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पुण्य कर्मों के फलने पर ही मिलता है भागवत कथा श्रवण का सौभाग्य …

‘आज कलियुग के कष्टों की निवृत्ति तथा मोक्ष प्राप्ति का सरलतम साधन भागवत कथा है। भगवान वेदव्यास ने मनुष्य को भक्ति की शक्ति से परिचित कराने के लिए ही इस अद्भुत कथा का प्रणयन किया। यही कारण है कि भागवत कथा भक्ति, ज्ञान और वैराग्य की त्रिवेणी की संगम स्थली है।’ भागवत कथा का महत्व बताते हुए यह शब्द प्रख्यात् कथा वाचक डॉ दीपिका उपाध्याय ने कहे। आज श्रीगोपाल जी धाम, आगरा में ऑनलाइन भागवत कथा का प्रथम दिन था। स्वर्गीय पंडित गोपाल दास शर्मा की पुण्य स्मृति में हो रही इस भागवत कथा में यूँ तो लॉक डाउन तथा कोरोना गाइडलाइन के चलते सामान्य लोगों का प्रवेश वर्जित था, किंतु फेसबुक पर सजीव प्रसारण ने भक्तों की समस्या हल कर दी।

डॉ. दीपिका उपाध्याय ने कथा का प्रारंभ करते हुए बताया कि किस प्रकार नारद जी को वृंदावन में यमुना तट पर भक्ति रूपी तरुणी अपने जर्जर और वृद्ध हो चुके मरणासन्न पुत्रों ज्ञान और वैराग्य के साथ मिली। नारद जी ने ज्ञान और वैराग्य के को जगाने के लिए सनकादि के श्रीमुख से भागवत कथा का प्रवचन कराया जिससे भक्ति, ज्ञान और वैराग्य तीनों ही पुष्ट हो गए।

आगे गोकर्ण उपाख्यान में उन्होंने बताया कि इस प्रकार भयंकर पाप कर्म करने वाले तथा मृत्यु को प्राप्त हुए धुंधुकारी की मुक्ति भी भागवत कथा के माध्यम से हुई। एक ही कथा को एक साथ सुनने पर भी प्रत्येक मनुष्य को अलग फल मिलने का कारण बताते हुए कथा वाचिका ने स्पष्ट किया कि कथा के फल में भिन्नता सुनने वाले के भाव के कारण होती है। अतः भागवत कथा सुनते समय अपने मन को श्री हरि के चरणों में लगाना चाहिए। श्री हरि का नाम संकीर्तन भक्तों के चित्र को भगवान के चरणों में लगाता है।

आगे परीक्षित के जन्म की कथा सुनाते हुए डॉ. दीपिका उपाध्याय ने कहा जिसने गर्भ में ही भगवान श्री हरि के तेजस्वी रूप के दर्शन कर लिए हों उससे ज्यादा भाग्यशाली मनुष्य भला इस जगत में कौन है? जिसने जन्म लेने से पहले ही भगवान के साकार रूप, तेज, बल और सामर्थ्य का परिचय प्राप्त कर लिया, वही अजर अमर है। यही कारण है कि आज भी प्रत्येक सनातनी का एक ही सपना होता है कि काश वह भागवत कथा में राजा परीक्षित बने। पांडवों का स्वर्गारोहण भी कुछ और  नहीं उनके भगवत प्रेम का परिचायक है। श्री कृष्ण के स्वधाम गमन के बाद पांडवों का राज्य को पौत्र परीक्षित को देकर देहत्याग,  उद्धव जी का बद्रिकाश्रम में जाकर मोक्ष और विदुर जी का प्रभास क्षेत्र में स्वधाम गमन यह दिखाता है कि श्री कृष्ण भक्तों के लिए उनके श्री चरणों से बड़ा कुछ नहीं। वस्तुतः जिसने भगवान का सान्निध्य सुख पा लिया, उसे इस जगत में कुछ भी न तो पाना शेष रह जाता है और ना ही उसे कुछ प्रिय लगता है। यही कारण है कि माता कुंती भगवान श्रीकृष्ण से दुख मांगती हैं क्योंकि दुख में ही हम भगवान की शरण में रहते हैं। वैसे भी भगवान कभी भक्तों को दुख नहीं दे सकते जिन्हें संसारी जन दुख कहते हैं वही वैराग्य की प्राप्ति का साधन है।

इस ऑनलाइन भागवत कथा का प्रसारण 26 जून से प्रारंभ होकर 2 जुलाई तक शाम 4:00 से 6:00 बजे तक होगा।

 

©डॉ. दीपिका उपाध्याय, आगरा                  

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