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अरण्यी संगम में गंगा स्नान का पुण्य,पिंडदान से लेकर पित्रदोष व कालसर्प दोष का होता है निवारण

नर्मदा परिक्रमा भाग- 43

अक्षयनामदेव । मां नर्मदा पंचकोशी परिक्रमा क्षेत्र अमरकंटक का प्रमुख तीर्थ अरण्यी संगम है। अरण्यी संगम को स्थानीय बोलचाल की भाषा में अरंडी संगम या एरंडी संगम भी कहा जाता है परंतु वास्तव में यह अरण्यी संगम है। यह अरण्य यानी जंगल। अरण्य से निकलने के कारण नदी का नाम अरण्यी नदी नाम पड़ा होगा जिसे बाद में अरनी अरंडी या एरंडी नदी से संबोधित किया जाने लगा है। अरण्यी नदी संगम मां नर्मदा के उद्गम से मात्र ढाई किलोमीटर स्थित है। यहां अरण्यी संगम में मां नर्मदा में अरण्यी नदी आकर मिलती है तथा संगम बनाती है। अरण्यी नदी का उद्गम कबीर चबूतरा से 1 किलोमीटर दूर हुआ है। कुछ किलोमीटर ही चलकर पहाड़ों से उतर कर यह नर्मदा में मिल जाती है और संगम का निर्माण करती है। मां नर्मदा की पंचकोशी परिक्रमा करते हुए कबीर चबूतरा से चंडी गुफा का दर्शन पश्चात अरण्यी नदी के संगम पर स्नान दर्शन पूजन अत्यंत फलदाई माना जाता है।

अरणी संगम प्राकृतिक रूप से अत्यंत समृद्धशाली है। यहां मां नर्मदा की खूबसूरती देखते ही बनती है। संगम पर दोनों तट साल वनों से आच्छादित होने के कारण यह स्थान मनोहारी है। अमरकंटक पहुंचने वाले तीर्थयात्री संगम अनिवार्य रूप से पहुंचते हैं। यहां संगम स्थान पर खूबसूरत आधुनिक मंदिर है जिसमें मां नर्मदा, मां गंगा एवं मां अरण्यी की सुंदर मूर्ति है। इस मंदिर के सामने हनुमान का मंदिर है तथा यहां भगवान भोलेनाथ विराजमान है। संगम स्थान पर स्टॉप डेम बना दिया गया है जिसमें स्नान एवं पितर पूजन के लिए सुंदर घाट बनाए गए हैं। पितर पक्ष के समय यहां बड़ी संख्या में महाराष्ट्र, गुजरात, मध्य प्रदेश सहित देश के कोने कोने से श्रद्धालु पहुंचते हैं तथा पितर पूजन एवं पिंडदान करते हैं।

विंध्याचल एवं सतपुड़ा पर्वत की प्राकृतिक वादियों में गिरे अमरकंटक की पावन भूमि पर स्थित अरण्यी संगम में पिंडदान एवं पितरों की पूजा का विधान है। ऐसा पौराणिक उल्लेख है कि यहां किए गए पितर पूजन का फल गंगा नदी एवं फल्गु नदी में किए गए पित्र पूजन से श्रेष्ठ है। अरण्यी संगम के बारे में नर्मदा पुराण में उल्लेखित है कि 16 बार गयाजी में पिंड दान करने का जो फल प्राप्त होता है वही फल अरण्यी संगम में एक बार पिंडदान करने से मिलता है। अरण्यी संगम में पित्र दोष एवं मांगलिक दोष की भी पूजा कराई जाती है। बताया गया है कि अरण्यी संगम में कराए गए कालसर्प दोष की पूजा का फल नासिक स्थित त्रयंबकेश्वर महादेव में कराई गई पूजा से 10 गुना फल मिलता है।

अरण्यी संगम पर माता सती अनसूइया ने 100 वर्ष तपस्या की थी तथा भगवान दत्तात्रेय को अपने पुत्र के रूप में प्राप्त किया था इस कारण से अरंडी संगम में स्नान, दान, ध्यान करने से संतान प्राप्ति होती है। अरण्यी संगम के तट पर दाह संस्कार करने के बाद गंगा जाने की जरूरत नहीं पड़ती क्योंकि गंगा स्वयं नर्मदा से मिलने यहां आती है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार जेष्ठ शुक्ल पक्ष की दशमी गंगा दशहरा को गंगा स्वयं नर्मदा से मिलने आती हैं । इन सब कारणों से अरण्यी संगम का अत्यंत पौराणिक महत्व है तथा अमरकंटक पहुंचने वाले तीर्थयात्री परिक्रमा वासी, श्रद्धालु अरण्यी संगम पहुंचकर पुण्य लाभ प्राप्त करते हैं। अरण्यी संगम 500 मीटर आगे मां नर्मदा पंचकोशी परिक्रमा क्षेत्र का प्रमुख तीर्थ चक्रतीर्थ है। चक्रतीर्थ नर्मदा नदी पर अरण्यी संगम एवं कपिलधारा के बीच स्थित है।

पुराणों में ऐसा लिखा है कि भगवान विष्णु ने इसी स्थान पर तपस्या कर सुदर्शन चक्र प्राप्त किया था इसलिए इस स्थान का नाम चक्रतीर्थ पड़ा। वर्तमान में यहां सीताराम बाबा नामक संत का आश्रम है। सीताराम बाबा अमरकंटक क्षेत्र में तपस्वी संत के रूप में प्रचलित है तथा इनका एक आश्रम माई का मड़वा में भी स्थित है। सीताराम बाबा के दर्शन सबके लिए सुलभ नहीं है। दर्शन देने पर सीताराम बाबा जमकर गरियाते हैं। कुछ भक्ति से आशीर्वाद मानकर स्वीकार करते हैं तथा कुछ गारी खाने के डर से उनके आश्रम नहीं जाते लेकिन इन सबके बावजूद उनके दर्शन एवं आशीर्वाद को लोग लालियत रहते हैं। बताते हैं कि बड़े-बड़े नेता एवं बड़े बड़े अधिकारी उनकी गाली रूपी आशीर्वाद लेने वहां पहुंचते हैं। अपने मिजाज के अनुरूप बाबा सीताराम भर कर गरियातें हैं। कन्या भोजन एवं भंडारा सीताराम बाबा के द्वारा नित्य नियम से कराया जाता है जिसके लिए वे काफी प्रसिद्ध है। अब उनकी लीला वे ही जाने।

 

 हर हर नर्मदे।                                       क्रमशः

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