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असाध्य …

धीरे-धीरे जीवन गुजारता जा रहा
काल,परिस्थित,परिवेश,दशा,अवदशा
सब बदलते जा रहे ..
राग,द्वेष, हर्ष,विषाद,विवाद,अपवाद
सब रूपांतरित होते जा रहे…
कल्याण-कल्पना के बहुसंख्यक,
बहुरंगी घोड़े पर सवार अनवरत
अतिवेग अग्रसर होते जा रहे…
प्रत्येक श्वास-निश्वास पूर्ण श्वास होने
हेतु कटिबद्ध …..
प्रत्येक कर्म, पूर्ण समर्पण सह पूर्ण
होने के क्रम में….
पर इस क्रम में हम जीवन-निर्धारक
तथ्यों को ही विस्मित करते जा रहे..
न जाने कौन से लक्ष्य को साधने हेतु?

 

©अल्पना सिंह, शिक्षिका, कोलकाता                            

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