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प्रेम गाथा …

लघुकथा

मेरे आधा घंटा देर से पहुँचने पर उसने आसमान सिर पर उठा लिया। वह कारण तक सुनने को तैयार न हुई। बहुत भला -बुरा कहा। मैं सुनता रहा। मैंने सोचना बंद कर दिया। यदि सोचता और कुछ कहता तो बात और बढ़ जाती। भड़ास निकालने के बाद उसने रोना शुरू किया। वह बोली- “मैं तुमसे प्रेम करती हूँ। इसलिए तुम्हारी परवाह करती हूँ। इंतज़ार करती हूँ। फ़िक्र करती हूँ। मेरे लिए प्रेम ही सब कुछ है।”

मैं सुनता रहा। चुपचाप।

उसने पूछा- “तुम कुछ नहीं कहोगे? तुम्हारे लिए प्रेम क्या है?”

मैंने कहा- “ज़िंदगी आसान नहीं है। हम एक दूसरे का जीना आसान करें। मेरे लिए यही प्रेम है।”

उसने सुना। समझा। प्रण लिया। उसकी आँखों में आँसू थे। शायद यही प्रेम का महत्वपूर्ण क्षण था।

©डॉ. दलजीत कौर, चंडीगढ़                

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