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अमरकंटक तो तपोस्थली है यहां गुफाओं और कंदराओं में आज भी ऋषि तपस्या में लगे हैं जानिए कुछ रोचक जानकारी …

नर्मदा परिक्रमा भाग -38

अक्षय नामदेव। मां नर्मदा उद्गम कुंड अमरकंटक के प्रवेश द्वार के सामने पहुंचकर सर्वप्रथम हमने माता को शीश नवाया और नर्मदा कुंड परिसर में प्रवेश किया। दोपहर के लगभग 1:00 बजे होंगे। चिलचिलाती धूप के बावजूद भी हमारा उत्साह चरम पर था। हम सीधे नर्मदा कुंड पहुंचकर मां की पूजन आरती की। कोरोनावायरस संक्रमण के कारण नर्मदा कुंड परिसर में गिने चुने ही लोग थे उनमें से ज्यादातर परिक्रमा वासी थे। मुख्य मंदिर का पट बंद था। हमने माता की डेवढी में जाकर शीश नवाया। मां नर्मदा मंदिर एवं कुंड परिसर में हमेशा रहने वाले सूरदास से नर्मदे हर का जयघोष किया। सूरदास महाराज ने अपनी चिर परिचित मुस्कान के साथ हमें ” नर्मदे हर” कहा। उनसे हम सभी ने रक्षा सूत्र बंधवाया एवं उन्हें प्रणाम कर दक्षिणा दे आशीर्वाद प्राप्त किया। अमरकंटक नर्मदा कुंड अक्सर आने जाने के कारण सूरदास मुझे आवाज से ही पहचान लेते हैं। लगातार आने जाने के कारण से आत्मीयता सी हो गई है। रक्षा सूत्र बांधते बांधते हुए वे ज्ञान की बात करते हैं जो दिल की गहराइयों में उतर जाती है। सूरदास कहने लगे सुनो अक्षय कुमार,,, नर्मदे हर वास्तव में है क्या? एक तो है,,,हे मां आनंद प्रदान करो। और दूसरा नर्मदे हर का अर्थ है नर अपने मद को नष्ट कर ले। हम सूरदास की बात को ध्यान से सुनते रहे। सूरदास जब भी बोलते हैं तो सार बात कहते हैं कभी फुर्सत पर मां नर्मदा से जुड़े अपने निजी अनुभव भी बताते हैं। काफी देर तक उनसे बातचीत कर उन्हें प्रणाम कर हमने उनसे विदा ली। मां नर्मदा कुंड की परिक्रमा करते हुए परिसर में स्थित सभी मंदिरों में जाकर प्रणाम किया।

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मां नर्मदा कुंड परिसर अमरकंटक एवं माई की बगिया के बीच में मां नर्मदा का गुप्त प्रवाह माना जाता है। मां नर्मदा के इस कुंड परिसर में लगभग दो दर्जन मंदिरों का समूह है। यह कुंड बीसा यंत्र पर आधारित कुंड है जो कि धार्मिक परंपराओं का मुख्य आकर्षण केंद्र है। ऐसी जनश्रुति है कि मंडला के एक बंजारे रेवा नायक को स्वप्न में मां नर्मदा के दर्शन होने पर उसने यहां लाल बॉक्साइट पत्थरों से इस अद्भुत कुंड का निर्माण कराया। इस बंजारे की समाधि भी नर्मदा कुंड परिसर में मिलती है। यह कुंड लगभग 700 वर्ष पूर्व बनाया गया है ऐसा बताया जाता है। मां नर्मदा उद्गम कुंड परिसर की बाहरी दीवारों का निर्माण रीवा के महाराजा गुलाब सिंह बघेल द्वारा बनवाया गया था। नर्मदा कुंड परिसर में जो मंदिर है उनमें क्रमशः नर्मदा मंदिर, पार्वती एवं अमरकंठेश्वर महादेव, कार्तिक मंदिर, अन्नपूर्णा मंदिर, राम दरबार, विष्णु मंदिर, सत्यनारायण मंदिर, लक्ष्मी नारायण मंदिर, सूर्य नारायण मंदिर, रोड़ी मंदिर, नर्मदा उद्गम मंदिर, बंसेस्वर मंदिर, घंटेश्वर मंदिर, दुर्गा मंदिर, काली मंदिर, सिद्धेश्वर मंदिर, शिव परिवार मंदिर, राम जानकी मंदिर, राधा कृष्ण मंदिर, रूद्र मंदिर, गोरखनाथ सिद्धेश्वर मंदिर, चतुर्भुज विष्णु मंदिर, भैरव स्तंभ, भैरव चौरा इत्यादि है।

स्वच्छता के दृष्टिकोण से मां नर्मदा कुंड में बीते लगभग 20 वर्षों से स्नान वर्जित है। यहां केवल जल का दर्शन एवं आचमन किया जा सकता है हालांकि हमने बचपन में इस नर्मदा प्राचीन कुंड में खूब डुबकियां लगाई है। कुंड परिसर में ही हाथी की एक पाषाण प्रतिमा है जहां उसके नीचे से निकलकर लोग अपने पाप और पुण्य की परीक्षा देते हैं। नर्मदा कुंड परिसर से बाहर स्नान के लिए आधुनिक कुंड का निर्माण किया गया है जो नर्मदा का प्रवाह कहलाता है। इसके आगे क्रमशः रामघाट, कपिला संगम, अरण्यी संगम, चक्रतीर्थ, कपिलधारा एवं दूध धारा स्थित है।

अमरकंठ पर्वत पर चारों ओर लहराते वृक्षों की छटा, गगनचुंबी पर्वत श्रेणियों से टकराती घटाएं, घाटी के ऊपर दया की वर्षा करता हुआ नीला आसमान, वन की नीरवता से झांकती प्राचीन स्मृति, ऋषि मुनियों की अनदेखी तस्वीर और इन्हीं के साथ कल कल नाद करती संगीत की जादू भरी स्वर लहरियों से वन और घाटियों को गुंजित करती मां नर्मदा की पावन धरती जितनी आकर्षक है उतनी ही रमणीय एवं रहस्य पूर्ण। घने साल वनो एवं पहाड़ों के बीच स्थित अमरकंटक तीर्थ श्रद्धालुओं के मन में सचमुच आनंद एवं अद्भुत शांति प्रदान करता है।

अमरकंटक तीर्थ मैकल पर्वत पर स्थित है। यह विंध्याचल एवं सतपुड़ा पर्वत के बीच स्थित है। प्रख्यात साहित्यकार डॉ श्रीराम परिहार के शब्दों में मैंकल पर्वत की दाई भुजा विंध्याचल और बाई भुजा सतपुड़ा है। इन दोनों पर्वतों के बीच नर्मदा निनादित और प्रवाहित है। विंध्य और सतपुड़ा से बनी अंजुरी से नर्मदा का जल लहर लहर है। इस पर्वत का मस्तक दूर तक फैला है। यह अपनी विराटता से संपूर्ण भारत को पूर्व से पश्चिम तक हरापन और प्राकृतिकता प्रदान किए हुए हैं। नर्मदा की खूबसूरती और महत्व को डॉ शिव मंगल सुमन ने कविता की नदियों में कुछ इस तरह से पिरोया है,,,

“नर्मदा अमरकंटक के सुमनों की सौगात सजाती है,

ओमकारेश्वर के बीच सकुचाती सहमी सहमी सी आती है,

जो धुआंधार में धारा का स्वर्णिम उल्लास लुटाती है,

वह संगमरमरी बाहों में बरबस बंदी बन जाती है,

मांडू के महलों में जिसकी आभार अभिसार सजाती है,

सपनों की रूपमती “रेवा”रेखा सी रह जाती है।।

 

पुराणों के अनुसार अमरकंटक एक ज्वालामुखी पर्वत है जो धीरे-धीरे ठंडा हो गया। स्कंद पुराण में अमरकंटक का वर्णन एक अलग खंड रेवाखंड पुराण में विस्तृत रूप से है। पुराणों में नर्मदा के महत्व का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि गंगा के पान से यमुना में स्नान से जो फल प्राप्त होता है वही फल नर्मदा के दर्शन मात्र से होता है। नर्मदा जल के दर्शन मात्र से पुण्य एवं मोक्ष की प्राप्ति होती है। स्कंद पुराण के अनुसार विंध्य पर्वत पर शिव की तपस्या करके रेवा ने अमरत्व प्राप्त किया इसलिए इस स्थान का नाम अमरकंटक पड़ा क्योंकि अमरकंटक का एक अर्थ अमरत्व प्रदान करने वाला। महाकवि कालिदास के मेघदूत में भी अमरकंटक का उल्लेख है।

साहित्यकार डॉ श्रीराम परिहार लिखते हैं कि और नर्मदा की प्रणय कथा मानवीय संदर्भ लिए हुए हैं। लोक ने नदियों को कहीं मानवीय और कहीं दैवी गुणों से मंडित किया है। यह लोक की मानवीय दृष्टि और व्यवहार के प्रकृति तक फैलाओ का सुफल है। तटस्थ रूप से देखने पर यह अनुमान लगाया जा सकता है कि माई की बगिया से पुरातन समय में जल स्रोत बहता रहा होगा तथा यही जलधारा ही वर्तमान नर्मदा कुंड तक आती रही होगी और फिर पश्चिम दिशा में आगे बढ़कर बहती चली गई होगी। समय के परिवर्तन और अमरकंटक की वनस्पतिक संपदा विरल होने से इस स्रोत में भी अंतर आया। माई की बगिया से लेकर नर्मदा कुंड तक की धारा सूख गई। नर्मदा कुंड से आगे दो-तीन किलोमीटर तक भी यही स्थिति रही होगी। नर्मदा कुंड से अमरकंटक का एक शिखर और आसपास की भूमि ऊंची है उसी का जल निरंतर नर्मदा कुंड में आता है। अमरकंटक ने अपनी आत्मा से नर्मदा को जन्म दिया है और उसके प्राणों के रस से नर्मदा में अनादि काल से , प्रलय काल से जल जीवन नि:सृत हो रहा है। अमरकंटक में नर्मदा को जन्म देकर भारत को वरदान दिया। यह अमरेश्वर शिव की अमरकंटक के माध्यम से धरती को मिली कृपा शिवकन्या नर्मदा जल के रूप में अमृत धार है। मैकल पर्वत से निकलने के कारण नर्मदा को मेकलसूता भी कहा गया है।

अमरकंठी नर्मदा का यह क्षेत्र देवों और मनुजों, मिथकों और लोक कथाओं, ऋषि और वर्तमान के रचनाकारों को अपने संदर्भ में समाए हुए हैं। कहा जाता है कि आज भी अमरकंटक के घोर जंगलों में कंदराओं में तपस्वी ऋषि घोर तपस्या में लगे हुए हैं। ऐसे संत जिन्हें अलोप विद्या आती है अर्थात जो कभी दृश्य होते हैं कभी अदृश्य हो जाते हैं। रहस्य एवं आध्यात्म से भरी मां नर्मदा के उद्गम स्थली तीर्थ अमरकंटक तपस्वियों, मनीषियों एवं साधकों के लिए आकर्षण का केंद्र है।

ध्यान रहे अमरकंटक तपोस्थली है,,। इस तपोस्थली अमरकंटक से निकलने वाली मां नर्मदा वैराग और भक्ति प्रदान करती है इसीलिए नर्मदा को तपोभूमि कहा गया है।  हे मां हमें अपनी भक्ति देना। यही आपसे प्रार्थना है।

 

 

 हर हर नर्मदे

 

 क्रमशः

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