन करने चले गए।

जैसा कि हमें जानकारी मिली थी दीनदयाल रसोई होशंगाबाद बस स्टैंड के पास बहुत अच्छी साफ-सुथरी जगह में थी। दीनदयाल रसोई का पृथक से भवन था जहां शेड में भोजन करने की व्यवस्था थी। हमने कूपन कटा कर नर्मदे हर कहते हुए भोजन देने वाले के समक्ष खड़े हो गए। रसोई में उस दिन कढ़ी चावल एवं रोटी बनी थी। हमने अपनी अपनी रुचि अनुसार पेट भर भोजन किया। भोजन उपरांत निरुपमा एवं मैंकला लस्सी पीने की इच्छा से बाजार की ओर चले गए परंतु मैं और तिवारी वहीं बैठ कर कुछ अन्य आगंतुकों की अन्न सेवा की। अन्न सेवा करने के लिए यह बेहतर जगह है। दीनदयाल रसोई में भोजन करने का यह प्रथम अवसर था परंतु पता नहीं मुझे क्यों लग रहा था कि होशंगाबाद की दीनदयाल रसोई की व्यवस्था अन्य स्थानों से बेहतर है।

निरुपमा और मैंकला के वहां पर आने तक हम वहीं बैठे रहे और दीनदयाल अंत्योदय रसोई की व्यवस्था को समझते रहे। लगभग 2:30 हम नर्मदा पुरम होशंगाबाद से आगे के लिए रवाना हो गए तथा हरदा जिले के अनेक गांवों नगरों को पार करते हुए देर शाम ओमकारेश्वर पहुंच गए। वहां नर्मदा तट पर हम एक पंडित की गेस्ट हाउस में ठहर गए तथा रात्रि भोजन करके सुबह जल्दी उठने की आशा के साथ मां नर्मदा के आंचल में विश्राम अवस्था में चले गए।

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