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जबलपुर से निकलते ही नर्मदा तट पर गंदगी का साम्राज्य, गौर नदी में गोबर से संगम प्रदूषित …

नर्मदा परिक्रमा भाग -32

 

अक्षय नामदेव। ग्वारीघाट तट दर्शन  पूजन एवंभोजन के बाद हम आगे परिक्रमा के लिए रवाना हुए। जबलपुर नर्मदा तटीय इलाके से होते हुए हम आगे बढ़ रहे थे। इस इलाके में जहां खाली भूमि देखी वहां नगर निगम जबलपुर ने  शहर के कचरे का ढेर इकट्ठा कर रखा है। संस्कारधानी जबलपुर में इस तरह की विभत्सता हमें देखने में अच्छी बिल्कुल नहीं लगी। काफी दूर तक हमें यह देखने को मिला। अब हम जबलपुर जिले में ही जबलपुर के एकदम बाहर थे जहां खेतिहर जमीन थी। यहां पर हमें रेल लाइन पार करना था परंतु रेलवे फाटक बंद था। कुछ देर इंतजार करने के बाद एक रेलगाड़ी निकली। तिवारी ने बताया कि यह रेल लाइन पहले छोटी लाइन थी अब ब्रॉड गेज लाइन बन गई है। रेल के गुजरने के बाद रेलवे का फाटक खुला और हम आगे बढ़ गए। कुछ आगे बढ़ने पर हमें पक्की सड़क छोड़नी पड़ी और हम खेतों की हरियाली से होते हुए पगडंडी के रास्ते गौर एवं नर्मदा नदी के संगम पहुंचे।

गौर नर्मदा संगम पर गिनती के कुछ परिक्रमा वासी थे जो तट पूजा कर रहे थे। चिलचिलाती धूप के बावजूद उनकी श्रद्धा देखते बन रही थी। यहां गौर नर्मदा संगम पर तट पर कोई विशेष रुकने इत्यादि की व्यवस्था नहीं है। कुछ एक पूजा प्रसाद की दुकान वाले तथा एक वृक्ष जिसके नीचे छोटा सा मंदिर है वही आश्रय पा सकते हैं।

हम यहां संगम पर जाकर मां नर्मदा की पूजा अर्चना की एवं चुनरी चढ़ाई तथा मां नर्मदा को प्रणाम किया। चिलचिलाती तेज धूप में भी गौर नर्मदा संगम पर कालिमा सी दिखाई दे रही थी। संगम के ऊपर से ही दो पुल गुजरते हैं। इसी पुल के छांव में अनेक परिक्रमा वासी विश्राम कर रहे थे।

गौर एवं नर्मदा नदी के संगम का जल इतना काला क्यों है? यह प्रश्न हमें परेशान कर रहा था। हम छत पर बैठे दुकानदार से ही यह प्रश्न कर बैठे तो उसने हमें शांति पूर्वक जवाब दिया। भैया गौर नदी में गोबर इतना मिला होता है जिसके कारण गौर नदी गोबर नदी बन चुकी है। आगे उसने बताया कि गौर नदी के अगल-बगल किसानों ने जो डेरी संचालित किए हैं उन डेरी का गोबर एवं गोमूत्र सीधे गौर नदी में मिला दिया जाने के कारण गौर नदी एकदम प्रदूषित हो गई है तथा यही गौर नदी नर्मदा में मिलने के कारण संगम में कालिमां छा गई है।

उसने बताया कि आज से 5 दशक पूर्व कभी गौर नदी निर्मल कल कल छल छल बहती थी और इसका स्वच्छ जल ही इसके गौर नामकरण का कारण बना परंतु इतने सालों लगातार गोबर एवं गोमूत्र मिलाए जाने से यह नदी बर्बाद हो गई है। उन्होंने कहा कि यहां अधिकारी कई बार आकर भ्रमण कर चले गए हैं तथा इसकी सफाई की अनेक योजनाएं भी बनाई जा रही है परंतु यह कब तक पूर्ण निर्मल एवं स्वच्छ होगी इसके बारे में हम भी नहीं बता सकते।

हमने इस तरह की शिकायत परियटनदी एवं हिरण नदी के बारे में भी सुनी थी जिसमें गोबर एवं गोमूत्र सहित अपशिष्ट मिलाये जाने के कारण नदी प्रदूषित हो गई है। खास जबलपुर में भी अनेक घाटों में नालियों का गंदा पानी सीधे नर्मदा में मिलते हमने देखा है। मंडला महाराजपुर में भी घाटों पर पसरी गंदगी हमें खेदित करती रही।बरमान घाट हो या ओमकारेश्वर नालियों का गंदा पानी मां नर्मदा में सीधे मिलाया जा रहा है। ऐसे दृश्यों को देख कर मां नर्मदा के भक्तों को कितनी पीड़ा होती है इसका अंदाजा लगाना सबके बस की बात नहीं है।

आज 2 मई 2021 को जब मैं नर्मदा परिक्रमा यात्रा वृतांत की 32वीं किस्त लिख रहा हूं तो मुझे स्वाभाविक रूप से याद आ रही है शिवराज कैबिनेट के बैठक में लिए गए उस निर्णय की जिसमें मां नर्मदा सेवा यात्रा के बाद मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की कैबिनेट ने वर्ष 2017 में 2 मई को प्रस्ताव पारित करके नर्मदा नदी को जीवित इकाई का दर्जा देने का निर्णय लिया था इसके बावजूद मां नर्मदा नदी की यह दुर्गति ! शिवराज सरकार को अपनी कैबिनेट में लिए गए उस प्रस्ताव को याद कर मां नर्मदा को प्रदूषण मुक्त बनाने के लिए ठोस कदम उठाए जाने की जरूरत है।

हर हर नर्मदे।                                                                                      क्रमशः

 

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