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केंद्र सरकार जम्मू-कश्मीर में 26 साल बाद परिसीमन करा रही, जानें- क्या बदलेगा और क्यों …

नई दिल्ली। जम्मू-कश्मीर के राजनीतिक दलों के 14 नेताओं से मुलाकात के बाद पीएम नरेंद्र मोदी ने नए बने केंद्र शासित प्रदेश में परिसीमन को जरूरी बताया है। उन्होंने ट्वीट कर कहा, ‘हमारी प्राथमिकता यह है कि जम्मू-कश्मीर में जमीनी तौर पर लोकतंत्र को मजबूत किया जाए। इसके लिए परिसीमन तेजी से कराए जाने की जरूरत है ताकि चुनाव हो सकें और जम्मू-कश्मीर को चुनी हुई सरकार मिल सके। इससे विकास में भी तेजी आ सकेगी।’ इस मीटिंग से पहले ही इस बात के कयास लगाए जा रहे थे कि मोदी सरकार की ओर से परिसीमन का एजेंडा रखा जा सकता है। बता दें कि परिसीमन आयोग का सरकार की ओर से पहले ही गठन किया जा चुका है और उसने नए बने केंद्र शासित प्रदेश का सर्वे शुरू कर दिया है। आइए जानते हैं, क्या है परिसीमन आयोग का काम और इससे क्या बदलाव होंगे।

जनसंख्या के आधार पर समय-समय पर विधानसभा और लोकसभा सीटों का परिसीमन किया जाता है। इसके तहत विधानसभा और लोकसभा सीटों के क्षेत्र का पुनर्गठन होता है। आबादी और क्षेत्रफल के अनुसार यह होता है। यह काम परिसीमन आयोग की ओर से किया जाता है और उसके फैसले को किसी कोर्ट में चुनौती नहीं दी जा सकती। इसे जनगणना के नवीनतम आंकड़ों के आधार पर किया जाता है ताकि सभी सीटों का बंटवारा व्यवहारिक हो। सीटों के क्षेत्रफल के अलावा इसके चलते कई बार राज्य में विधानसभा या लोकसभा की सीटों में भी बदलाव हो जाता है।

जम्मू-कश्मीर की लोकसभा सीटों का परिसीमन तो पूरे देश के साथ ही होता रहा है, लेकिन विधानसभा सीटों का परिसीमन आखिरी बार 1995 में हुआ था। इसकी वजह यह थी कि आर्टिकल 370 लागू होने के चलते प्रदेश की विधानसभा का परिसीमन राज्य के संविधान के तहत तय होता था। वहीं लोकसभा सीटों के परिसीमन के लिए भारतीय संविधान ही लागू होता था। जम्मू-कश्मीर में आजादी के बाद से अब तक तीन बार 1963, 1973 और 1995 में ही विधानसभा सीटों का परिसीमन हुआ था। आखिरी बार 1995 में जब परिसीमन हुआ था, तब राज्य में गवर्नर रूल था और 1981 की जनगणना के आंकड़ों के आधार पर किया गया था। राज्य में 1991 में जनगणना ही नहीं हुई थी और फिर 2001 की जनगणना के बाद कोई परिसीमन नहीं हुआ। यहां तक विधानसभा से एक प्रस्ताव को मंजूरी दी गई थी, जिसमें परिसीमन पर 2026 तक के लिए रोक की बात थी।

राज्य की विधानसभा सीटों के परिसीमन पर रोक के फैसले को सुप्रीम कोर्ट ने भी बरकरार रखा था। लेकिन अब 5 अगस्त, 2019 में आर्टिकल 370 हटाए जाने और राज्य के पुनर्गठन के बाद नए नियम लागू हैं और उसके तहत परिसीमन कभी भी केंद्र सरकार द्वारा कराया जा सकता है। राज्य के पुनर्गठन से पहले कुल 111 विधानसभा सीटें थीं, जिनमें से 46 कश्मीर में थीं और 37 सीटें जम्मू के पास थीं। वहीं लद्दाख में 4 सीटें आती थीं। इसके अलावा 24 सीटें पीओके के लिए आरक्षित थीं। विधानसभा सीटों के इस बंटवारे को लेकर बीजेपी समेत कई राजनीतिक दल आपत्ति जताते रहे हैं। उनका कहना था कि इसके तहत जम्मू में कम सीटें आती हैं, जबकि वहां आबादी कश्मीर के मुकाबले अधिक है। इसीलिए अब कहा जा रहा है कि नए परिसीमन के बाद कश्मीर के मुकाबले जम्मू में सीटें अधिक हो सकती हैं।

केंद्र सरकार की ओर से 6 मार्च, 2020 को जम्मू-कश्मीर में परिसीमन के लिए आयोग का गठन किया गया था। इसकी अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज रंजन प्रकाश देसाई कर रहे हैं। इस आयोग को परिसीमन के लिए एक साल का समय दिया गया था, लेकिन कोरोना संकट के चलते इसे एक साल के लिए और बढ़ाया गया है। जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन विधेयक के मुताबिक राज्य में केंद्र शासित प्रदेश में 107 से 114 सीटें हो सकती हैं। इससे यह माना जा रहा है कि जम्मू क्षेत्र को फायदा होगा। आयोग में देसाई के अलावा चुनाव आयुक्त सुशील चंद्रा, जम्मू-कश्मीर के चुनाव आयुक्त केके शर्मा को शामिल किया गया है। इसके अलावा आयोग में 5 एसोसिएट मेंबर भी हैं। इनमें फारूक अब्दुल्ला, मोहम्मद अकबर लोन, हसनैन मसूदी, केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह और बीजेपी के नेता जुगल किशोर शर्मा शामिल हैं।

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