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मां नर्मदा पंचकोशी परिक्रमा क्षेत्र अमरकंटक में स्थित है संत कबीर की तपोस्थली कबीर चबूतरा नर्मदा परिक्रमा …

भाग- 42

अक्षय नामदेव। सोनमुड़ा से फरस विनायक का दर्शन करने के पश्चात भृगु ऋषि की तपोभूमि भृगु कमंडल और भृगुमंडल के दर्शन उपरांत मां नर्मदा पंचकोशी परिक्रमा वासी रूद्र गंगा का दर्शन करने जाते हैं तथा उसके बाद निर्गुण धारा के कवि संत कबीर दास की तपोस्थली कबीर चबूतरा पहुंचते हैं।

कबीर चबूतरा के बारे में प्रमाणिक रुप से प्रचलित है”पोथी पढ़ पढ़ जग मुआ, पंडित भया न कोय, ढाई आखर प्रेम का, पढ़ै सो पंडित होय ” जैसी निर्गुण रचनाएं रचने वाले आडंबर रूढ़िवादिता पाखंड के विरोधी संत कबीर यहां लगभग 500 साल पहले वर्ष 1569 के आसपास पहले तीर्थाटन करते हुए आए थे। यह स्थान उन्हें काफी अच्छा लगा इसलिए यहां उन्होंने कुछ दिन रहकर तपस्या की थी। उनके साथ उनके परम शिष्य धर्मदास भी थे जो कालांतर में कबीर की परंपरा को आगे बढ़ाने का काम किया। कहा जाता है कि जब यहां कबीर थे तब सिखों के गुरु नानक भी यहां आए थे और दोनों संतों में सत्संग हुआ था।

इस लिहाज से कबीर चबूतरा कबीर एवं नानक की मिलन स्थली कहा जाता है।कबीर चबूतरा अमरकंटक तीर्थ क्षेत्र में मां नर्मदा पंचकोशी परिक्रमा क्षेत्र में स्थित है जो छत्तीसगढ़ के गौरेला पेंड्रा मरवाही जिले में शामिल है। कबीर चबूतरा अमरकंटक के जिस पहाड़ में स्थित है वहां की बनावट कुछ ऐसी है कि राजनैतिक नक्शे में कबीर चबूतरा डिंडोरी जिले के करंजिया तहसील, अनूपपुर जिले के राजेंद्रग्राम एवं गौरेला पेंड्रा मरवाही जिले के गौरेला तहसील में त्रिकोणी रूप से स्थित है।

हालांकि कबीर चबूतरा का कबीर आश्रम की गद्दी छत्तीसगढ़ के दामाखेड़ा से कबीर वंशावली के अनुसार संचालित है तथा दामाखेड़ा से ही कबीर कुटी की देखरेख होती है ।यहां इस आशय के बोर्ड भी लगे हुए हैं। कबीर चबूतरा पेंड्रारोड केंवचीं होकर आमाडोब के आगे अमरकंटक एवं जबलपुर मार्ग  में स्थित है। यह गौरेला पेंड्रारोड से 35 किलोमीटर तथा अमरकंटक से 5 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।कबीर चबूतरा जाने के लिए अमरकंटक पेंड्रा रोड जबलपुर मार्ग संगम के  तिराहे के पहले नीचे घाटी में लगभग 1 किलोमीटर उतरना पड़ता है जहां सुरम्य वादियों के बीच संत कबीर की तपोस्थली स्थित है।

साल वनों से आच्छादित कबीर की तपोस्थली की सुंदरता अवर्णनीय है।वर्तमान में यहां वह कुटिया अभी तक सुरक्षित करके रखी गई है जहां संत कबीर रुके थे। यहां एक वटवृक्ष भी है जो काफी पुराना है।कबीर चबूतरा में अनेक कुंड बने हुए हैं जहां का पानी सूरज की स्थिति के अनुसार दूधिया दिखाई देता है। कुछ लोग इसे धार्मिकता से जोड़ते हैं जबकि कुछ इसे सफेद शैवाल कहते है। कबीर चबूतरा कबीरपंथियों का बड़ा तीर्थ है जहां देश भर से कबीरपंथी वर्षभर पहुंचते रहते हैं। मां नर्मदा की पंचकोशी परिक्रमा करने वाले परिक्रमा वासी एवं तीर्थ यात्री भी कबीर चबूतरा दर्शन के लिए आते हैं।

जैसा कि कबीर स्वयं धार्मिक आडंबर के विरोधी थे तो उनकी इस विचारधारा की झलक कबीर चबूतरा में स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। मां नर्मदा की पंचकोशी परिक्रमा करने वाले परिक्रमावासी कबीर चबूतरा पहुंच कर अद्भुत शांति महसूस करते हैं। कबीर चबूतरा का दर्शन कर आप फिर से अमरकंटक नर्मदा तट की ओर जा कर चंडी गुफा, अरण्यी संगम तथा चक्र तीर्थ का दर्शन कर सकते हैं जो कि मां नर्मदा पंचकोशी परिक्रमा तीर्थ क्षेत्र में स्थित है।

 

  हर हर नर्मदे

 

           क्रमशः

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