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राष्ट्रानुकूल पीढ़ी के निर्माण में मील का पत्थर साबित होगी: शिक्षा-चिंतन

मानवीय मन सदा से जिज्ञासाओं का स्रोत रहा है। वैश्विक चिंतन में गूढ़ व गहन ज्ञान एवं विज्ञान की जितनी भी परम्पराओं का जन्म हुआ, उनके मूल में किसी न किसी तरह की जिज्ञासा ही उत्प्रेरक के रूप में कार्यरत रही है। यदि ब्रह्मा को जानने की जिज्ञासा न हुई होती तो ब्रह्मसूत्र, वेदांत व उपनिषदों का ज्ञान मानवता को कैसे मिल पाता?

ऐसी ही जिज्ञासा और उसके समाधान ढूँढते डॉ.भागीरथ कुमरावत ने अपने अनुभव के आधार पर शिक्षा-चिंतन नामक कृति का सृजन किया।

आज इस भारतभूमि को आध्यात्मिक दृष्टि संपन्न, पवित्र भावों से ओत-प्रोत, प्रखर सोच से अभिपूरित क्रांतिदूतों की आवश्यकता है। आध्यात्मिकता का अर्थ बाह्य आडंबर से नहीं होता, बल्कि इसका अर्थ तो जीवन की सही व संपूर्ण समझ से होता है, इसका अर्थ तो व्यक्तित्व के परिशोधन से एवं चेतना के जागरण से होता है। आज भारतभूमि को ऐसे क्रांतिदूतों की अभीप्सा है कि जिनकी हुँकार के आगे साम्राज्य सिमटने लगते हैं, सिंहासन डोलने लगते हैं और नया युग, धरती फाड़कर आकाश की छाती पर जा बैठता है। जिन-जिन के हृदय में भी भारतीय संस्कृति की विरासत के प्रति गौरव का भाव अभी शेष है, उन सबको अपने-अपने अंतस् में क्रांति के दीप को आज से व अभी से प्रदीप्त करने की ज़रूरत है।

किसी भी साहित्यकार का व्यक्तित्व उसकी वाणी में और उसके लेखन में झलकता है।

प्रत्येक साहित्य के माध्यम से हमें कुछ न कुछ शिक्षा ही प्राप्त होती है, चाहे वह किसी भी विषय से सम्बंधित हो।

शिक्षा के क्षेत्र में कार्य करते हुए 35 वर्षों के सुदीर्घ अनुभव, जिसको लेखक ने जिया उसी के आधार पर ये पुस्तकाकार रूप में पाठकों के सम्मुख प्रस्तुत है।

डॉ.भागीरथ कुमरावत की सद्ध प्रकाशित पुस्तक शिक्षा-चिंतन जिसके प्रकाशक हैं इन्द्रा पब्लिशिंग हाउस भोपाल, आज लोक को अर्पित हुई। जिसके हम सभी साक्षी बने हैं।

डॉ.भागीरथ कुमरावत ने शिक्षा-चिंतन में इक्कीस शीर्षकों के माध्यम से विषय-वस्तु को समझाने का सार्थक प्रयास किया है। इस पुस्तक के मूल में शिक्षा, शिक्षक और बालक हैं।

विद्यालयीन शिक्षा नींव निर्माण की शिक्षा होती है। इस समय बच्चे के चरित्र का निर्माण होता है। बच्चों में अनुकरण और अनुसरण की प्रवृत्ति सहज होती है। घर में बच्चे माता-पिता, भाई-बहन का अनुकरण करते हैं तो वहीं विद्यालय में बच्चे अपने शिक्षक के जीवन से नैतिक मूल्यों की शिक्षा और पाठ्यवस्तु के माध्यम से विषयों का ज्ञान प्राप्त करते हैं, इसीलिए प्रारम्भिक शिक्षा ग्रहण करते समय-पाठ्यवस्तु में मूल्यों का निहित होना बहुत आवश्यक है। अतः प्रारम्भिक शिक्षा में शिक्षक की भूमिका अति महत्वपूर्ण होती है।

स्वतंत्रता के पाँच, दस नहीं बल्कि पूरे सत्तर साल बाद आज हम जान पाये हैं कि हमारी युवा पीढ़ी में जीवन मूल्यों का अभाव दिखाई देता है। इसका स्पष्ट कारण है वर्तमान शिक्षा प्रणाली में मूल्यों की अनदेखी का होना।

हमें स्वतंत्रता के बाद राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली की व्यवस्था में परिवर्तन करना था जिसका पालन नहीं हुआ। अंग्रेज़ी शिक्षा व्यवस्था अपनाकर हम राष्ट्रीयता से ओत-प्रोत नई पीढ़ी का निर्माण करेंगे ये हमारी भूल थी।

अपने देश का भविष्य उज्जवल बनाना है, तो हमें अपनी संस्कृति और जड़ों की ओर लौटना होगा।

सहज, सरल शैली में रचित शिक्षा-चिंतन से जुड़ी घटनाओं, समस्याओं, चुनौतियों का समाधान ढूँढते विषयों पर चिंतन है तो वहीं राष्ट्र का सर्वांगींण विकास केवल शिक्षा द्वारा संभव है, इन सारी बातों का समग्र विकास प्रतिमान भी उपलब्ध है।

इस पुस्तक को पढ़कर सभी सुधि जन अपने-अपने स्थान एवं विद्यालयों को उत्कृष्टता की ओर ले जाने में सार्थक क़दम बढ़ा पाएँगे।

इसकी विषय-वस्तु विशेषकर, विद्यार्थियों, शिक्षकों, प्राचार्यों, अभिभावकों, शिक्षाविदों एवं विद्यालयों के प्रबंधन से जुड़े लोगों तथा शिक्षा विभाग के कर्मचारियों-अधिकारियों के लिए शिक्षा-चिंतन बहुउपयोगी सामग्री सिद्ध होगी।

शिक्षा जगत में इस कृति का स्वागत होगा। विद्यालयों की गिरती साख, शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार तथा देश की भावी पीढ़ी को राष्ट्रभक्त, प्रतिभावान, चरित्रवान बनाकर हम अपने देश को उन्नतिशील बना सकेंगे। डॉ.भागीरथ कुमरावत को इस सार्थक कृति हेतु बधाई एवं शुभकामनाएँ!

कृति समीक्षक :-

 ©डॉ. प्रीति प्रवीण खरे, भोपाल मध्य प्रदेश                       

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