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83 में मान सिंह के योगदान दिखाने की कोशिश की गई है : पंकज त्रिपाठी…

पटना। वर्ष 2004 में रन फिल्म में छोटी सी भूमिका के बाद ओमकारा से अपनी छाप छोड़ने वाले पंकज त्रिपाठी अब तक पांच दर्जन से अधिक फिल्मों में अपनी प्रतिभा दिखा चुके हैं। 2012 में गैंग्स ऑफ वासेपुर ने उनको जो मुकाम दिया, उसको वे लगातार आगे बढ़ाते आए हैं। मसान, नील बट्टे सन्नाटा, न्यूटन से लेकर मिर्जापुर वेब सीरीज में उनका अभिनय लगातार निखरता गया। इरफान खान को पसंद करने वाले पंकज कई क्षेत्रीय भाषाओं की फिल्मों से खुद को निखारते भी हैं। अब इसी महीने में रिलीज हो रही कबीर खान की फिल्म 83 में वे फिर से अपने किरदार को ले चर्चा में हैं। फिल्म से जुड़े अनेक मसलों पर उन्होंने बात की। पेश है बातचीत के मुख्य अंश…

देखिए इस फिल्म में बहुत कुछ खास होगा। फिल्म वर्ष 1983 के क्रिकेट विश्व कप क्रिकेट के जर्नी पर बनी है। भारतीय टीम के मैनेजर मान सिंह के किस्से देश में बहुत कम लोग ही जानते हैं। 1983 के विश्वकप में कुल 15 लोग ही गए थे, जिसमें से एक मान भाई भी थे। इसमें 14 खिलाड़ियों के अलावा अकेले मान भाई गए थे। कपिल देव से लेकर बाकी खिलाड़ियों को देश जानता है लेकिन मान भाई का विश्वकप जीतने में क्या व किस तरह का योगदान था, इसको बहुत कम लोग जानते हैं। उनके योगदान को फिल्म के जरिए दिखाने की कोशिश है। मान सिंह का योगदान व टीम की पूरी यात्रा कैमरे से दिखेगी। ऐसा पहली बार होगा जब कैमरे के पीछे रहे लोग की कहानी से करोड़ों भारतीय रूबरू होंगे।

वर्ल्ड कप के समय बिल्कुल अलग दुनिया थी। उस समय मैं गोपालगंज में रहता था। 1983 वर्ल्ड कप ऐसा किस्सा है जिसको कम लोग जानते हैं। गांव में रेडियो सेट तक नहीं था। हम लोग खुद बाद में अखबार से जाने कि इंडिया ने मैच जीत लिया है। हालांकि, शहरों में रहने वालों ने देखा होगा, लेकिन यह संख्या बहुत कम होगी। उस समय का कोई वीडियो फुटेज तक नहीं है। ऐसे में हम लोगों ने इतिहास को दोहराया है। लॉड्र्स के मैदान में हम लोगों ने उस इतिहास को देाहराया है। सारे मैच हम लोगों ने उसी मैदान में शूट किए हैं जहां सही में मैच हुए थे। लॉड्र्स की बालकनी से लेकर चेजिंग रूम में अनुभव गर्व के थे। वहां शूटिंग के क्षण बहुत भावुक पल थे। इमोशनल यात्रा थी उस पलों को फिर से दोहराना। सब कुछ फिल्म में देखने को मिलेगा।

ओटीटी ने दर्शकों को फिल्म का बेहतर विकल्प जरूर दिया है। इसने फिल्म देखना आसान कर दिया है। सिनेमा हाल आपके हाथ में है। कभी भी आप फिल्म देख सकते हैं। लेकिन ओटीटी जैसे माध्यम में आपको थियेटर की तरह सामूहिकता का आनंद नहीं मिलता। मोना या रीजेंट में 300 लोगों के बीच बैठकर फिल्म देखने का मजा कभी घर में नहीं आ सकता है। लेकिन दोनों के अपने-अपने मायने हैं। हम रीजेंट में जाते थे, अब तक याद है।

फिल्म बहुत जोश व जज्बे से बनाई गई है। जोश व जज्बे से फिल्म बनाई है। इस फिल्म में क्रिकेट प्रेमी ही नहीं, दर्शक भी खुद से जोड़ सकेंगे। जोश भरती है, हंसाती है, रूलाती है। गौरव देती है। आत्मा से भरी फिल्म है। इसमें मेरा लुक नया, किरदार नया है। मजा आएगा। मान भाई मैनेजर से लेकर कोच, फिजियोथेपिस्ट, सलाहकार सब कुछ थे। यहां तक कि रूम बंटवारे से लेकर प्रेस कॉन्फ्रेंस में भी कप्तान के संग बैठते थे। मान सिंह के रूप में दर्शक जानेंगे कि मैच के पीछे किसकी भूमिका महत्वपूर्ण थी। फिल्म की शूटिंग से पहले कबीर खान के कहने पर मैं मान सिंह के घर गया था। वे हैदराबाद में रहते हैं। मैं उनके घर जाकर दिन से लेकर रात तक रहा। बहुत कुछ उनके बारे में जानने को मिला। मान सिंह अभी 84 वर्ष की उम्र में भी क्रिकेट को जी रहे हैं। उनके घर का थर्ड फ्लोर पूरा म्यूजियम है। दुर्लभ चीजें उपलब्ध हैं। क्रिकेट की दुर्लभ चीजें उपलब्ध हैं। मुझे एक बैट भी उपहार में दिया जिस पर दुनियाभर के नामचीन क्रिकेटर के ऑटोग्राफ हैं। उनका क्रिकेट प्रेम अकल्पनीय है। वे अभी भी सक्रिय हैं। उनके म्यूजियम या उनके व्यक्तित्व को देखना समझना अपने आप में अद्भुत है।

क्रिकेट से जुड़ा तो हूं नहीं। लेकिन आपसी द्वंद व मनमुटाव भुलाकर खिलाड़ियों के हित में काम हो। बिहार में टैलेंटेड क्रिकेटर हैं। उनको मौका दिलाने की दिशा में बिहार क्रिकेट को काम करना चाहिए। बिहार भी क्रिकेट के फलक पर आगे बढ़े तो हमको गर्व होगा। अभाव में जीना जानते हैं बिहारी। हम रोना नहीं रोते हैं, अभावों के संग जीने की कला हमारी पहचान है।

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