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प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में एमबीबीएस डॉक्टर के बदले बीएससी पास नर्सेस करेंगी इलाज …

रायपुर । एमबीबीएस पास विद्यार्थी भटक रहे हैं और इधर सरकार ने प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में बीएससी नर्सिंग में पास छात्राओं की पदस्थापना कर रही है। ग्रामीण क्षेत्रों की स्थिति यह है कि लोग कम्पाउंडर, नर्स से लेकर चपरासी तक से इलाज करवाने मजबूर हैं। विदेशों से एमबीबीएस करके भारत आने वाले छात्र-छत्राओं को फिर से एमसीआई परीक्षा लेती है। उसके कसौटी पर खरा उतरना होता है लेकिन नर्सिंग पास वालों के लिए ऐसा कुछ नियम नहीं है।

भारत ग्रामों का देश है। भारत की लगभग ८० प्रतिशत आबादी ग्रामों में रहती है। केन्द्रीय एवं राज्य सरकार का स्वास्थ्य मंत्रालय इन अस्सी प्रतिशत आबादी के लिए दिखाने के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में जनता को स्वास्थ्य सुविधा देने के नाम पर प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र खोल दिए हैं। एमबीबीएस डाक्टर के पद भी स्वीकृत कर दिए हैं परन्तु डाक्टरों की पदस्थापना ९० प्रतिशत प्राथमिक स्वास्थ्य केन्दों में नहीं हुआ है। लोग कम्पाउंडर, नर्स, वार्ड ब्वाय, चपरासी से इलाज कराने के लिए विवश हैं।

देश के सरकारी एवं निजि मेडिकल कालेजो से उत्तीर्ण डाक्टर सरकार के तमाम कोशिशों के बावजूद ग्रामों के इन प्राथमिक स्वास्थ्य केंन्द्रों में सेवा देने के लिए तैयार नहीं है। यदि कदाचित किसी डाक्टर की पदस्थापना प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों में हो भी गई है तो वे शहरी स्वास्थ्य केंद्रो में संलग्नीकरण के तहत सेवाएं देते मिलेंगे।

स्वास्थ्य मंत्रालय के एमसीआई– बीओजी द्वारा शायद विदेशी मेडिकल कालेजों से एमबीबीएस उत्तीर्ण छात्रों के डिग्री को गुणवत्ता की कसौटी में परखने की कोशिश किया जा रहा है तो क्या प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों का नाम हेल्थ एवं वेलनेस सेंटर करके वहां एमबीबीएस के बदले बीएससी नर्सिंग पास नर्स के इलाज से स्वास्थय विभाग में गुणवत्ता आएगा।

इसलिए विदेशों के विश्वविद्यालयों से एमबीबीएस कर भारत आए भारतीय छात्रों ने भारतीय स्वास्थ्य मंत्रालय एमसीआई-बीओजी से ग्रामीण क्षेत्रो के प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रो में स्थाई या संविदा रुप में डाक्टर के पद पर सेवा में नियूक्त करने या फिर नीट पीजी की तरह फारेन मेडिकल ग्रेजुएट्स इग्जाम में पासिंग अंक ३० प्रतिशत करने की मांग किये हैं। जिससे ग्रामीण जनता को प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रो में बीएससी नर्सिंग उत्तीर्ण नर्स के बदले एमबीबीएस डाक्टर मिल सके। आज कोरोना काल में तो विदेशों से एमबीबीएस डाक्टरों की पदस्थापना समय की माँग भी है।

नीट पीजी की तरह पासिंग अंक ३० प्रतिशत फारेन मेडिकल ग्रेजुएट्स इग्जाम के लिए क्यों नहीं किया जा रहा है। यह सवाल वर्तमान एवं पूर्व दर्जनों विदेशी डिग्री धारी छात्रों से पूछा गया। छात्रों ने बताया कि दिल्ली सहित देश के बडे शहरो में उक्त इग्जाम के नाम पर कोचिंग चलाने वालो का एक मालामाल ग्रुप है जिनका केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय –एमसीआई –बीओजी से सांठगांठ है यदि फारेन मेडिकल ग्रेजुएट्स इग्जाम अंक को ३० प्रतिशत कर दिया जाता है तो बहुत से कोचिंग सेंटर बंद हो जाऐंगे

सांसद अरुण साव ने कहा- २०२० में छात्रों की मांग पर केन्द्रीय स्वास्थय मंत्री को पत्र लिखा था एक बार फिर से छात्रों के हित में नीट पीजी की तरह पासिंग अंक ३०प्रतिशत कराने प्रयास करुंगा।

अरुण साव, सांसद, बिलासपुर.

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