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बेबहर …

गजल

घर से आज निकलने में डर लगता है

हर ओर तबाही का मंजर लगता है

जाती है जिस ओर मिरी नजरें भी अब

खामोशी का एक समुंदर लगता है

घर घर फैली मायूसी सहमी नजरें

हर घर बीमारी का ही घर लगता है

और नहीं ग़र समझो ज्यादा इसको तुम

कुदरत का घनघोर सा कहर लगता है

मजदूरों की बेगारों की क्या कहिये

दामन इनका अश्कों से तर लगता है

पर सब कुछ अच्छा जल्दी हो जाएगा

न जाने क्यों मुझको अक्सर लगता है

©डॉ रश्मि दुबे, गाजियाबाद, उत्तरप्रदेश       

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