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प्रकृति के सुकुमार कवि सुमित्रानंदन पंत …

अपनी कविता के माध्यम से प्रकृति की सुवास सब ओर बिखरने वाले कवि सुमित्रानंदन पंत का जन्म कौसानी (जिला बागेश्वर, उत्तराखंड) में 20 मई, 1900 को हुआ था। जन्म के कुछ ही समय बाद मां का देहांत हो जाने से उन्होंने प्रकृति को ही अपनी मां के रूप में देखा और जाना।

दादी की गोद में पले बालक का नाम गुसाई दत्त रखा गया; पर कुछ बड़े होने पर उन्होंने स्वयं अपना नाम सुमित्रानंदन रख लिया। सात वर्ष की अवस्था से वे कविता लिखने लगे थे। कक्षा सात में पढ़ते हुए उन्होंने नेपोलियन का चित्र देखा और उसके बालों से प्रभावित होकर लम्बे व घुंघराले बाल रख लिये।

प्राथमिक शिक्षा के बाद वे बड़े भाई देवीदत्त के साथ काशी आकर क्वींस कॉलिज में पढ़े। इसके बाद प्रयाग से उन्होंने इंटरमीडियेट उत्तीर्ण किया। 1921 में ‘असहयोग आंदोलन’ के दौरान जब राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी ने सरकारी विद्यालय, नौकरी, न्यायालय आदि के बहिष्कार का आह्वान किया, तो उन्होंने पढ़ाई छोड़ दी और घर पर रहकर ही हिन्दी, संस्कृत, बंगला और अंग्रेजी का अध्ययन किया।

प्रयाग उन दिनों हिन्दी साहित्य का गढ़ था। अतः वहां का वातावरण उन्हें रास आ गया। 1955 से 1962 तक वे प्रयाग स्थित आकाशवाणी स्टेशन में मुख्य कार्यक्रम निर्माता तथा परामर्शदाता रहे। भारत में जब टेलीविजन के प्रसारण प्रारम्भ हुआ, तो उसका भारतीय नामकरण ‘दूरदर्शन’ उन्होंने ही किया था।

जयशंकर प्रसाद, सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ और महादेवी वर्मा के साथ वे छायावाद के प्रमुख कवि माने जाते हैं। उन्होंने गेय तथा अगेय दोनों तरह की कविताएं लिखीं। वे आजीवन अविवाहित रहे; पर उनके काव्य में नारी को मां, पत्नी, सखी, प्रिया आदि विविध रूपों में सम्मान सहित दर्शाया गया है। उनका सम्पूर्ण साहित्य ‘सत्यम्, शिवम्, सुन्दरम्’ के आदर्शों से प्रभावित है।

उनकी प्रारम्भिक कविताओं में प्रकृति प्रेम के रमणीय चित्र मिलते हैं। दूसरे चरण में वे छायावाद की सूक्ष्म कल्पनाओं और कोमल भावनाओं से खेलते हुए नजर आते हैं। इसके बाद उनका झुकाव फ्रायड और मार्क्सवाद की ओर हुआ। इसके प्रसार हेतु 1938 में उन्होंने ‘रूपाभ’ नामक मासिक पत्रिका भी निकाली; पर पांडिचेरी में अरविन्द के दर्शन से वामपंथ का यह नशा उतर गया और फिर उन्होंने मानव कल्याण से संबंधित कविताएं लिखीं।

पंत के जीवन के हर पहलू में काव्य की मधुरता और सौंदर्य की छवि दिखाई देती है। सरस्वती पत्रिका के सम्पादक देवीदत्त शुक्ल को उनके बालों में भी कवित्व के दर्शन होते थे। दर्जी के पास घंटों खड़े रहकर वे कपड़ों के लिए अपनी पंसद के नये-नये कलात्मक डिजाइन बनवाते थे।

उत्तराखंड के झरने बाग बर्फ पुशो लाता भंवरा गुंजन उषा किरण शीतल पवन तारों की चुनरी ओढ़े गगन से उतरती संध्या ये सब प्रतिदिन देख पंत ने सहज रूप से कविताओं की रचना की। ये सब उनकी कविताओं में वर्णित है। निसर्ग के उपादानों का प्रतीक व बिम्ब के रूप मर प्रयोग उनकी काव्य की विशेषता हौ। उनका व्यक्तित्व बहुमुखी था। एक गज़ब का आकर्षण था उनमें। गौर वर्ण लंबे लंबे घुंघराले बाल रखते थे। ऊंची आवाज में बतियाते थे। शारीरिक सौष्ठव देखते ही बनता था। पंत वृति से शिक्षक थे। अच्छे लेखक थे। उन्होंने कई गीत व कविताएँ लिखी जो कालजयी बनी। रहस्यवाद प्रगतिवाद आंदोलन किए। पंत जब सात वर्ष के थे तभी से उन्होंने कविता लिखना प्रारम्भ कर दिया था। उस समय वे कक्षा चार में पढ़ते थे।

उनकी प्रमुख रचनाएं

अनुभूति,महात्मा के प्रति, मोह, सांध्य वंदना, वायु के प्रति, सूर्यकान्त त्रिपाठी के प्रति आज रहने दो यह ग्रह काज, चंचल पग दीप शिखा से, संध्या के बाद, वे आंखे, विजय, लहरों का गीत, यह धरती कितना देती है में सबसे छोटी होऊं, मछुए का गीत, चांदनी, जीना अपने में ही, बापू के प्रति ग्रामश्री, जग के उर्वर आंगन में, काले बादल, तप रे, आज़ाद, द्रुत झरो जगत के जीर्ण पत्र, गंगा, अमर स्पर्श, आओ हम अपना मन टोवे, परिवर्तन, जग जीवन में जो चिर महान, पाषाण खण्ड, नौका व विहार, भारत माता, आत्मा का चिर धन, धरती का आंगन इठलाता, बाल प्रश्न, ताज, बांध दिए क्यों प्राण, चींटी, याद, वह बुड्ढ़ा, घण्टा, बापू, प्रथम रश्मि, दो लड़के, पर्वत प्रदेश में पावस, छोड़ द्रुमों की मृदु छाया, धेनुएँ, पंद्रह अगस्त उन्नीस सौ सैतालीस, गीत विहंग।

सुमित्रानंदन पंत नए युग के प्रवर्तक कहे जाते हैं। प्रकृति चित्रण करने वाले पंत आकर्षक व्यक्तित्व के धनी कहे जाते हैं। पंत अंग्रेजी के रूमानी कवियों जैसी वेशभूषा में रहते थे। प्रकृति केंद्रित साहित्य की रचना करने वाले कवि थे। हिंदी साहित्य के विलियम वर्ड्सवर्थ कहे जाते थे। इन्होंने ही अमिताभ बच्चन को अमिताभ नाम दिया था।

पंत की प्रारम्भिक कविताएं ‘वीणा’ में संकलित हैं। उच्छवास तथा पल्लव उनकी छायावादी कविताओं का संग्रह है। ग्रंथी, गुंजन, लोकायतन, ग्राम्या, युगांत, स्वर्ण किरण, स्वर्ण धूलि, कला और बूढ़ा चांद, चिदम्बरा, सत्यकाम आदि उनकी अन्य प्रमुख कृतियां हैं। उन्होंने पद्य नाटक और निबन्ध भी लिखे। उनके जीवन काल में ही 28 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी थीं।

‘पद्मभूषण’ तथा ‘साहित्य अकादमी’ सम्मान से अलंकृत पंत को ‘चिदम्बरा’ के लिए ज्ञानपीठ तथा ‘लोकायतन’ के लिए सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार मिला। ज्ञानपीठ पुरस्कार से प्राप्त राशि उन्होंने एक संस्था को दे दी। पंत को पद्मभूषण 1961 में, ज्ञानपीठ पुरस्कार 1968 में सहित साहित्य अकादमी पुरस्कार तथा अन्य कई पुरस्कार प्रदान किए गए। ज्ञानपीठ पुरस्कार उन्हें “चिदम्बरा’ ‘ काव्य कृति हेतु प्रदान किया गया था। पंत की रचनाओं में समाज के यथार्थ के साथ ही प्रकृति चित्रण भी देखा जा सकता है। आधी सदी से भी अधिक लंबे रचनाकाल में पंत ने कई रचनाएँ लिखी।

नेपोलियन से प्रभावित होकर इन्होंने अपने बाल भी उन्हीं की तरह रखे थे। बालपन में दादी की कहानियों ने इन्हें कवि बना दिया। पल्लव इनका तीसरा कविता संग्रह खूब लोकप्रिय हुआ जो 1928 में प्रकाशित हुआ।इनकी कविता अमर स्पर्श में लिखते हैं–

 

खिल उठा हृदय

पा स्पर्श तुम्हारा अमृत अभय

खुल गए साधना के बंधन

संगीत बना उर का रोदन

अब प्रीति द्रवित प्राणों का पण

सीमाएं अमिट हुई सब लय

क्यों रहे न जीवन में सुख दुख

क्यों जन्म मृत्यु से चित्त विमुख

तुम रहो दृगों के जो सम्ममुख

प्रिय हो मुझको भृम भय संशय

तन में आयें शैशव यौवन

मन में हो, विरह मिलन के व्रण

युग स्तिथियों से प्रेरित जीवन

उर रहे प्रीति में चिर तन्मय

जो नित्य अनित्य जगत का क्रम

व रहे न कुछ बदले हो कम

हो प्रगति हास का भी विभ्रं

जग से परिचय तुम से परिणय

तुम सुंदर से बन अतिसुन्दर

आओ अंतर में अंतरतर

तुम विजयी जो प्रिय हो मुझ पर

वरदान पराजय हो निश्चय।

 

पल्लव ऐसी ही कुल 32 कविताओं का बेहतरीन संकलन है। उन्होंने अपने जीवनकाल में 28 कृतियां लिखी। विस्तृत वांग्मय उनका आज भी सुरक्षित है। पंत एक दार्शनिक, विचारक, मानवतावादी दृष्टिकोण के कवि साहित्यकार थे। इनका व्यक्तिगत संग्रहालय का नाम ‘‘सुमित्रानंदन पंत साहित्यिक वीथिका’ ‘ के नाम से आज भी मौजूद है। ये प्रगतिशील लेखक संघ सर जुड़े रहे। इनके साथ रघुपति सहाय व शमशेर प्रमुख थे। सत्र 1955 से 1962 तक ये आकाशवाणी में मुख्य निर्माता के पद पर सेवारत रहे।

वीणा पल्लव के छोटे गीत विराट व्यापक सौंदर्य व पवित्रता से साक्षत्कार कराते हैं। 1907 से 1918 का इनकी साहित्य यात्रा का प्रथम चरण कहलाता हैं। पंत ने साहित्य यात्रा के तीन पड़ावों में छायावादी, समाजवादी, प्रगतिवादी बन उत्कृष्ट व कालजयी रचनाओं का सृजन किया।

प्रकृति चित्रण करते ये लिखते हैं:-

 “जौ गेंहूं की स्वर्णिम बाली।

भू का अंचल वैभवशाली।।’ ‘

 

इनके नाम से इलाहाबाद में एक उद्यान है जिसे सुमित्रानंदन उद्यान कहा जाता है। उनका मानना था कि स्वाध्याय से ही साहित्य और दर्शन का ज्ञानार्जन होता है। पंत के काव्य में प्रकृति का बहुत आत्मीय गहरा और व्यापक चित्रण मिलता है जो हिंदी साहित्य की अमूल्य निधि है। ये कविता में शब्दों का चयन बखूबी करते थे। उनकी कविताओं में शब्द संगीत, चित्रात्मकता एवम व्यंजना प्रधान अर्थ देने की अद्भत क्षमता है। उन्हें “प्रकृति के सुकुमार कवि“ कहा जाता है क्योंकि उनकी रचनाओं में कोमल कान्त पदावली है। उनकी स्वच्छन्दतावादी रुचि है।

पंत ने खड़ी बोली को मिठास दिलाई।हिंदी को “युगवाणी’ ‘ की संज्ञा दी। पंत की प्रगतिशील दौर की कविता वे आंखे में किसानों का दुख दर्द लिखा। उनकी कविता संध्या के बाद में उन्होंने गांवों के लोगों की विपन्नता,गरीबी के दृश्य का सुंदर शब्दों में वर्णन किया है। कविता ग्राम में उन्होंने ग्राम्य प्रकृति पर आधारित कविता लिखी।गांवों की प्राकृतिक सुषमा और समृद्धि का मनोहारी वर्णन किया है।

 

 वे लिखते हैं–

फैली खेतों में दूर तलक

मखमल की कोमल हरियाली,

लिपटी जिसमें रवि की किरणें

चाँदी की सी उजली जाली!

तिनकों के हरे – हरे तन पर

हिल हरित रुधिर है रहा झलक,

श्यामल भूतल पर झुका हुआ

नभ का चिर निर्मल नील फलक!

 

सैकड़ों मान-सम्मानों से विभूषित, प्रकृति के इस सुकुमार कवि का 28 दिसम्बर, 1977 को निधन हुआ। उनकी स्मृति में कौसानी स्थित उनके घर को ‘सुमित्रानंदन पंत वीथिका’ नाम से एक संग्रहालय बना दिया गया है, जहां उनकी निजी वस्तुएं, पुस्तकों की पांडुलिपियां, सम्मान पत्र आदि रखे हैं।

©रीमा मिश्रा, आसनसोल (पश्चिम बंगाल)

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