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कशिश …

 

क्यो..? बस तेरी और खींची चली आई..
कुछ तो कशिश हैं तुझमे की मैं चली आई
कुछ बात जो हैं तुझमे कि मैं भुला न पाई।
तेरी कशिश ही हैं जो मैं भुला न पाई।
तेरी चाहत ही अजब थी जो मैं भुला न पाईं।।

क्यो..? बस तेरी और खींची चली आई..
तेरा प्यार ही निराला कि मैंने तेरे पास ही पाया खुद को
जब भी पास आये तुम तो भूल बैठी मैं खुद को।
भूल गई ज़माने के ताने,बाने तुझमे उलझा पाया खुद को
भूली तुझको दूर जाना होगा मैं ने तुझमे पाया खुद को।।

क्यो..? बस तेरी और खींची चली आई..
तेरी कशिश हैं कि याद है मुझे वो पल पास आये थे हम
आ चल कही दूर चलते है जहां हो बस तुम हम।
हर पल याद आते हैं वो लम्हे जब साथ मुस्कुराए थे हम
और मुझे कुछ भी कह कर चिढ़ाना ओर रूठते थे हम।।

क्यो..? बस तेरी और खींची चली आई..
मेरे गुस्से पर मुझे मनाना और न मानने पर गले लगाना
मुझे याद करके बस मेरे पास आने का बहाना बनाना।
आज भी याद है वो लम्हें ऑफ़िस से सीधा घर न आना और साथ साथ ही मस्ती करते कहीं घूमने निकल जाना।।

क्यो..? बस तेरी और खींची चली आई..
याद है वो लम्हे जो साथ मिलकर खाना बनाना।
कुछ कमियां होती तो साथ मिलकर उसको सुधारना।
न जाने कौन सा मोड़ आया वो कि हमारा हुआ दूर होना
आज वो नही वापिस आने की उम्मीद का साथ होना।।

 

©डॉ मंजु सैनी, गाज़ियाबाद                                            

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