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काव्य दीपों से मंच हुआ आलोकित…

पंचदिवसीय प्रकाश पर्व के उपरांत राष्ट्रीय वरिष्ठ नागरिक काव्य मंच, तमिलनाडु इकाई द्वारा आयोजित मासिक काव्य गोष्ठी में विषय वैविध्य के अनेक रंगों की रोशनी से मंच देदीप्यमान हो उठा। श्रद्धेय नरेश नाज़ के सानिंध्य में, साहित्यकार ईश्वर करुण की अध्यक्षता एवं श्रीमती किरण गर्ग, पटियाला के मुख्य आतिथ्य में काव्य दीपों के उजास से मंच आलोकित हो उठा।

मुख्य अतिथि एवं अध्यक्ष ने अपने उद्बोधन में राष्ट्रीय वरिष्ठ नागरिक काव्य मंच के संस्थापक श्रद्धेय नरेश नाज को इस संस्था की उपलब्धियों पर बधाई प्रेषित की तथा इस परिवार में शामिल करने हेतु धन्यवाद दिया साथ ही इस मंच के उत्तरोत्तर विकास की शुभकामनाएँ दीं। संतोष श्रीवास्तव की सरस्वती वंदना से गोष्ठी का मधुरिम शुभारंभ हुआ। तमिलनाडु इकाई अध्यक्ष विजय मोहन ने सभी का प्रेमपूर्ण स्वागत किया। दिनेश कुमार ने काव्य गोष्ठी को आद्यांत अपने उत्कृष्ट संचालन से बाँधे रखा। सत्रह काव्य-दीपों के समायोजन से यह काव्य संध्या कुछ यूँ रोशन हो ।

श्रीमती सरला सिंह ने ‘कुहू कुहू बोले कोयलिया’ से प्रकृति का मनमोहक चित्रण किया। रजनीकांत झा ने ‘दर्पण एक बिंदु है, भौतिक और अध्यात्म का मिलन बिंदु है’ से एक रूपक द्वारा दार्शनिक प्रस्तुति दी। डॉ. विद्या शर्मा ने ‘जमूरे नाच दिखाएगा’ कविता से समाज में फैली विसंगतियों पर व्यंग्यात्मक कटाक्ष किया। श्रीमती स्वीटी सिंघल ‘सखी’ने अपनी ग़ज़ल ‘किसी सिक्के के जैसा दिल उछाला तो नहीं करते’ सुनाकर गोष्ठी  में समा बाँध दिया। डॉ. मिथिलेश सिंह ने ‘चलो सपने पूरे करते हैं, अकेले जाते हैं तारों के साथ’ कविता की मनभावन प्रस्तुति दी। डॉ. मंजु रुस्तगी ने ‘दीप मैं नन्हा सही,हौंसला हूँ, विश्वास हूँ’ कविता से दीप के महत्व को चिन्हित किया। श्रीमती किरण गर्ग ने ‘जमाने की कोई बात भी दिल पर न लीजिए’ तरन्नुम में सुनाकर वाहवाही लूटी तथा पंजाब की सुप्रसिद्ध विधा माहिया सुनाकर गोष्ठी को अलग ही ऊँचाइयाँ प्रदान की। श्रीमती उषा टिबरेवाल ने ‘जिसका इंतजार नहीं था, वह बेनाम दर्द मेरे दिल और जिंदगी में क्यों ठहर गया’  श्रृंगार की एक रचना पेश की। सत्येंद्र शर्मा ने ‘मानवता की राह पर चलना सीखें लोग’ सुना कर समाज को दिशा देने का प्रयास किया। मोहनलाल गंगवार ने ‘दीप तले भी तम रहे न, अगर पास में दीपक प्रकाश रहे’ सुनाकर ज्योति पर्व की सार्थकता पर अपने भाव प्रकट किए।

श्रीमती शोभा चोरड़िया ने बाल कविता ‘चंद्रयान की भेजी राखी, अब तो खुश हो न मामाजी’ सुनाकर गोष्ठी  का रुख बचपन की ओर मोड़ दिया। दिनेश कुमार ने ‘आध्यात्मिकता ने ही भारत को दुनिया में पहचान दी’ कविता से भारत की गौरव गाथा का बखान किया। ईश्वर करुण ने ‘खुद लिखा, खुद को सुनाया हमने, खत मोहब्बत का छुपाया हमने’ ग़ज़ल की सुरमयी प्रस्तुति से गोष्ठी में चार चाँद लगा दिए। श्री संतोष श्रीवास्तव ने भाई दूज पर्व पर एक रचना एवं ‘रोशनी बारात लेकर आज है आई दिवाली’ सुना कर वातावरण को प्रकाशमय कर दिया।

त्रिभुवन जायसवाल ने ‘आज के युग में मानवता न जाने कहाँ खो गई है’ कविता की भावपूर्ण प्रस्तुति दी। विजय मोहन सिंह ने पुराने अंदाज़ में ‘जिंदगी भर नहीं भूलेगी वो अक्स्मात की बात.. सुर्ख जोड़े में लिपटी वो सौगात की बात..’ सुनाकर मंच को मधुरस से सराबोर कर दिया। श्रीमती शोभा चोरड़िया के धन्यवाद ज्ञापन से गोष्ठी का समापन हुआ।

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