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शहीद बिस्मिल के 125 में जन्मदिन पैंथर परिवार न किया नमन: खोसला

दिल्ली। प्रदेश नेशनल के अध्यक्ष राजीव जॉली खोसला ने आज शहीद रामप्रसाद बिस्मिल को वैश्विक महामारी करोना काल के मद्देनजर अपने अपने हिसाब से पैंथर्स परिवार ने  पुष्पांजलि अर्पित की और कहा कि शहीद पंडित राम प्रसाद बिस्मिल के जन्मदिन पर संत फिदेलिस सीनियर सेकेंडरी स्कूल के जनसंपर्क अधिकारी विद्यार्णव शर्मा ने कहा कि वीर क्रांतिकारी शहीद हुए।

देश आजाद हुआ लेकिन शहीदों के सपनों का देश न बन सका। बताया कि 11 जून 1897 को शाहजहांपुर में पंडित बिस्मिल का जन्म हुआ। तरुणाई में आते ही आर्यसमाज से जुड़े स्वामी दयानंद सरस्वती की जीवनी व सत्यार्थ प्रकाश का गहन अध्ययन किया। इसका प्रभाव उनके जीवन पर काफी पड़ा। स्वाध्याय के साथ नियमित कसरत व दोनों समय हवन दिनचर्या थी। पंडित बिस्मिल व अशफाक उल्ला खान शाहजहांपुर के मिशन स्कूल में पढ़े। दोनों की प्रतिभाएं अलग थीं। मैनपुरी षड़यंत्र केस के प्रसिद्ध क्रांतिकारी गेंदालाल दीक्षित से पंडित राम प्रसाद बिस्मिल काफी प्रभावित हुए। घर छोड़कर सदर आर्यसमाज शाहजहांपुर में रहने लगे।

नौ अगस्त 1925 को बिस्मिल ने चंद्रशेखर आजाद, अशफाक उल्ला खान, ठाकुर रोशन सिंह, राजेंद्र नाथ लाहिड़ी, मन्मतनाथ गुप्त आदि क्रांतिकारियों के साथ काकोरी ट्रेन कांड को अंजाम दिया। इसमें बिस्मिल, अशफाक, रोशन, राजेंद्र को 19 दिसंबर 1927 को फांसी दी गई। हजारों क्रांतिकारियों के बलिदान से देश आजाद तो हो गया लेकिन इन शहीदों के सपनों देश नहीं बन सका।

पंडित राम प्रसाद बिस्मिल और अशफाक उल्ला खान का देश की आजादी के लिए बलिदान हो जाना हमारी बहुत बड़ी धरोहर है। आजादी के बाद शहीदों को देश में वो स्थान नहीं दिया गया जिसके वे हकदार थे। पाठ्यक्रम में उन्हें उचित स्थान नहीं दिया गया। बिस्मिल और अशफाक उल्ला खान बहुत अच्छे शायर और कवि थे।

आज भी हर क्रांतिकारी प्रभाव यही कहा जाता है सरफरोशी की तमन्ना आज हमारे दिल में हैं देखना है कितना जोर  बाजू कातिल में है 1927 के इन्हें फांसी दे दी गई मगर आज भी हम सबको यह याद है ,किस करोना काल के दौरान हम सबको अपनी और दूसरों की सुरक्षा के मद्देनजर सरकारी  सूचनाओं को मानना हमारी जरूरी भी है और मजबूरी भी।

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