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कई समस्याओं का निचोड़ है शिरीष खरे की किताब ‘एक देश बाहर दुनिया’ में …

पुस्तक समीक्षा

प्रभात रंजन । शिरीष खरे की किताब ‘एक देश बारह दुनिया’ कई दिन पहले आ गई थी। मैं इस किताब को यात्रा वृत्तांत समझकर पढ़ना मुल्तवी किए हुए था। यात्रा पर कहीं जा नहीं पा रहा ऐसे में यात्रा की किताब क्या पढ़ना। आज पढ़ना शुरू किया तो अफ़सोस हुआ कि जिस तरह किसी इंसान को लेकर पूर्व धारणा नहीं बनानी चाहिए उसी तरह किसी किताब को बिना पढ़े उसके बारे में राय नहीं बनाई चाहिए। शीर्षक पर लिखे ‘हाशिए पर छूटे भारत की तस्वीर’ पढ़कर समझना चाहिए था कि किताब का कलेवर अलग है। लेकिन मन में धारणा बनी हुई थी कि यात्रा की किताब है। है तो यह यात्राओं से ही उपजी किताब लेकिन ‘न्यू इंडिया’, ‘स्मार्ट सिटी’ के दौर में ‘भारत माता ग्राम वासिनी’ की यात्रा है।

शिरीष खरे ने लंबे समय तक पत्रकारिता की है और ज़मीनी पत्रकारिता की है। इस किताब के स्थलों, पात्रों से परिचित होना अभाव भरे भारत के उस रूप से परिचित होना है जो न जाने कब से उपेक्षित है, वंचित, अपने पहचान के लिए, अपने अधिकार के लिए संघर्ष कर रहे हैं। चाहे वे महाराष्ट्र के मेला घाट के कुपोषित, संघर्षरत आदिवासी हों या मुंबई के कमाठीपुरा की सेक्स वर्कर्स के जीवन की कथाएँ। कमाठीपुरा और नागपाड़ा के जीवन की बहुत अंतरंग झांकियाँ हैं इस किताब में, उस रहस्यमय रूमान से अलग जो ऐसे इलाक़ों को लेकर हमारी कल्पनाओं में रहा है या जितना हमने वेश्याओं के क़िस्से कहानियों से जाना है।

किताब में मराठवाड़ा की घुमंतू जनजातियों के जीवन के दृश्य हैं, नट समुदाय, मदारी समुदाय के जीवन को लेखक ने करीब से देखा और उनके बारे में मार्मिक ढंग से लिखा है। जो बंजारे अपनी कला से कभी लोगों का मनोरंजन करते थे आज उनको देश के आम नागरिक के अधिकार भी नहीं हैं। मराठवाड़ा गन्ना उत्पादन के लिए जाना जाता है लेकिन वहाँ के गन्ना मज़दूरों की सुध कौन लेता है? आज भी उनके साथ ग़ुलामों सा बर्ताव किया जाता है। लेखक का यह सवाल उचित है कि ‘क्या हमारा सिस्टम मज़दूर को नागरिक बनने से रोकता है।’ बस्तर के जीवन और राजनीति के द्वंद्व से जुड़ी कथाएँ हैं, अमरकण्टक का बदलता पर्यावरण है।

यह एक पत्रकार के अंदर के साहित्यकार की किताब है जिसकी दर्जन भर कथाएँ किसी लम्बे शोक गीत की तरह हैं-उदास और गुमनाम। राजपाल एण्ड संज से प्रकाशित यह किताब यात्रा की तो है लेकिन ऐसी यात्राओं की किताब है जिन पर हम अक्सर निकलना नहीं चाहते, ऐसी लोगों की किताब जिनको हम देखते तो हैं पहचान नहीं पाते, जिनके बारे में जानते तो हैं मिलना नहीं चाहते!

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