मध्य प्रदेश

चावल की खेती से निकलती है मीथेन गैस, ग्लोबल वार्मिंग पर IISER भोपाल की रिसर्च ने खींचा ध्यान

भोपाल
 आपकी प्लेट में रखा चावल धान के जिन खेतों से आता है वो न सिर्फ जहरीली मीथेन गैस वातावरण में छोड़ते हैं बल्कि ये ग्लोबल वॉर्मिंग भी बढ़ा रहे हैं। आईसर भोपाल और इंटरनेशनल राइस रिसर्च इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिकों ने पर्यावरण को लेकर एक रिसर्च लेटर प्रकाशित किया है। इनके शोध में जो बात सामने आई है वो बहुत चौकाने वाली है।

देश के पानी से भरे धान के खेत जो दुनिया की एक बड़ी आबादी का पेट भर रहे हैं वो हर साल पर्यावरण में 97 लाख टन मीथेन गैस छोड़ रहे हैं। कार्बनडाई ऑक्साइड की तुलना में मीथेन गैस पर्यावरण में कम समय के लिए रहती है, लेकिन यह अपने अंदर गर्मी को बनाए रखती है। इसकी वजह से ग्लोबल वॉर्मिंग में बढ़ोतरी होती है।

दोनों संस्थानों के वैज्ञानिकों ने इसके लिए यूरोप कॉपरनिकस प्रोग्राम के सैटेलाइट डाटा का उपयोग किया। इसमें 10 मीटर रिजॉल्यूशन पर धान के खेत का नक्शा बनाया गया। इसमें यह सामने आया कि मीथेन गैस का उत्सर्जन सबसे ज्यादा कहां और कब होता है।

इस शोध से जुड़े आईसर के वैज्ञानिकों की माने तो अकेले मॉनसून के मौसम में बोई जाने वाली खरीफ फसल से ही देश में चावल से जुड़ी मीथेन का लगभग तीन-चौथाई हिस्सा निकलता है। देश के ज्यादातर इलाकों में चावल हमारे खाने की थाली का एक मुख्य हिस्सा होता है। लेकिन यही देश के जलवायु पर पड़ने वाले असर का एक बड़ा कारण निकलकर सामने आया है।

धान के खेतों से मीथेन गैस निकलने की वजह
धान पानी से भरे खेतों में होती है, इसलिए इसमें ऑक्सीजन की कमी होती है। यहीं पर सूक्ष्मजीव कार्बनिक पदार्थों को सड़ाकर मीथेन गैस को छोड़ते हैं। खेती की यह प्रक्रिया बहुत पुरानी है, लेकिन इससे पर्यावरण पर लगातार प्रभाव पड़ रहा है। देश में करीब चार करोड़ हेक्टेयर जमीन पर चावल की खेती की जाती है। यह जितना लोगों की आजीविका का साधन है उतना ही हवा को नुकसान पहुंचाने वाला भी है।

मीथेन के उत्सर्जन में हो सकती है 25 प्रतिशत की बढ़ोतरी
इस शोध में जो बात सामने है उसमें बताया गया है कि अगर आने वाले समय में तापमान में बढ़ोतरी होती है और बारिश का पैटर्न भी बिगड़ता है तो मीथेन गैस के उत्सर्जन में 25 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी हो सकती है। इससे खेती की पैदावार और इससे होने वाजी आजीविका पर भी असर पड़ेगा। इसमें शोधकर्ताओं का कहना है कि मीथेन पर इस शोध को हमें और व्यापक स्तर पर करने की आवश्यकता है।

वैज्ञानिकों ने बताई बड़ी वजह

शोधकर्ताओं ने यह महत्वपूर्ण अध्ययन किया है, जिसे विज्ञान जगत की प्रतिष्ठित पत्रिका 'नेचर फूड' जर्नल में जगह मिली है. इस शोध में साफ तौर पर बताया गया है कि साल 2001 से लेकर 2020 के बीच के दो दशकों में पूरे एशिया महाद्वीप में चावल के उत्पादन के कारण ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में सबसे ज्यादा बढ़ोतरी दर्ज की गई है। 

धान के खेत ग्लोबल वार्मिंग से कैसे जुड़े?
आखिरकार धान की खेती से पर्यावरण को इतना नुकसान कैसे पहुंच रहा है, इसे समझना बहुत जरूरी है. वैज्ञानिकों ने अपनी रिपोर्ट में विस्तार से समझाया है कि धान की फसल को तैयार करने के लिए खेतों को लंबे समय तक पानी से भरकर जलमग्न रखना पड़ता है. जब यह खेत पानी से पूरी तरह भरे रहते हैं, तो वहां की मिट्टी में ऑक्सीजन की कमी हो जाती है. ऐसी स्थिति में वहां मौजूद बैक्टीरिया बड़ी मात्रा में मीथेन गैस पैदा करने लगते हैं. इसके साथ ही इन खेतों से नाइट्रस ऑक्साइड गैस भी बाहर निकलती है। 

इसलिए बढ़ रहा है तापमान
यह दोनों ही गैसें कार्बन डाइऑक्साइड के मुकाबले वातावरण में गर्मी को रोकने में कहीं ज्यादा खतरनाक और असरदार होती हैं. यह गैसें हमारे वायुमंडल में एक मोटी परत बना लेती हैं जो सूरज की गर्मी को वापस अंतरिक्ष में जाने से रोक देती है. इसके कारण धरती का तापमान लगातार बढ़ रहा है और ग्लोबल वार्मिंग का खतरा गहराता जा रहा है। 

दुनिया में धान की खेती से कितना बढ़ रहा है प्रदूषण?
इस पूरे मामले को गहराई से समझने के लिए शोध दल के प्रमुख और बोस्टन कॉलेज के प्रोफेसर हानक्विन तियान की देखरेख में एक बड़ा विश्लेषण किया गया. इस शोध के दौरान वैज्ञानिकों ने 21 हजार से भी ज्यादा क्षेत्रीय आंकड़ों को खंगाला. इसके साथ ही इस काम में आधुनिक मशीन लर्निंग तकनीक और वैश्विक स्तर के विश्लेषण का सहारा लिया गया ताकि नतीजे पूरी तरह सटीक आ सकें। 

पूर्वी एशिया में मीथेन का उत्सर्जन सबसे ज्यादा
इस तकनीक से सामने आए नतीजों से पता चला है कि पूर्वी एशिया के देशों में मीथेन का उत्सर्जन सबसे ज्यादा दर्ज किया गया है. वहीं दूसरी तरफ, अफ्रीका महाद्वीप में अब धान की खेती का चलन बहुत तेजी से बढ़ रहा है, जिसके कारण वह भी अब इस मामले में एक नया हॉटस्पॉट बनकर उभर रहा है. साल 2001 से 2020 के आंकड़ों को देखें तो दुनिया भर में धान के खेतों से होने वाले कुल उत्सर्जन में अकेले एशिया की हिस्सेदारी 90 प्रतिशत से भी ज्यादा रही है. इसमें भी दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों का योगदान सबसे आगे पाया गया है। 

मीथेन गैस क्यों है इतनी खतरनाक?
मीथेन जमीनी-स्तर के ओजोन के बनने में मुख्य भूमिका निभाती है. यह एक खतरनाक वायु प्रदूषक और ग्रीनहाउस गैस है, जिसके संपर्क में आने से हर साल 10 लाख लोगों की समय से पहले मौत हो जाती है. मीथेन एक शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैस भी है. 20 साल की अवधि में, यह कार्बन डाइऑक्साइड की तुलना में 80 गुना ज्यादा गर्मी पैदा करती है। 

औद्योगिक काल से पहले 30 प्रतिशत था मीथेन का योगदान 
औद्योगिक काल से पहले के समय से अब तक ग्लोबल वार्मिंग में मीथेन का योगदान लगभग 30 प्रतिशत रहा है, और 1980 के दशक में रिकॉर्ड रखना शुरू होने के बाद से यह किसी भी अन्य समय की तुलना में तेजी से बढ़ रही है. असल में, यूनाइटेड स्टेट्स नेशनल ओशनिक एंड एटमॉस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन के आंकड़ों के अनुसार, 2020 में महामारी से जुड़े लॉकडाउन के दौरान जब कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन की गति धीमी हुई, तब भी वायुमंडलीय मीथेन का स्तर तेजी से बढ़ गया। 

खेती के विस्तार से बढ़ी मुसीबत
शोधकर्ताओं ने अपनी रिपोर्ट में इस बात का भी अंदेशा जताया है कि आने वाले समय में चावल की खेती का दायरा और ज्यादा फैलने वाला है. आंकड़ों के अनुसार, साल 2015 में दुनिया भर में करीब 39.7 करोड़ एकड़ जमीन पर धान उगाया जा रहा था, जिसके साल 2024 तक बढ़कर 42.6 करोड़ एकड़ तक पहुंचने का अनुमान लगाया गया है। 

उतसर्जन के पीछे 2 बड़ी वजह
इस बढ़ते उत्सर्जन के पीछे मुख्य रूप से दो बड़ी वजहें काम कर रही हैं. पहली वजह यह है कि विकासशील देशों में आबादी की भोजन संबंधी जरूरतों को पूरा करने के लिए धान की खेती का बहुत तेजी से विस्तार किया जा रहा है. दूसरी बड़ी वजह यह है कि आजकल किसान फसल की कटाई के बाद बचे हुए अवशेषों को पानी से भरे खेतों में ही वापस मिला देते हैं. जब यह अवशेष पानी के अंदर सड़ते हैं, तो इनसे मीथेन गैस बनने की रफ्तार कई गुना ज्यादा बढ़ जाती है। 

भारत के लिए क्यों बड़ी चुनौती है यह मुद्दा?
भारत में धान की खेती अब बड़ी चुनौती बनती जा रही है. इसकी सबसे बड़ी वजह पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधनों पर बढ़ता दबाव है. धान की फसल को बहुत अधिक पानी चाहिए, जिससे खासकर पंजाब और हरियाणा जैसे राज्यों में भूजल तेजी से घट रहा है. कई इलाकों में जलस्तर हर साल करीब 0.7 मीटर नीचे जा रहा है। 

धान की खेती का असर सिर्फ पानी तक सीमित नहीं
धान आधारित खेती का असर सिर्फ पानी तक सीमित नहीं है. हर साल करीब 9.2 करोड़ टन पराली जलाने से दिल्ली-एनसीआर में सर्दियों के दौरान प्रदूषण और स्मॉग बढ़ता है. वहीं, जरूरत से ज्यादा यूरिया इस्तेमाल करने से मिट्टी की गुणवत्ता खराब हो रही है और पानी भी दूषित हो रहा है. विशेषज्ञों के अनुसार, धान के खेत देश के कुल मीथेन उत्सर्जन का लगभग 11% हिस्सा पैदा करते हैं. तापमान में 1 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी से धान की पैदावार करीब 6% तक घट सकती है. बिहार और पश्चिम बंगाल के कुछ इलाकों में भूजल में आर्सेनिक की मात्रा भी चिंता बढ़ा रही है। 

 

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