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माथे पे बिंदी और अंग्रेजी से ज्यादा मुझे हिंदी पसन्द है …

हिंदी केवल एक भाषा ही नहीं हमारी मातृभाषा है, यह केवल भावों की अभिव्यक्ति मात्र न होकर हृदय स्थित सम्पूर्ण राष्ट्रभावों की अभिव्यक्ति है। हिंदी हमारे अस्मिता का परिचायक, संवाहक और रक्षक है। हिंदी भाषा का महत्व भारतेंदु हरिश्चन्द्र के इस कथन से लगाया जा सकता है …

“निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल।

बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल।

विविध कला शिक्षा अमित, ज्ञान अनेक प्रकार।

सब देसन से लै करहू, भाषा माहि प्रचार।।”

सही अर्थों में कहा जाए तो विविधता वाले भारत अपने को हिंदी भाषा के माध्यम से एकता के सूत्र में पिरोये हुए है…।

मान्यता है कि हिंदी शब्द का संबंध संस्कृत के सिंधु शब्द से माना जाता है। सिंधु का तात्पर्य सिंधु नदी से है। यही सिंधु शब्द ईरान में जाकर हिन्दू, हिंदी और फिर हिन्द हो गया और इस तरह इस भाषा को अपना एक नाम मिल गया।

हिंदी भाषा न केवल भारत में बोली जाती है बल्कि दुनियां में सबसे अधिक बोली जाने वाले भाषाओं में यह तीसरे स्थान पर है। मॉरीशस, फिजी, गयाना, सूरीनाम, संयुक्त राज्य अमेरिका, दक्षिण अफ्रीका, यमन, युगांडा, सिंगापुर, नेपाल, न्यूजीलैंड और जर्मनी जैसे देशों के एक बड़े वर्ग में भी प्रचलित है।

किसी भी स्वतंत्र राष्ट्र की अपनी एक भाषा होती है जो उसका गौरव होता है, राष्ट्रीय एकता और राष्ट्र के स्थायित्व के लिए इसका होना अनिवार्य है।

स्वंत्रता प्राप्ति से पूर्व कांग्रेस ने यह निर्णय लिया था कि स्वंत्रता प्राप्ति के बाद भारत की राजभाषा हिंदी होगी जिसे स्वतंत्र भारत की संविधान सभा द्वारा 14 सितम्बर 1949 को भारत संघ की राजभाषा के रूप में मान्यता दे दी गई। आज विश्व के लगभग डेढ़ सौ विश्वविद्यालयों में हिन्दी पढ़ी और पढ़ाई जा रही है।

किसी भी भाषा को राष्ट्रभाषा बनने के लिए उसमें सर्वव्यापकता, प्रचुर साहित्य रचना, बनावट की दृष्टि से सरलता और वैज्ञानिकता, सब प्रकार के भावों को प्रकट करने की सामर्थ्य आदि गुण होने अनिवार्य होते हैं। यह सभी गुण हमारे मातृभाषा हिंदी में है। हिंदी भाषा का इतिहास लगभग एक हजार वर्ष पुराना माना गया है। हिंदी भाषा व साहित्य के विद्वान अपभ्रंश की अंतिम अवस्था ‘अवहट्ठ’से हिंदी का उद्भव मानते हैं, जिसे पं.चंद्रधर शर्मा गुलेरी ने ‘पुरानी हिंदी’नाम दिया…।

विश्व में अपनी पहचान बनाए रखने के लिए हमें सशक्त संप्रेषण की आवश्यकता होती है और इसके लिए हमें एक ऐसी भाषा चाहिए जिसमें देश के अधिकांश जन भावनाओं का प्रेम एवं उदगार निहित हो। हिंदी ही एक ऐसी भाषा है जो तमाम ग्राही तत्वों के साथ संप्रेषण का सशक्त माध्यम है।

हिंदी जननी के रूप में …

हिंदी जननी के रूप में विद्दमान है और हमेशा रहेगी। हिंदी हमारी जननी है, हिंदी को हमारे देश में मातृभाषा का दर्जा मिला, अब तो राष्ट्रभाषा और राजभाषा का भी सम्मान मिल गया है। जननी अर्थात् मां, जो बच्चे को जन्म देती है और आजीवन नि:स्वार्थ भाव से उसके लालन-पालन में लगी रहती है। इसी प्रकार हिंदी भी हमें पोषित करती है।

हिंदी को हम मातृभाषा कहते हैं, मातृभाषा यानी मां की भाषा। मां की भाषा कितनी सरल और सहज होती है। उसे कोई भी समझ लेता है, उसमें कितना मिठास होता है, उसमें कितना ओज होता है, उसमें कितनी ऊर्जा होती है। हर बच्चा अपनी मां की भाषा समझ जाता है, मां की आवाज कानों में पड़ते ही असीम ऊर्जा का संचार हो जाता है पूरे शरीर में। ठीक इसी प्रकार हमारी हिंदी भाषा भी है, जो सहज है, सरल है, जिसे बहुत आसानी से बोला जा सकता है, लिखा जा सकता है, पढ़ा जा सकता है और बेहद आसानी से समझा भी जा सकता है, इसलिये हिंदी को जननी का रूप दिया गया है। 

जिस प्रकार मां हमें शिक्षा देती है, हमें हमारी संस्कृति से पहचान कराती है, हमें संस्कार देती है, हमें समाज में सम्मान का दर्जा दिलाती है। हमारा गौरव बढ़ाती है। उसी प्रकार हिंदी भी बिल्कुल जननी की तरह हमें हमारे देश की संस्कृति और विरासत से पहचान कराती है। हमें हर जगह सम्मान दिलवाती है। हमारी पहचान बनाती है।

अब हमारा भी फर्ज है कि हम भी हिंदी को जननी की ही तरह सम्मान दें, मान दें, हिंदी की सेवा करें, हिंदी को सर्वोच्च स्थान दिलाएं और जो लोग हिंदी बोलते हैं या हिंदी जानते हैं उनका अपमान ना करें और ना ही उनको हीन दृष्टि से देखें। हिंदी हमारी शान है, हिंदी हमारी आन है, हिंदी ही हमारी पहचान है। हम हिंदी की तुलना किसी और भाषा से कर ही नहीं सकते। क्योंकि हमारी हिंदी अतुलनीय है।

हिंदी को देवनागरी लिपि भी कहते हैं। हिंदी की उत्पत्ति संस्कृत से हुई है और संस्कृत देवों की भाषा है इसलिए हिंदी को देवनागरी लिपि कहते हैं।

हिंदी भाषा अपने आप में इतनी खास और उम्दा है कि उसे किसी पहचान की जरुरत नहीं है। हिंदी हमारे देश की धरोहर है, संस्कृति है, विरासत है लेकिन यदि हम इसका महत्व आने वाली पीढ़ी को नहीं बताएंगे तो हम अपनी राष्ट्रभाषा हिंदी को विलुप्त की कगार पर ले आएंगे। आज आधुनिकता की दौर में और हाईटेक रहन-सहन अंग्रेजी इस कदर हमारे दिमाग में हावी हो रहा है कि अंग्रेजी बिना कोई अस्तित्व ही नहीं। हम बच्चों को हिंदी के बारे में तो दूर, शब्दों का हिंदी में अर्थ भी नहीं बताते। अच्छी बात है आधुनिक विचारों का होना, जमाने के साथ चलना, मगर हमें अपनी जड़ों से दूर नहीं होना है…।

हिंदी ही हमारे देश की पहचान

हमें इस पर गर्व होना चाहिए। मैं कई बार देखती हूं जो लोग हिंदी बोलते हैं या अंग्रेजी नहीं बोल पाते, उन्हें लोग हीन दृष्टि से देखते हैं और उसके अंदर छिपे हुनर को नाकार देते हैं इसलिए कि उसे अंग्रेजी नहीं आती। हम अपने ही देश में हिंदी बोलने से कतराएं, नहीं ऐसा नहीं होना चाहिए …।

अनभिज्ञता किसी समस्या का समाधान नहीं हो सकती

तुलसीदास’ ने कहा है “हित -अहित पशु-पक्षिहुं जाना।”

परन्तु हम महाकवि तुलसीदास की इस उक्ति को अनायास ही झूठा साबित करते हैं। आज मैं बात कर रही हूं अपनी हिंदी भाषा की तो वर्तमान में हिंदी भाषा की स्थिति को समझने के लिए इतिहास में इस भाषा के साथ हुए घटनाक्रम को जानना आवश्यक है। जब अंग्रेज भारत आए, धीरे-धीरे अंग्रेजों ने अंग्रेजी भाषा में समझौते के काग़ज़ बनवाकर राज्यों के राजाओं के हस्ताक्षर करवा के राज्य हथिया लिए। हमारे राजाओं को अंग्रेज़ी नहीं आती थी इसलिए वो उनके मकड़जाल में फंस गए।

जब भारत आज़ाद हुआ उस समय तक सभी बड़े नेता अच्छी अंग्रेज़ी जान लेते थे मगर फिर भी वह उसी मकड़जाल में फंस गए। संविधान के अनुच्छेद 343(1) में लिखा गया कि आगे के 15 वर्षों तक अंग्रेज़ी इस देश की संघ सरकार भाषा रहेगी और राज्य सरकार चाहे तो ऐसा कर सकती है। 1965 में अंग्रेज़ी हटाने की बात की जाएगी। एक संसदीय समिति बनाई जाएगी जो अपना विचार देगी और फिर राष्ट्रपति की अनुशंसा के पश्चात एक विधेयक बनेगा फिर इस देश में अंग्रेज़ी के स्थान पर हिंदी को प्रतिस्थापित किया जाएगा। उसी अनुच्छेद 343(3) में लिखा गया कि भारत के किसी एक भी राज्य ने हिन्दी का विरोध किया तो अंग्रेज़ी को नहीं हटाया जाएगा।

अनुच्छेद 348 में लिखा गया कि भारत में भले ही आम बोलचाल की भाषा हिन्दी रहे लेकिन सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट की अंग्रेज़ी ही प्रामाणिक भाषा रहेगी। 1955 में एक समिति बनी जिसने अपनी रिपोर्ट में कहा कि देश से अंग्रेज़ी हटाने का अभी अनुकूल समय नहीं है। 1963 में संसद में हिंदी को लेकर बहस हुई। 1965 में 15 वर्ष पूर्ण होने के उपरांत हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने की बात हुई तो दक्षिण में दंगे भड़क गए। 1968 में विधेयक पारित हुआ जिसमें कहा गया कि भारत का एक भी राज्य यदि अंग्रेज़ी का समर्थन करेगा तो देश में अंग्रेज़ी ही लागू रहेगी। नागालैण्ड में अंग्रेज़ी को राजकीय भाषा घोषित कर दिया जिसके पश्चात यह असंभव हो गया कि अंग्रेज़ी को इस देश से निकाला दिया जाए। सियासत का यह खिलवाड़ इस भाषा के साथ अब तक ज़ारी है…।

भारतेंदु हरीशचंद्र की इन पंक्तियों को आपके समक्ष प्रस्तुत करना चाहती हूँ…

“अंग्रेज़ी पढ़ जदपी सब गुन होत प्रवीन,

पे निज भाषा ज्ञान के रहत हीन के हीन।”

आखिर कहाँ गई हिंदी … ?

भले ही भारत सरकार हिंदी के प्रोत्साहन के लिए लाखों योजनाएं बनाती रहे लेकिन क्षेत्रीय स्तर पर राजनीति इतनी हावी हो जाती है कि कई बार हिंदी को पूरी तरह उपेक्षित कर दिया जाता है। पहली तारीख से पंजाब यूनिवर्सिटी में चल रहे नेशनल बुक ट्रस्ट और पीयू के सहयोग से चल रहे पुस्तक मेले में सभी साइन बोर्डों में हिंदी को पूरी तरह से ही नकार दिया गया है।

सरकार के इस उपक्रम में ही साइन बोर्डों में हिंदी की इतनी उपेक्षा है तो दूसरी जगह तो स्थिति और भी दुखदायी होगी। प्रबंधकों ने अंग्रेजी और पंजाबी में बड़े बड़े साइन बोर्ड तो टांग दिए, लेकिन हिंदी में एक भी शब्द लिखना अपनी तौहीन समझा। समझें तो बात कुछ भी नहीं, लेकिन पंजाब यूनिवर्सिटी जैसे संस्थान में प्रचार प्रसार में हिंदी की उपेक्षा होती है तो बात अखर जाती है। क्या आपको नहीं लगता कि हिंदी में भी साइन बोर्ड लिखा जाना चाहिए था। इससे हिंदी को सम्मान ही मिलता।

भारतवर्ष का पश्चिमीकरण बहुत चरम पर पहुंचता जा रहा है भारतवासी लम्बे समय तक गुलाम रहे हैं।

अंग्रेजी के शब्दों को जरा मेरी नजर से देखें

अंग्रेजी दुनियां की सबसे गरीब भाषा है। इस भाषा के पास ग्रामर नहीं है। इस भाषा में शब्द नहीं है। इस भाषा में गायन, राग नहीं है।

जैसे put, पुट‌, तो cut, कुट, But बुट होना चाहिए लेकिन नहीं, put पुट, cut कट, But बट इसलिए इसके पास ग्रामर नहीं है।

हिंदी भाषा और संस्कृत भाषा दुनिया की सबसे धनी भाषा है। अंग्रेजी में सूर्य के लिए केवल एक शब्द है। SUN, हिंदी में सूर्य के लिए सूर्य, रवि, दिवाकर सहित कुल 84 शब्द हैं। इसी प्रकार चन्द्रमा के लिए अंग्रेजी में एक शब्द MOON है। हिंदी में चंद्रमा के लिए कुल 56 शब्द हैं।

अंग्रेजी में मामा, चाचा, फूफा में कोई अंतर नहीं, एक शब्द Uncle, भाभी, मौसी, बुआ, मामी सब aunty कितना हास्यस्पद लग रहा है न…!

हमारी हिंदी वर्णमाला …

हिंदी वर्णमाला एक वैज्ञानिक पद्धति पर आधारित है। “क” के बाद “ख” और “ट” के बाद “ठ” क्यों..? “क” के बाद “च” या “ठ” क्यों नहीं?  कोई भी अक्षर वैसा क्यूं है, उसके पीछे कुछ कारण हैं, जरा देखिये तो …

क, ख, ग, घ, ङ- कंठव्य कहे गए, क्योंकि इनके उच्चारण के समय ध्वनि कंठ से निकलती है।

एक बार बोल कर देखिये… ।

च, छ, ज, झ, ञ- तालव्य कहे गए, क्योंकि इनके उच्चारण के समय जीभ तालू से लगती है।

एक बार बोल कर देखिये…।

ट, ठ, ड, ढ, ण- मूर्धन्य कहे गए, क्योंकि इनका उच्चारण जीभ के मूर्धा से लगने पर ही संभव है।

एक बार बोल कर देखिये…।

त, थ, द, ध, न- दंतीय कहे गए, क्योंकि इनके उच्चारण के समय जीभ दांतों से लगती है।

एक बार बोल कर देखिये…।

प, फ, ब, भ, म,- ओष्ठ्य कहे गए, क्योंकि इनका उच्चारण ओठों के मिलने पर ही होता है।

एक बार बोल कर देखिये…।

हम अपनी भाषा पर गर्व करते हैं ये सही है परन्तु लोगों को इसका कारण भी बताइए। इतनी वैज्ञानिकता दुनिया की किसी भाषा में नहीं है। अतः हम हिंदी भाषा के उपयोग को जाने और पहचाने…।

हिन्दी का महत्व …

हिंदी शब्द का संबंध संस्कृत शब्द सिन्धु से माना जाता है। ‘सिन्धु’सिन्ध नदी को कहते थे और उसी आधार पर उसके आस-पास की भूमि को सिन्धु कहने लगे। कहते हैं, ईरान की प्राचीन भाषा अवेस्ता में ‘स्’ध्वनि नहीं बोली जाती थी। ‘स’को ‘ह’रूप में बोला जाता था। जैसे संस्कृत के ‘असुर’शब्द को वहाँ ‘अहुर’कहा जाता था। अफ़ग़ानिस्तान के बाद सिन्धु नदी के इस पार हिन्दुस्तान के पूरे इलाके को प्राचीन फ़ारसी साहित्य में भी ‘हिन्द’, ‘हिन्दुश’के नामों से पुकारा गया है।

मान्यता है कि यह सिन्धु शब्द ही ईरानी में जाकर ‘हिन्दू’, हिंदी और फिर ‘हिन्द’हो गया। अरबी एवं फ़ारसी साहित्य में भारत (हिन्द) में बोली जाने वाली भाषाओं के लिए ‘ज़बान-ए-हिंदी’, पद का उपयोग हुआ है। भारत आने के बाद अरबी-फारसी बोलने वालों ने ‘ज़बान-ए-हिंदी’, ‘हिंदी जुबान’अथवा ‘हिंदी’ का प्रयोग दिल्ली-आगरा के चारों ओर बोली जाने वाली भाषा के अर्थ में किया। बाद में इसी क्षेत्र को खड़ी-बोली हिंदी का क्षेत्र कहा गया…।

हिंदी भाषा का इतिहास लगभग एक हजार वर्ष पुराना माना गया है। हिंदी भाषा व साहित्य के विद्वान अपभ्रंश की अंतिम अवस्था ‘अवहट्ठ’ से हिंदी का उद्भव मानते हैं, जिसे पं.चंद्रधर शर्मा गुलेरी ने ‘पुरानी हिंदी’ नाम दिया।

हिंदी का विस्तार …

हिंदी का क्षेत्र बहुत विशाल है तथा हिंदी की अनेक बोलियाँ (उपभाषाएँ) हैं। इनमें से कुछ में अत्यंत उच्च श्रेणी के साहित्य की रचना भी हुई है। कबीरदास, सूरदास, तुलसीदास, मीराबाई, मलिक मुहम्मद जायसी, बोधा, आलम, ठाकुर जैसे कवियों की रचनाएँ इसका उदाहरण हैं।

इन बोलियों में ब्रजभाषा और अवधी प्रमुख हैं। ये बोलियाँ हिंदी की विविधता हैं और उसकी शक्ति भी। वे हिंदी की जड़ों को गहरा बनाती हैं। हिंदी की बोलियों में प्रमुख हैं- अवधी, ब्रजभाषा, कन्नौजी, बुंदेली, बघेली, भोजपुरी, हरियाणवी, राजस्थानी, छत्तीसगढ़ी, मालवी, झारखंडी, कुमाउँनी, मगही आदि।

हम जानते हैं कि किसी भी आजाद देश की अपनी एक राष्ट्रभाषा होती है, जो उसका गौरव होती है तथा राष्ट्रीय एकता और राष्ट्र के स्थायित्व के लिए पूरे देश में उसका उपयोग होता है। इसी तरह देश की अपनी एक राजभाषा भी होती है, राजभाषा मतलब सरकारी कामकाज की भाषा और जिससे एक आम नागरिक भी सरकार के कामकाज को समझ सके।

हिंदी को भारत में राजभाषा का दर्जा प्राप्त है। किसी भी भाषा को राजभाषा बनने के लिए उसमें सर्वव्यापकता, प्रचुर साहित्य रचना, बनावट की दृष्टि से सरलता और वैज्ञानिकता, सब प्रकार के भावों को प्रकट करने की सामर्थ्य आदि गुण होने अनिवार्य होते हैं। यह सभी गुण हिंदी भाषा में हैं।

आजादी से पहले ही यह निर्णय ले लिया गया था कि स्वंत्रता के बाद भारत की राजभाषा हिंदी होगी। स्वतंत्र भारत की संविधान सभा ने 14 सितम्बर 1949 को ही हिंदी भाषा को भारत संघ की राजभाषा (Official Language of the Union) के रूप में मान्यता दे दी थी। भारत देश में अनेक राज्य हैं और उन सभी राज्यों की भी अपनी अलग-अलग भाषाएं हैं, इस प्रकार भारत एक बहुभाषी राष्ट्र है।

उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और दिल्ली आदि राज्यों की यह प्रमुख भाषा है। पंजाब, गुजरात, महाराष्ट्र और अंडमान निकोबार में इसे द्वितीय भाषा का दर्जा दिया गया है। बाकी प्रांतों में यदि कोई भाषा संपर्क-भाषा के रूप में प्रयोग की जा सकती है तो वह हिंदी ही है। आज भी हिंदी देश के कोने-कोने में बोली जाती है। यानी हिंदी राजभाषा, सम्पर्क भाषा, जनभाषा के स्तर को पार कर विश्वभाषा बनने की ओर अग्रसर है।

भाषा विकास क्षेत्र से जुड़े वैज्ञानिकों की भविष्यवाणी हिंदी प्रेमियों के लिए बड़ी सन्तोषजनक है कि आने वाले समय में विश्वस्तर पर अन्तर्राष्ट्रीय महत्त्व की जो चन्द भाषाएँ होंगी, उनमें हिंदी भी प्रमुख होगी। अहिंदी भाषी भी थोड़ी-बहुत और टूटी-फूटी हिंदी बोल और समझ सकता है। जाहिर है, यहां ज्यादातर लोग बातचीत करते समय हिंदी भाषा को ही प्राधान्य देते है, बचपन से ही हमें अपने घरों में हिंदी भाषा का ज्ञान दिया जाता है।

प्रसिद्ध विद्वान डॉ. राम मनोहर लोहिया ने प्रत्येक हिंदीभाषी क्षेत्र के निवासी को सलाह दी थी कि वे जहाँ, जिस क्षेत्र या प्रदेश में रह रहे हों, वहां की एक स्थानीय भाषा जरूर सीखें, उसका आदर करें, उसी स्थानीय भाषा को वहां पर बोलचाल में भी अपनाएं। इसी के साथ डॉ. लोहिया ने पूरे भारत के लोगों को हिंदी सीखने की सलाह भी दी थी, यही कारण है कि आज पूरे देश में हिंदी के प्रति अपनापन है। बल्कि भारत ही नहीं हिंदी दुनिया में सबसे ज़्यादा बोली जाने वाली भाषाओं में से एक है।

भारत के अलावा इंग्लैंड, अमेरिका, जापान, कोरिया, चीन, पकिस्तान, नेपाल, मॉरिशस, बंगलादेश, सूरीनाम आदि देशों में लोग हिंदी का खूब उपयोग कर रहे हैं। विश्व के अनेक विश्वविद्यालयों में हिंदी का पठन-पाठन हो रहा है। हिंदी न केवल अपने में एक बड़ी परंपरा, इतिहास, सभ्यता को समेटे हुए है, वरन् स्वतंत्रता संग्राम, जनसंघर्ष, वर्तमान के बाजारवाद के खिलाफ भी उसका रचना-संसार सचेत है।

आज हिंदी का महत्व इस कदर बढ़ गया है कि इसने आधुनिक तकनीकी को भी अपना लिया है। अब हिंदी बाज़ार, कम्प्यूटर, जनसंचार और रोज़गार का सहज माध्यम बन चुकी है। हिंदी से जुड़कर हम भारत ही नहीं, कमोबेश सारे विश्व से जुड़ सकते हैं…।

अंत में राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त की एक पंक्ति से आप सबको अवगत कराना चाहूँगी …

“है भव्य भारत ही हमारी मातृभूमि हरी-भरी।

हिन्दी हमारी राष्ट्रभाषा और लिपि है नागरी।।”

“जय हिंद…जय भारत”

©रीमा मिश्रा, आसनसोल (पश्चिम बंगाल)

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