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अरुण साव ने कहा- आपातकाल की बुनियाद में है कांग्रेसी …

मुंगेली । बीसवीं सदी में भारत को आजादी की लड़ाई दो बार लड़नी पड़ी। पहली तो स्वाभाविक रूप से अंग्रेजों से तो दूसरी लड़ाई राष्ट्रवादियों को कांग्रेस से ही लड़नी पड़ी। 46 वर्ष पूर्व 25 जून 1975 को कांग्रेस सरकार द्वारा आपातकाल लागू करने का वो कालादिवस भारतवासी कभी नहीं भूल पाएंगे। ये बातें पत्रकारों से बातचीत करते हुए बिलासपुर लोकसभा सांसद अरुण साव ने कही।

जिलाभाजपा कार्यालय में बातचीत करते हुए सांसद ने आगे कहा कि 25 जून 1975 की रात राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के कहने पर भारतीय संविधान की धारा 352 के अधीन आपातकाल की घोषणा  की थी। इस तरह भारत अपने ही लोगों का एक बार फिर से गुलाम बन गया था। श्रीमती गांधी ने तमाम राजनीतिक विरोधियों को कैद कर लिया और प्रेस को प्रतिबंधित कर दिया था। तब लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने इसे भारतीय इतिहास का सबसे काला समय कहा था।

वस्तुतः तब आपातकाल जैसी कोई परिस्थिति ही नहीं थी सिवाय इसके कि इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायाधीश जगमोहन सिन्हा ने श्रीमती गांधी के खिलाफ चुनाव हारे राजनारायण की याचिका पर फैसला देते हुए श्रीमती गांधी का चुनाव निरस्त कर दिया था जिसके कारण उनका प्रधानमंत्री पद पर बने रहना मुश्किल था। आपातकाल लगते ही स्वयंसेवक और तमाम गैर कांग्रेसी नेताओं की गिरफ्तारी शुरू हो गयी। मुंगेली से भी कई नेताओं को गिरफ्तार किया गया वहीं द्वारिका जायसवाल  सत्याग्रह कर जेल गए थे। आपातकाल के कहर किस हद तक टूटा था कि यह आज का इतिहास ही बन गया है।  सेक्युलरिज्म शब्द पहले अम्बेडकर की संविधान में नहीं था। आपातकाल में जब सारी शक्ति केवल व्यक्ति में केन्दित थी, तभी पंथनिरपेक्षता और समाजवाद इन दोनों शब्द संविधान के प्रस्तावना में चुपके से डाल दिए गए थे।

आपातकाल में अभिव्यक्ति की आजादी को भी कुचल दिया गया था। इमरजेंसी में अखबारों के दफ्तरों की बिजली काट दी गयी,ताकि अखबार अगले दिन आपातकाल की खबरें ना छाप सकें। आपातकाल के दौरान 3801 अखबारों को जब्त किया गया। 327 पत्रकारों को मीसा कानून के तहत जेल में बंद कर दिया गया। 290 अखबारों में सरकारी विज्ञापन बन्द कर दिए गए। ब्रिटेन के द टाइम्स और द गार्जियन जैसे अखबारों के 7 संवाददाताओं को भारत से निकाल दिया गया था। रॉयटर्स सहित कई विदेशी न्यूज़ एजेंसियों के टेलीफोन और दूसरी सुविधाएं काट दी गयी। 51 विदेशी पत्रकारों को भारत मे प्रवेश से मना कर दिया गया।

कांग्रेस की मानसिकता आज भी बिल्कुल आपातकाल वाली ही दिखाई देती है। छत्तीसगढ़ समेत जिन मुट्ठी भर प्रदेशों में कांग्रेस या उसके प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष समर्थित दलों का शासन है वहां के हालात आज भी वही है। पालघर के साधुओं को भीड़ द्वारा पीट पीटकर मार डालना, अर्नब गोस्वामी और उनकी टीम पर बर्बर अत्याचार करना। पश्चिम बंगाल की नृशंस हिंसा। छग का उदाहरण लें तो किसी ट्वीट को रीट्वीट तक करना बड़ा अपराध बना दिया जाता है। एफआईआर प्रदेश बना दिया गया है। राष्ट्रीय पत्रकारों पर सौ सौ मुकदमें दर्ज करना। पुलिस थाने के सामने ही पत्रकारों से बर्बरता से हिंसा तक पहुंच जाना। महज इसलिए क्योंकि वह आपसे सहमत नहीं है यही तो इंदिरा गांधी ने भी किया था।

इस अवसर पर प्रदेश भाजपा कार्यसमिति सदस्य गिरीश शुक्ला, जिलाभाजपा अध्यक्ष शैलेश पाठक, जिला कोषाध्यक्ष प्रेम आर्य, लोकतंत्र सेनानी द्वारिका जायसवाल, नगर पालिका उपाध्यक्ष मोहन मल्लाह, लोकनाथ सिंह, संजय वर्मा, नगर भाजपा अध्यक्ष राणाप्रताप सिंह, शंकर सिंह, जिला मीडिया प्रभारी सुनील पाठक, कोटूमल दादवानी, प्रदीप पाण्डेय, राकेश साहू, मनु शुक्ला, अमितेष आर्य उपस्थित थे।

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