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एक हैं अमरकंटक में संत नर्मदानंद महराज …

नर्मदा परिक्रमा भाग- 37

अक्षय नामदेव। माई की बगिया में विधि विधान से पूजा अर्चना करने के बाद हम मां नर्मदा कुंड अमरकंटक के लिए रवाना हुए। अमरकंटक नर्मदा कुंड से 100 मीटर पहले हम गीता स्वाध्याय मंदिर अमरकंटक के संचालक महात्मा स्वामी नर्मदानंद गिरी से आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए रुके। जब हम गीता स्वाध्याय मंदिर में पहुंचे तो महात्मा नर्मदानंद महाराज आश्रम में ही थे। हमने उन्हें साष्टांग प्रणाम कर उनका आशीर्वाद प्राप्त किया। नर्मदानंद महाराज अमरकंटक में तपस्वी संत के रूप में प्रचलित हैं।

मृदुभाषी, सादगी, सरलता, मितव्ययिता के साथ साधना एवं तपस्या करते हुए वे निरंतर गौ सेवा एवं परिक्रमा वासियों की सेवा करते हुए गीता स्वाध्याय मंदिर अमरकंटक में ब्राह्मण सहित सभी वर्गों के बालकों को गीता अध्ययन, वेद पाठ (रुद्री पाठ) का अध्ययन निरंतर कराते आ रहे हैं। महात्मा नर्मदानंद गिरी हमारे परिवार के प्रति प्रारंभ से ही स्नेहिल भाव रखते रहे हैं। पिताजी के लगातार अमरकंटक आने जाने के कारण महात्मा उनसे अपनेपन का बोध रखते हैं। हमारे परिवार के सभी सदस्यों का भी लगातार गीता स्वाध्याय मंदिर अमरकंटक आना जाना लगा रहता है। खासकर हमारे गौ सेवा प्रेमी बड़े भैया संजय एवं छोटे भैया अखिलेश गीता स्वाध्याय मंदिर आश्रम के पेंड्रा से जुड़े कामकाज को अत्यंत जिम्मेदारी से निभाते आए हैं। महात्मा नर्मदानंद गिरी जब कभी आश्रम के कामकाज से पेंड्रा आते हैं हमारे नर्मदाकुंज में उनका पदार्पण अवश्य होता रहा है।

गीता स्वाध्याय मंदिर अमरकंटक की स्थापना वर्ष 1975 में गीता जयंती के शुभ तिथि में ब्रह्मलीन स्वामी ब्रह्मेद्रानंद गिरि महाराज ने की थी। वे प्रारंभिक रूप से वर्ष 1932 में नर्मदा की परिक्रमा करते हुए अमरकंटक पहुंचे थे। परिक्रमा काल में सिद्ध पुरुषों का दर्शन सत्संग परिचय करते हुए वे खंडवा में परम सिद्ध श्रीमत परमहंस स्वामी केशवानंद दादाजी धूनीवाले के सानिध्य में रहते हुए उन्हें गीता का पाठ सुनाया करते थे । धूनी वाले दादाजी के ब्रह्मलीन होने के बाद स्वामी ब्रह्मेद्रानंद तीर्थाटन भ्रमण करते हुए काशी पहुंचे तथा काशी में उस समय के प्रखर मूर्धन्य विद्वान निरंजन पीठाधीश्वर श्रोत्रीय ब्रह्मनिष्ठ श्रीमत परमहंस आचार्य महामंडलेश्वर 1008 नृसिंह महाराज के सानिध्य में दक्षिणामूर्ति मठ में पहुंचे। वहां उनकी सेवा में रहकर स्वाध्याय तप साधना करते हुए उनसे सन्यास ग्रहण करके तत्व चिंतन में रत रहे।

नृसिंह गिरि महाराज के आज्ञा अनुसार प्रयाग में परमानंद आश्रम में कुछ समय रहकर पुष्कर सन्यास आश्रम में महंत पद पर कार्यभार संभालते रहे बाद में कुछ समय पश्चात पुष्कर से महंत पद का त्याग कर विरक्त होकर नर्मदा तट पर पुनः विचरण करते हुए अमरकंटक पहुंचे एवं यहां के जनसामान्य के संस्कारों को देखते हुए स्वामी ब्रह्मेद्रानंद गिरि ने निश्चय किया कि यहां अमरकंटक में एक गीता पाठशाला का निर्माण करना चाहिए जिसमें ब्राह्मण सहित सभी वर्ग के बालकों को गीता का अध्ययन कराया जाए। मां नर्मदा की प्रेरणा से स्वामी ब्रह्मेद्रानंद आनंद गिरि महाराज ने सन 1975 में गीता जयंती के शुभ अवसर पर गीता स्वाध्याय मंदिर अमरकंटक की स्थापना नर्मदा कुंड अमरकंटक के पीछे की ।

गीता स्वाध्याय मंदिर में नित्य गीता पाठ एवं रुद्री पाठ का अध्ययन पठन पाठन कराया जाता है। बीते 40, 45 वर्षों में गीता स्वाध्याय मंदिर से हजारों गरीब छात्रों ने अपनी नियमित शिक्षा के साथ गीता का अध्ययन कर समाज के अनेक क्षेत्रों में अग्रणी भूमिका निभा रहे हैं। यहां भगवान शिव ओम्कारेश्वर महादेव की भी प्रतिष्ठापना स्वामी ब्रह्मेद्रानंद गिरी महाराज द्वारा की गई। वर्ष 2001 में गीता स्वाध्याय मंदिर के संस्थापक ब्रह्मेंद्रानंद गिरि महाराज के ब्रह्मलीन होने के पश्चात उनके परम प्रिय शिष्य स्वामी नर्मदानंद महाराज ने गीता स्वाध्याय मंदिर अमरकंटक के महंत नियुक्त हुए तथा गीता स्वाध्याय मंदिर का कुशलतापूर्वक संचालन करते हुए अपने गुरु द्वारा संचालित परंपरा का निर्वहन कर रहे हैं। महात्मा नर्मदा नंद महाराज वर्ष 1981 में ब्रह्मेंद्रानंद गिरि महाराज से दीक्षा ग्रहण की थी। गीता स्वाध्याय मंदिर अमरकंटक की ख्याति भारत वर्ष के दूर-दूर तक है।

गीता स्वाध्याय मंदिर अमरकंटक में महात्मा नर्मदा नंद गिरी महाराज से आशीर्वाद प्राप्त कर हम नर्मदा कुंड अमरकंटक पहुंच गए।

 

 हर हर नर्मदे।                                                                                                    क्रमशः

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