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कोई समझेगा कैसे …

 

मौन आहें,

खामोश शिकायतें,

कुछ भी कहने से डरते लब,

राई से अहसानों को

पहाड़ सा देख लेने का अहसास,

बेवजह अपराध बोध से व्यथित मन

जब तक कुछ बोलेगा नहीं,

व्यथा को शब्दों  का रूप देगा नहीं

तो कोई सुनेगा कैसे?

कोई समझेगा कैसे?

 

असत्य की लकीरों से

असत्य की उभरती तस्वीरें,

बून्द भर सच के रंग

पर्वत का रूप धरते दिन ब दिन,

नदिया बन सीमाएं तोड़ते

हर ओर बहते असत्य के जल

रुकेंगे कैसे?

बांध अगर बनेंगे नहीं।

व्यथा अगर शब्द बनेगें नहीं

तो कोई सुनेगा कैसे?

कोई समझेगा कैसे?

 

अपने किसी का दिल ना दुखे,

सम्मान की सीमाएं ना टूटें,

यही चाह मन में पलती रही।

आसुओं की सरीता

आंखों में ही सिमटती रही।

दाता ने क्या दिया,

क्यों दिया,

कितना दिया,

फलस्वरूप कितना मिला,

दाता को इस सच का

अहसास बना रहे।

फिर कोई कुछ भी कहता रहे,

बस, सम्मान में किसी के

प्यार के भाव बने रहे।

क्या हुआ जो

कटाक्षों के तीर चलते रहे।

 

आंसुओं के तूफान को

कोई रोकेगा कैसे

अगर दाता का भर्म

परिकल्पनाओं में पलने लगे।

उन से मिलती दुआओं का

स्वरूप बदलने लगे।

आदर में झुका सिर

दुविधा में आने लगे।

उनके लिए जो कुछ भी किया

वो अन्धेरों में गुम होने लगे।

तो शब्दों का सहारा लेना पड़ेगा।

सच का आईना दिखाना पड़ेगा।

वरना निशब्द स्पष्टीकरण को

कोई सुनेगा कैसे?

अनकही व्यथा को कोई

समझेगा कैसे?

 

©ओम सुयन, अहमदाबाद, गुजरात          

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