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नींव की ईंट …

अमृतलालजी वेगड़। जिस प्रकार किसी सुन्दर प्रासाद का स्थायित्व उसकी नींव की दृढ़ता और किसी विशाल वृक्ष की सुदृढ़ता उसकी गहराई तक पहुंची जड़ों पर निर्भर करती है, उसी प्रकार किसी भी भाषा की पूरी समझ/पकड़ उसके वर्णमाला ज्ञान और शब्दज्ञान से पल्लवित हो मज़बूत बनती है. वर्णमाला वे नींव के पत्थर हैं , जिन्हें करीने से जमाकर ही भाषा के भवन का निर्माण होता है. महात्मा गांधी ने कहा था, ‘ बिना राष्ट्रभाषा के देश गूंगा होता है.’ इसी आधार पर यह भी कहा जा सकता है बिना भाषा के मनुष्य गूंगा है.

प्रिय कुमुद वर्मा ने गूंगों को वाणी देने के लिए भाषा की नींव तैयार की है, अपनी इस पुस्तक ‘हम तो बच्चे हैं’ के माध्यम से. उनका यह अनुपम प्रयास सराहनीय और बधाई के योग्य है. हिन्दी वर्णमाला हम सभी ने अपने बाल्यकाल में जोर जोर से बोल बोलकर पढ़ी है..पर उसी वर्णमाला को कुमुद जी ने इतने सुन्दर रूप में हर अक्षर से शुरू होने वाली कविता के द्वारा इन संगमरमरी पृष्ठों पर चित्रों के साथ इस प्रकार संजोया है कि वह देखते और छूते ही बनता है. काश! हमें भी अपने ज़माने में ऐसी ही सुन्दर, संगमरमरी स्पर्श वाली पुस्तक मिली होती.. 🙂

यह यूं तो वर्णमाला सिखाने वाली पुस्तक है, परन्तु मात्र वर्णमाला ही नहीं, यह एक काव्यमयी पुस्तक है जो बालकों को लिपी ज्ञान के साथ साथ शब्दज्ञान, लय, तुकांत शब्दों का ज्ञान , सामान्य ज्ञान तथा व्यावहारिक जानकारी भी सिखाती है. बॉलीवुड के निर्माता, गीतकार, कथाकार संदीप नाथ जी ने इन कविताओं को खिलौने की भाँती बताया है, जो शत-प्रतिशत सही है. सुन्दर नयन प्रिय चित्रों के साथ कविता में एक एक अक्षर संजोकर नन्हे -मुन्नों खिलौनों / झुनझुनों की भांति कुमुद जी ने इन्हें प्रस्तुत किया है, जिन्हें बच्चे हंसते हँसते , खेलते-कूदते बोलते बोलते कंठस्थ कर सकते हैं और जीवन पर्यंत भूल नहीं सकते.

इस पुस्तक के अप्रत्यक्ष रूप से दो खंड हैं.. एक वर्णमाला का , जिसमें वर्णमाला के अक्षर से और उससे संबंधित चित्र पर चतुष्पदी लिखी गई है, जैसे-ई से ईख – फिर ईख का चित्र देकर उसके बारे में एक चतुष्पदी लिखी है-

‘ लम्बी मोटी ईख छांटकर,

मम्मी ने उसको पिरवाया ,

फिर नींबू मसाला डालकर ,

ईख का रस मुझे पिलवाया.’

बहुत कम बच्चे जानते हैं कि गन्ने को ईख कहा जाता है. अक्सर वर्णमाला पढ़ते समय बच्चे प्रश्न करते हैं- ईख मायने क्या है?’ इसमें चित्र और उसके साथ दी गई इस चतुष्पदी से बिलकुल स्पष्ट हो जाता है कि ईख क्या है? तथा इसमें ‘पिरवाया ‘ शब्द एक रूढि शब्द आया है, जो शिक्षिका द्वारा समझाने पर बच्चों का शब्द ज्ञान बढ़ाएगा . इसी प्रकार इसमें अ से लेकर ह तक के अक्षरों की कविताएँ हैं. इसके लिए लेखिका साधुवाद की पात्र हैं.

दूसरे भाग में (हालांकि यह दर्शाया नहीं गया है) पर स्पष्ट ज्ञात होता है कि ये कविताएँ वर्णमाला की न होकर सम्भवत: मात्रा ज्ञान से सम्बंधित हो सकती हैं तथा पशु-पक्षी प्रेम तथा अपने परिजनों के प्रेम को दर्शाती हुई सी जान पड़ती हैं. जैसे – घोड़ा दौड़ा’ इसमें आ की मात्रा की बहुलता है. साथ ही इधर-उधर, दाएं-बाएँ, क्यों-किधर शब्दों से भी परिचित करवाती हैं.

इसी प्रकार बिल्ली , उल्ल्लू, हुदहुद, शेर, लोमड़ी, टोपीवाला , कौआ, मोर , साँप,आदि कविताओं के माध्यम से मात्रा-ज्ञान के साथ उनके सम्बन्ध में भरपूर जानकारी भी है.

कुल मिलाकर हम देखें तो यह पुस्तक कुमुद वर्मा जी की रचनाशीलता की परिचायक तो है ही, बालकों की रचना धर्मिता को विकसित करने वाली है.

इसका आवरण, मुद्रण, छवियाँ, सभी लाज़वाब हैं., इसमें प्रकाशक का और कुमुद जी का परिश्रम और सूक्ष्म अवलोकन झलकता है.

मेरी अनेकानेक शुभकामनाएँ हैं और पूर्ण विश्वास भी है कि यह अन्य पुस्तकों की भांति बेस्ट सेलर पुस्तक बनेगी.

अस्तु प्रिय कुमुद के लिए मैं इन्हीं शब्दों के साथ मैं विराम लेती हूँ-

‘सिलसिले कदमों के कुछ इस तरह चलते रहें,

बढ़ते रहें कदम निरंतर , पीछे निशान बनते रहें.’

कुमुद वर्मा की यह सृजनशीलता बनी रहे और नवीन पुस्तकें आती रहें इसी शुभकामना के साथ..बधाई..

 

पुस्तक : हम तो बच्चे हैं

लेखिका : सुश्री कुमुद वर्मा

प्रकाशक : ट्रू ड्रीम स्टार

मूल्य : २९९/-

समीक्षा- मंजु महिमा

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