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महात्मा गांधी के अपमान के खिलाफ गांधीवादियों का सत्याग्रह शुरू, गांधी के बलिदान दिवस तक होंगी प्रतिकार में सभाएं और रैलियां …

नई दिल्ली (प्रसून लतांत) । हरिद्वार से शुरू हुई ‘धर्म-संसद’ अब तक दिल्ली होती हुई रायपुर पहुंची है. यह सारे देश में एक संकीर्ण, विषैला और विद्वेष भरा वातावरण बनाती जा रही है. खबर है कि ऐसी कई ‘धर्म-संसदों’की योजना है. इन सारे आयोजनों के पीछे एक ही राजनीतिक दल का हाथ है, एक-सी सांप्रदायिक शक्तियों ने इसका अभियान चला रखा है. यह कहना है देश के सर्वोच्च गांधीवादी संगठनों का। इन संगठनों में सर्व सेवा संघ, गांधी शांति प्रतिष्ठान और राष्ट्रीय गांधी संग्रहालय सहित अन्य संगठन शामिल हैं।

इन संगठनों ने महात्मा गांधी के अपमान सहित हिंसक और नरसंहार की अपीलों के खिलाफ पहली जनवरी से 30 जनवरी तक निरंतर अभियान चलाने का ऐलान किया है। वे इसके लिए देश भर में अभियान चलाएं जाएंगे। गांधी जी के विचारों को सही तरीके से रैलियों और सभाओं के जरिए लोगों के बीच रखा जाएगा। इन संगठनों ने अपने विभिन्न सहयोगी संगठनों, शाखाओं से अपील की है कि वे स्थानीय समाचार पत्रों में ‘संपादक के नाम’ लगातार सैकड़ों की संख्या में पत्र लिखें तथा ‘धर्म-संसद’ के अधार्मिक आयोजन व अशोभनीय व्यवहार व भाषा का निषेध करें. ‘संपादक के नाम पत्र’ के अभियान को इस तरह संयोजित करें कि आपके इलाके के, सभी भाषाओं के सभी समाचार पत्रों में यह अभियान नियमित रूप से पूरे महीने जारी रहे. हमारे अभियान की सफलता इसमें है कि अधिकाधिक लोग इससे जुड़ें. प्रकाशित पत्रों का संकलन करें तथा उसकी इकट्ठी फोटोकॉपी हमें भेजें.

यदि आपके यहां टीवी चैनल या व्हाट्सएप ग्रुप चलता हो तो उस पर भी योजनापूर्वक अपनी उपस्थिति बनाएं. सबकी सुविधा व तैयारी देख कर, किसी एक दिन यथासंभव बड़ी रैली का आयोजन करें जिसमें महात्मा गांधी के बड़े चित्र के साथ “ लोकतंत्र हमारा है : हम सब एक हैं !” का बैनर हो. आपके इलाके के किसी प्रमुख स्थान से यह रैली निकले और निश्चित रास्तों से गुजरती हुई, किसी प्रमुख स्थान या मैदान में जमा हो जहां धर्म के इस अधार्मिक इस्तेमाल के निषेध की एक सभा हो.

रैली व सभा में साथ भेजा जा रहा पर्चा बांटते चलें. जहां जरूरी हो, वहां इसका स्थानीय भाषा में अनुवाद करवाएं. गांधीवादी संगठनों ने सभी आयोजनों में इन बातों का खास ध्यान रखने की अपील की है कि हमारी भाषा शालीन, मर्यादित हो; महात्मा गांधी के अपमान का निषेध करती हो; पूरी कोशिश करें कि हमारे सभी आयोजनों में हमारे इलाके के सभी धर्मों-जातियों-भाषाओं के लोग शामिल हों; युवकों-युवतियों और महिलाओं को हर तरह से आगे बढ़ाएं व अपने कार्यक्रम में शामिल करें; सभी स्कूलों-कॉलेजों-संस्थानों को साथ लेने की कोशिश करें.

ऐसे आयोजन में मीडिया के सभी लोगों को आमंत्रित करें. विपरीत विचार के लोगों से विवाद न करें. व्यवस्थित संवाद से पीछे न हटें. इन गांधीवादी संगठनों का कहना है कि ऐसी धर्म संसदों से शह पा कर दूसरे धर्मावलंबी राजनीतिज्ञ भी समाज में जहर घोलने में लगे हैं. इन धर्म-संसदों से और ऐसे लोगों से धर्म और अधर्म के बीच की रेखा मिटती ही नहीं जा रही है, धर्म की समझ विकृत, बाजारू व अश्लील होती जा रही है. यह असहमति का नहीं, राष्ट्रीय असहिष्णुता, असभ्यता और अशोभनीयता का मामला है.

सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोगों ने इसे शुरू किया और उनकी ही मुखर व मौन सहमति से उनके पैदल सिपाहियों द्वारा इसे चलाया व बढ़ाया जा रहा है. प्रधानमंत्री से ले कर सांप्रदायिकता को राजनीतिक शक्ति के तौर पर इस्तेमाल करने वाले सभी लोगों-संगठनों और चापलूस प्रशासन व पुलिस अधिकारियों के चेहरों पर यह काला दाग लगा है.

महात्मा गांधी इन सबके निशाने पर हैं; क्योंकि मनुष्यता के खिलाफ जब भी, जो भी कदम उठाता है, उसे वे ही राह रोके खड़े मिलते हैं. ये सब परेशान हैं कि क्या इस आदमी को मारने वाली गोली अब तक बनी नहीं; उन्हें दफन कर सके, ऐसी कब्र अब तक खोदी नहीं जा सकी ? इसलिए इन धर्म संसदों में उन्हें गालियां दी जा रही हैं, अपशब्दों से उनका अपमान किया जा रहा है.

गुलाम भारत में भी किसी धर्म-जातिविशेष के लोगों ने, अंग्रेज प्रशासन ने महात्मा गांधी के लिए कभी इतने अपशब्द नहीं कहे, जितने पिछले कुछ वर्षों में सत्ताधारी पार्टी के नेताओं व अन्य छुटभैय्यों ने कहे हैं. इनके शब्दों,व्यवहार और इनकी मंशा ने दुनिया में भारत की छवि जैसी और जिस हद तक कलंकित की है, उसका कोई दूसरा उदाहरण खोजना मुश्किल है.

इन गांधीवादी संगठनों ने हिंसा और नरसंहार के खिलाफ वकीलों द्वारा सुप्रीम कोर्ट को लिखे पत्र का जिक्र करते हुए कहा है कि महात्मा गांधी से असहमति रखने और उनकी आलोचना करने का अधिकार किसी को न हो, ऐसा भारत न हम चाहते हैं, न हम उसका समर्थन करते हैं. किसी भी लोकतंत्र में स्वस्थ व तथ्यों पर आधारित असहमति की जगह ही नहीं होती है बल्कि वह लोकतंत्र का अनिवार्य हिस्सा है. लेकिन लोकतंत्र में मिली आजादी व अधिकार का इस्तेमाल कर, कोई लोकतंत्र की ही जड़ काटने लगे तो इसे रोकना तथा इसके विरुद्ध कानूनसम्मत काररवाई करना पुलिस-प्रशासन व न्यायपालिका की संवैधानिक जिम्मेवारी है. इसलिए सुप्रीम कोर्ट के 76 वरिष्ठ वकीलों ने भारत के चीफ जस्टिस को लिखा है कि हिंसा व नरसंहार का खुला आह्वान करने वाले ऐसे आयोजनों का वे संज्ञान लें तथा जरूरी करवाई करें.

गांधीवादी संगठनों ने खेद जताया है कि सत्ता की अनुकंपा की भूखी संवैधानिक व्यवस्थाएं बौनी साबित हो रही हैं. ऐसी स्थिति में जनता को खुद ही आगे आ कर अपने लोकतंत्र का संरक्षण व संवर्धन करना होगा. हम संविधान के जनक भी हैं और उसके संरक्षक भी; हमने ही सरकारों को व कार्यपालिका व विधायिका को रचा भी है और उसे मान्य भी किया है. इसलिए जब भी इनका पतन होता है, नागरिकों को संगठित हो कर इनका प्रतिकार करना चाहिए. हम लोकतंत्र की ढहती इमारत के खामोश दर्शक नहीं रह सकते.

इसलिए यह महात्मा गांधी के सम्मान का ही नहीं, लोकतंत्र के संरक्षण का सवाल भी है. लोकतंत्र ही बिखर गया तो नागरिकों के लिए कोई जगह बचेगी क्या ? फिर बर्बर व बौराई सत्ता, पुलिसिया राज की असंवैधानिक ज्यादतियां, जेल व यातनागृह ही हमारे हाथ में बचेंगे.

राजनीतिक दल, राष्ट्रविरोधी सांप्रदायिक शक्तियां, पुरुषत्वहीन नौकरशाही और गूंगी न्याय-व्यवस्था हमें वैसे मुकाम पर पहुंचा दे, इससे पहले देश के सभी लोकतंत्रप्रेमियों के लिए यह सावधान होने, सक्रिय होने व आवाज उठाने का नाजुक दौर है.

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