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ब्रह्माकुमारी मंजू ने कहा- देने की प्रवृत्ति का यादगार पर्व है अक्षय तृतीया …

बिलासपुर। भारतीय संस्कृति का हर त्यौहार हमें कुछ सीख देता है, आज अक्षय तृतीया पर्व भी हमें बहुत सी शिक्षाएं देता है। अक्षय का अर्थ ही है कि जिसका कभी क्षय न हो अर्थात् जो नष्ट नहीं होता। जोड़ना और छोड़ना हमारी संस्कृति है। लक्ष्मी पूजा में धन कमाने का दिन होता है लेकिन यह दिन दान देने का दिन है। दान केवल चीज-वस्तुओं या धन का ही नहीं अपितु अपने ज्ञान, गुणों, शक्तियों, विशेषताओं, आशीर्वाद, शुभभावनाओं व शुभकामनाओं का दान देना भी श्रेष्ठ दान है। यदि आपके जीवन में कुछ चीजों की कमी है तो उन चीजों का ही दान देने का प्रयास करें इससे वह चीज आने लगती है।

उक्त बातें ब्रह्माकुमारीज़ टिकरापारा सेवाकेन्द्र प्रभारी ब्र.कु. मंजू दीदी जी ने ऑनलाइन सत्संग में अक्षय तृतीया पर्व का महत्व बताते हुए कही। आपने बतलाया कि परशुराम जी, ब्रह्मा के पुत्र अक्षय कुमार व मां गंगा के अवतरण दिवस के रूप में इस पर्व को मनाने की परंपरा है। हम यदि इस पर्व के महत्व को समझ कर मनाएंगे तो ही सार्थकता है अन्यथा केवल एक परंपरा मात्र रह जायेगी।

दीदी ने आगे कहा कि यूं तो अच्छे कार्य की शुरूआत के लिए कोई मुहूर्त की आवश्यकता नहीं है लेकिन अक्षय तृतीया अपने आप में स्वयं सिद्ध मुहूर्त है। हम किसी भी शुभ कार्य की शुरूआत कर सकते हैं। अपनी योग्यता को विकसित कर सकते हैं, अपनी क्षमता या दक्षता को बढ़ा सकते हैं। विशेष इस कोरोना काल में किसी को मानसिक संबल देना, यदि आपकी क्षमता हो तो आर्थिक सहयोग देना, कुछ नहीं तो स्वयं व परिवार के शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य के लिए सत्संग, योग, ध्यान, एक्सरसाइज, प्राणायाम आदि का समय निश्चित करें। अपने आस पड़ोस के लोगों के सहयोगी बनें। उन्हें सांत्वना व धैर्य जरूर बंधाएं।

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