धर्म

शिव… कौन हैं शिव?

शिव… कौन हैं शिव?
क्या वो सिर्फ़ एक नाम हैं…
या एक एहसास?
कभी कभी मैं सोचती हूँ
क्या मैं उन्हें कभी छू पाऊँगी अपने मन से?
या, क्या मैं उन्हें कभी देख पाऊँगी अपनी आँखों से?
इन सभी प्रश्नों का उत्तर मैं आपको इस कविता की आखिरी पंक्ति पर दूंगी…

शिव शोर में नहीं मिलते!
शिव मिलते हैं उस गहरी शांति में,
इस अनंत सृष्टि की पवित्र खामोशी मैं
जहाँ मन भी शांत हो जाता है,
और दिमाग भी ठहर जाता है।

जब हमारे भीतर दौड़ती हुई
दुनिया भर की चिंताएँ, आवाज़ें, विचार सब एक पल के लिए थम जाते हैं…
और बस दिल की धड़कन सुनाई देती है…
वहीं कहीं शिव मुस्कुरा रहे होते हैं
उस ठहराव में,
उस सन्नाटे में…

जब मैं आकाश में वह चमकता हुआ चाँद देखती हूँ, तो मुझे सिर्फ़ एक उजाला नहीं दिखता, मुझे
वह नूर से भरी आँखे, वह शांत, तेजस्वी चेहरा, वह नीलकंठ, जिनकी आभा स्वयं चंद्रमा से भी अधिक शीतल है…

और जब भी मैं कहीं पानी को बहते हुए देखती हूँ,
तो लगता है जैसे माँ गंगा
उनकी जटाओं से निकलकर
लहराती हुई मुझ तक आ रही हों।

जब मैं किसी विशाल वृक्ष को देखती हूँ, उसकी लहराती शाखाएँ मुझे
शिव की जटाओं सी प्रतीत होती हैं, जैसे प्रकृति स्वयं उनके रूप में सजी हो…
उसकी ठंडी छाँव में
मुझे ध्यानमग्न शिव दिखाई देते हैं!
शांत…स्थिर…अडोल।

हर पत्ते में…
हर बेलपत्र में…
हर छोटे से जीव में…
चाहे वह कुत्ता हो, चींटी हो या मकड़ी…
मुझे हर रूप में, हर कण में
बस शिव ही शिव दिखाई देते हैं।

क्योंकि सच तो यही है
शिव कहीं बाहर नहीं,
वह तो इस सृष्टि के हर अंश में बसे हैं।

और वो भी जो हमारे अंदर के अहंकार, दुख और डर को मिटा देते हैं।
आप विनाश नहीं…बदलाव हैं।
आप अंत नहीं…नई शुरुआत हैं।

ऐसा मिलन…
जो मुझे रोज़ मिले।
प्रकृति के हर मोड़ पर…
हर छोटे-से छोटे बारीकियों में…
जहाँ नज़र ठहरे, वहाँ शिव मिले

हर हवा के झोंके में
कभी उनका रौद्र रूप महसूस हो
जैसे तूफ़ान की शक्ति से
और उसी हवा की कोमल छुअन में
उनका शांत स्वरूप दिखे
जैसे ध्यान में लीन महादेव।

ऐसा मिलन…
जो एक क्षण का नहीं,
हर दिन का हो।
जहाँ देखूँ…
जिसे देखूँ…
वहाँ मुझे बस शिव ही मिलें।

इसलिए तो शिव और शक्ति एक हैं।
वो अलग नहीं…
एक ही सत्य के दो रूप हैं।
जो निखरते हैं उस शून्य से…
उस अनंत के शुरुवात से
जहाँ से सृष्टि की पहली ध्वनि जन्म लेती है।

इस शोर से भरी दुनिया के भीतर भी
एक गहरी शांति छिपी होती है…
और उसी मौन की गहराई से
शिव और शक्ति प्रकट होते हैं।
जहाँ सब कुछ समाप्त सा लगता है,
वहीं से एक नई शुरुआत जन्म लेती है।
जहाँ “में” और “तुम” मिट जाते हैं,
और बस “हम” रह जाते हैं…
वही हैं शिव!

शिव कहीं बाहर नहीं…
शिव मेरे अंदर हैं।
मैं शिव हूँ…
और शिव मुझमें हैं।
हर हर महादेव।
ॐजय श्री महाकालॐ

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