
मातृत्व का गहरा अर्थ: शरीर से परे एकत्व और चेतना का अनुभव
भारतीय संस्कृति ने हमेशा मां को दिव्यता से और दिव्यता को मां से जोड़ा है. ऐसा इसलिए है, क्योंकि मातृत्व का संबंध हमारे अस्तित्व के स्रोत से है. आज भी पूरी दुनिया में लोग 'धरती मां', 'मातृभूमि' और आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक्स में 'मदर बोर्ड' की बात करते हैं. मातृत्व की महिमा में बहुत कुछ कहा गया है. फिर भी इस अवधारणा को बहुत गलत समझा गया है.
मातृत्व, 'थाईमाई' या 'मदरहुड' का असल में क्या मतलब है? जब हम 'मां' शब्द कहते हैं तो हमारा मतलब ऐसे व्यक्ति से होता है जिसने कम से कम एक पल के लिए ही सही, किसी दूसरे जीवन के प्रति पूरी तरह से समर्पित होने का अनुभव किया हो. जब बच्चे बड़े हो जाते हैं तो मां के उनके साथ कुछ मुद्दे हो सकते हैं. लेकिन नई पीढ़ी का अस्तित्व मां के अपने शिशु के साथ गहरे एकत्व के अनुभव पर निर्भर करता है. मां के शरीर की हर कोशिका इस नए जीवन की जरूरतों के प्रति रिस्पॉन्ड करती है. यही बात मातृत्व को इतना अनोखा मानवीय अनुभव बनाती है.
मातृत्व की पवित्रता इस बात में निहित है कि प्रकृति व्यक्ति को यह एहसास कराने में सहयोग करती है कि उसके अपने शरीर की संकीर्ण सीमाओं से परे कुछ अधिक मौजूद है. यह बात मातृत्व को अद्भुत स्वाभाविक संभावना बनाती है और 'परे' तक पहुंचने का माध्यम बनाती है. मां के रूप में आप अपनी निजी इच्छाओं और नापसंदों से ऊपर उठ जाती हैं और स्वयं से अधिक किसी चीज के साथ एकत्व का अनुभव करती हैं. इस उपहार का 'योग' या एकत्व के रूप में और भी विस्तार किया जा सकता है, जिसका अर्थ है संपूर्ण अस्तित्व के साथ अनुभवजन्य एकत्व की अवस्था.
मातृत्व केवल एक जैविक स्थिति होना जरूरी नहीं है. केवल एक बच्चे को जन्म देना कोई महान उपलब्धि नहीं है. कई संस्कृतियों में उन महिलाओं को कलंकित किया गया है जिन्होंने बच्चों को जन्म नहीं दिया. यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है. मातृत्व के जादू को नकारा नहीं जा सकता. लेकिन इसकी पवित्रता केवल प्रजनन की प्रक्रिया में निहित नहीं है. योग विज्ञान, लिंग-भेद से परे प्रत्येक मनुष्य के लिए मां बनने के इस सौभाग्य को सुलभ बनाता है.
दुनिया की मां होना
एक जैविक मां और बच्चे के बीच का जुड़ाव प्रजाति के कायम रहने को सुनिश्चित करता है. लेकिन यह सरल प्रजनन प्रक्रिया परे जाने का द्वार भी बन सकती है.
समावेश की जिस चुनिंदा भावना से कोई मां अपने बच्चे को देखती है, उसे विस्तृत करके पूरी दुनिया को उसमें शामिल किया जा सकता है. एक ऐसा समावेश जो संपूर्ण और शर्त-रहित हो. यही एक योगी का आंतरिक अनुभव होता है.
दुर्भाग्य से, कई माताएं पालन-पोषण को स्वामित्व मान बैठती हैं. हालांकि मैं परिवार में सबसे छोटा था, फिर भी मेरी अपनी मां अक्सर मुझे एक बड़े भाई जैसा मानती थीं. एक बार जब उन्होंने अपनी भावनाएं मुझसे थोड़ी कोमलता से व्यक्त कीं तो मैंने उनसे बहुत ही सीधे-सादे अंदाज में पूछा, 'अगर मेरा जन्म पड़ोस वाले घर में हुआ होता तो क्या तब भी आप मेरे
बारे में ऐसा ही महसूस करतीं?'
वह फूट-फूटकर रो पड़ीं और चली गईं. लेकिन बाद में आंखों में आंसू लिए वापस आईं और मेरे पैर छू लिए. उस दिन उनके भीतर एक तरह का वैराग्य जाग उठा. जब उन्हें यह एहसास हुआ कि हम सबने कितनी पहचान जोड़ रखी है. चाहे वह हमारा शरीर हो, हमारा वंश, हमारा परिवार, हमारा घर या हमारा समुदाय हो.
जब मैं लोगों को आध्यात्मिक प्रक्रिया में दीक्षित करता हूं तो सबसे पहले उनसे पूछता हूं कि क्या वे 'पूरी दुनिया की मां' बनने के लिए तैयार हैं. ऐसा इसलिए है, क्योंकि मातृत्व की सच्ची भावना का मतलब किसी एक व्यक्ति को महज एक वस्तु, अपनी निजी संपत्ति या अपना जुनून बना लेना नहीं है. इसके विपरीत, यह चरम प्रेम और शर्त-रहित समावेश की अवस्था है. जहां आप न सिर्फ अपने सगे बच्चे को, बल्कि हर किसी को अपना एक हिस्सा मानते हैं. ऐसी अवस्था में आपके कार्य आपकी निजी इच्छाओं से तय नहीं होते, बल्कि आप बस वही करते हैं जिसकी उस पल जरूरत होती है.
यदि मां आपको सृष्टि की गोद में सौंपती है तो योग विज्ञान आपको सीधे सृष्टिकर्ता की गोद में पहुंचाने में सक्षम है. मातृत्व का यह कहीं अधिक गहरा अनुभव एक जबरदस्त उपहार और संभावना है, जो हर किसी के लिए खुली है.
चेतना को ऊंचा उठाने का एक सरल तरीका
अभी आपके शरीर में जो कुछ भी है उसमें से आपकी मां के गर्भ से आया हुआ अंश अब शायद ही बचा हो. वह ज्यादातर खत्म हो चुका है. आज आपके शरीर का वजन जितने भी किलोग्राम हो, वह सब कुछ 'धरती मां' से आया है. हमें अपनी जन्म देने वाली मां और धरती मां दोनों की सराहना करनी चाहिए और उनके प्रति कृतज्ञ होना चाहिए. हम यहां इस मां और उस मां के कारण हैं.
आपको अपने जीवन में योगदान देने वाली हर चीज, हर इंसान की सराहना करनी चाहिए. अगर आप इस बात पर थोड़ी गहराई से गौर करें तो इस पूरी सृष्टि में ऐसी कोई एक भी चीज नहीं है, जिसके बिना आपका अस्तित्व संभव हो. तो मैं चाहता हूं कि आप हर चीज को 'मां' के रूप में देखें. आज 'वृक्ष-मां' का दिन है, तो कल 'पर्वत-मां' का दिन होगा. उसके अगले दिन आपकी जन्म देने वाली मां का दिन होगा. इन दिनों को इस तरह तय किए जाने का मुख्य कारण यह है कि अगर ऐसा न किया जाए, तो लोग शायद कभी अपनी मां के बारे में नहीं सोचेंगे. संस्कृतियां ऐसी ही बन गई हैं. लेकिन अगर आप थोड़े ज्यादा सचेतन हैं, अगर आप खुद को यह याद दिलाते रहें कि 'अरे! ये पेड़ मुझे ऑक्सीजन दे रहे हैं, ये हर पल मुझे सहारा दे रहे हैं.' अगर आप हर चीज में, हर जगह जहां आप घूमते हैं, वहां इस बात को महसूस करें तो आप सचेतन बन जाएंगे.

















