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चातुर्मास व्रत: आत्म कल्याण का मार्ग …

अयोध्या (डॉ. दीपिका उपाध्याय) । सनातन धर्म की मान्यताओं में चातुर्मास व्रत बड़ा ही महत्वपूर्ण है। वर्तमान समय में जब अश्वमेध, राजसूय, वाजपेय जैसे यज्ञों का नाम उल्लेख मात्र पौराणिक कथाओं में सुनाई पड़ता है, तब इनके आयोजन और पुण्य लाभ की चर्चा व्यर्थ है। ऐसे में कलिकाल में इन यज्ञों के पुण्य लाभ के लिए चातुर्मास व्रत का आयोजन किया जाता है। यहाँ प्रथम प्रश्न तो यही उठता है कि आखिर चातुर्मास व्रत कौन लेता है? इस संबंध में पौराणिक आख्या यह है कि प्राचीन काल से ऋषि- मुनि और राजा वर्षाकाल में एक ही स्थान पर रुक जाते थे। ऋषि मुनि वहीं रहकर विद्या- अध्ययन, सत्संग, प्रवचन आदि करते थे और राजाजन एवं प्रजा उनके प्रवचनों का लाभ लेते थे। आज इस वृहद परंपरा का निर्वहन शंकराचार्य और दंडी संन्यासियों के ही द्वारा किया जा रहा है। दण्डी संन्यासियों को ही सामान्य तौर पर संन्यासी भी कहा जाता है।

जगतगुरु शंकराचार्य ज्योतिष पीठ एवं द्वारका शारदा पीठाधीश्वर स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती महाराज के शिष्य दण्डी संन्यासी स्वामी सदाशिव ब्रह्मेंद्रानंद सरस्वती संन्यासियों की इस परंपरा के विषय में बताते हैं। वे कहते हैं कि  इसका सबसे बड़ा लाभ यह है कि चातुर्मास व्रत के कारण जन सामान्य को संन्यासियों का प्रवचन लाभ मिल जाता है। परिव्राजक होने के कारण संन्यासी का एक स्थान पर अधिक समय रुकना निषिद्ध है। तीर्थ स्थानों में यह बाध्यता नहीं होती किंतु तीर्थ स्थान की जनसंख्या पूरे देश की तुलना में नगण्य होती है। अतः चातुर्मास में संन्यासी के एक ही स्थान पर रुकने से गृहस्थ लोगों को संत- सेवा का पुण्य लाभ मिल जाता है।

एक स्वाभाविक जिज्ञासा यहां पर होती है कि चातुर्मास के नाम से लग रहा है कि यह 4 माह का व्रत है फिर संन्यासी दो ही मास का व्रत क्यों करते हैं? शास्त्रों में संन्यासी के एक पक्ष को भी मास के समान माना गया है। इस प्रकार श्रावण और भाद्रपद मास के चार पक्ष ही चातुर्मास माने जाते हैं। इसके पीछे का प्रथम कारण तो यही है कि गृहस्थों के लिए 4 माह का समय सेवा व्रत के लिए बहुत अधिक है। इतने समय तक व्रत की मर्यादा का निर्वाह गृहस्थों के लिए कठिन होता है। दूसरे संन्यासी का भिक्षा का नियम 4 माह की लंबी अवधि में टूट सकता है। जिसे अन्य लोग  भोजन कहते हैं संन्यासी के लिए उसे भिक्षा कहा जाता है। भिक्षा के संबंध में सभी संन्यासियों के अपने नियम होते हैं। किंतु एक ही घर की भिक्षा कई दिनों तक लगातार नहीं लेनी चाहिए यह सामान्य नियम है। इसी कारण से 4 माह के स्थान पर 2 माह की अवधि कर दी जाती है।

संन्यासी की भिक्षा साक्षात नारायण का भोग मानी जाती है, इसलिए उसमें शुद्धता का विशेष ध्यान रखा जाता है। कुछ संन्यासी एक ही समय भोजन करते हैं तो कुछ पूरे चातुर्मास में मात्र फलाहार ही करते हैं। चातुर्मास में भौगोलिक सीमा का ध्यान रखा जाता है। मुख्य सीमा रेखा नदी रहती है। संन्यासी चातुर्मास के दौरान नदी का लंघन नहीं करते।

वैसे तो अधिकांश संन्यासी नियमित रुप से सामान्यजनों के संपर्क में नहीं आते किंतु चातुर्मास में सामान्यजनों को यह सौभाग्य प्राप्त हो जाता है। इसमें कुछ बातों का ध्यान गृहस्थों को रखना चाहिए। संन्यासी को स्पर्श नहीं करना चाहिए ना ही उनके आसन पर बैठना चाहिए। स्मरण रहे, संन्यासी चारपाई पर कभी नहीं बैठते। उनके लिए चौकी या तख्त पर ऊनी आसन बिछाया जाना चाहिए। संन्यासी को स्पर्श ना करने का कारण उनका नारायण स्वरूप होना है और विग्रह को स्पर्श करने का अधिकार सबको नहीं होता। संन्यासी के आसन पर या समान ऊंचाई के आसन पर ना बैठने का भी यही कारण है। कुल मिलाकर संन्यासियों के नियम जटिल भी हैं किंतु चातुर्मास के दौरान सामान्य गृहस्थ भी संन्यासियों की सेवा का पुण्य लाभ प्राप्त कर सकते हैं। साथ ही संन्यासियों के इन कठोर और अनिवार्य नियमों से सच्चे संन्यासी और ढोंगी भगवाधारी में अंतर भी कर सकते हैं।

 आजकल बहुत से तथाकथित संन्यासी अपने ही आसन पर किसी सामान्य गृहस्थ को बैठाये हुए अथवा साथ भोजन करते हुए दिखाई दे रहे हैं। इसे अज्ञजन उनकी सरलता समझते हैं वस्तुतः यह ढोंगी भगवाधारियों और संतों के बीच का भेद है। वास्तविक संन्यासियों के नियम कठोर होते हैं तथा वे इंद्रिय सुख से दूर रहते हैं। यही सच्चे सनातनी संतों की पहचान है।

(जैसा स्वामी सदाशिव ब्रह्मेंद्रानंद सरस्वती ने बताया।)

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