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एमपी उप चुनाव : बिना लड़े जीतना चाहते हैं कांग्रेस में अरुण यादव, नतीजों के बाद होगी प्रदेश अध्यक्ष के कुर्सी की लड़ाई …

भोपाल। प्रदेश में होने वाले तीन विधानसभा और एक लोक सभा उपचुनाव के नतीजे दोनों ही दलों में कई नेताओं का भविष्य तय करेंगे। उप चुनाव नतीजों के पहले ही भाजपा और कांग्रेस में इसकी जमावट शुरू हो गई है। मनमोहन सिंह सरकार में राज्य मंत्री रहे प्रदेश के पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष अरुण यादव ने खंडवा से सबसे मजबूत दावेदार होने के बाद भी जिस तेजी से चुनाव लड़ने से इनकार किया, उसे कांग्रेस संगठन की अंदरूनी कलह के साथ कांग्रेस में प्रदेश अध्यक्ष की लड़ाई से भी जोड़कर देखा जा रहा है।

अरुण यादव एक बार खरगोन से और एक बार खंडवा बुरहानपुर लोकसभा क्षेत्र से सांसद रह चुके हैं। इसके बाद वे 2014 और 2019 में लोकसभा के दो चुनाव लगातार हारे हैं। वर्ष 2018 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने उन्हें मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के खिलाफ बुधनी से मैदान में उतारा था। इस चुनाव को मिलाकर वे लगातार तीन चुनाव हार चुके हैं। वे खंडवा लोकसभा उपचुनाव के लिए पिछले 6 महीने से क्षेत्र में सक्रिय थे। उन्होंने पूरे क्षेत्र का दौरा कर बूथवार जमावट भी शुरू कर दिया था। इस बीच रविवार रात को कांग्रेस के बड़े नेताओं से मुलाकात के बाद उन्होंने अचानक चुनाव लड़ने से इनकार कर दिया।

2023’ की लड़ाई लड़ना चाहते हैं अरुण- राजनीतिक क्षेत्र में चुनाव नहीं लड़ने के उनके फैसले को हालांकि, कांग्रेस की गुटबाजी से जोड़कर देखा जा रहा है, लेकिन कांग्रेस के अंदरूनी सूत्र इसके पीछे नई कहानी बयां कर रहे हैं। कांग्रेस पार्टी के सूत्रों के अनुसार यह उप चुनाव की नहीं, 2023 की लड़ाई है। इस उप चुनाव में नतीजे जो भी आएं, कांग्रेस में प्रदेश अध्यक्ष के लिए नए नाम की मांग उठेगी। इसके पीछे दो बड़े कारण हैं एक तो कांग्रेस आला कमान मध्य प्रदेश में युवा नेतृत्व देना चाहता है और मौजूद अध्यक्ष कमलनाथ का प्रयोग केंद्रीय राजनीति में हो, इसकी संभावना टटोली जा रही है। दूसरा बड़ा कारण प्रदेश में पिछड़ा वर्ग की राजनीति है। कांग्रेस में एक बड़ा तबका यहां युवा और पिछड़े वर्ग का प्रदेश अध्यक्ष चाहता है। सत्ताधारी भाजपा जिस तरह से पिछड़े वर्ग को साध रही है, उसको लेकर कांग्रेस में भी चिंता है। ऐसे में अरुण यादव नहीं चाहते थे कि लोकसभा चुनाव लड़कर वह 2023 की लड़ाई से बाहर हो जाएं।

अंदरूनी गुटबाजी प्रभावित कर सकती है नतीजा – वर्ष 1989 से अभी तक कांग्रेस खंडवा लोकसभा सीट सिर्फ दो बार जीती है। एक बार 1991 में जब पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की मृत्यु के बाद वहां वोटिंग हुई थी और दूसरा 2009 में। ऐसे में इस सीट का मिजाज भाजपा के पक्ष में है इसके अलावा कांग्रेस के अंदर चल रही गुटबाजी भी यहां के नतीजों को प्रभावित कर सकती है।

शहीद होने के बजाय ‘योद्धा की भूमिका की सलाह – कांग्रेस पार्टी के सूत्र बताते हैं कि अरुण यादव को उनके करीबी मित्रों और सलाहकारों ने मौजूदा परिस्थितियों में शहीद होने के बजाय योद्धा बनकर मैदान में डटे रहने की सलाह दी थी। यदि उपचुनाव का नतीजा उनके पक्ष में नहीं आता तो अरुण यादव लगातार 3 लोकसभा चुनाव हारने के कारण प्रदेश अध्यक्ष की दौड़ से बाहर हो जाते।

उप चुनाव के नतीजों के बाद प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी की जंग- यादव 2013 के बाद पार्टी के अध्यक्ष रहे हैं, लेकिन 2018 के विधानसभा चुनाव के ठीक पहले उन्हें हटाकर कमलनाथ को प्रदेश की कमान दे दी गई थी। उप चुनाव के जो भी नतीजे आएंगे उसके बाद कांग्रेस में 2023 के लिए नेतृत्व की जंग होगी। माना जा रहा है कि कांग्रेस में भी पिछड़ा वर्ग का अध्यक्ष हो, इसकी तैयारी की जा रही है। कांग्रेस में प्रदेश अध्यक्ष के लिए पिछड़े वर्ग से पूर्व मंत्री जीतू पटवारी और कमलेश्वर पटेल भी दावेदार हैं। दोनों ही विधायक हैं और कमलनाथ सरकार में मंत्री रह चुके हैं। कमलेश्वर विंध्य से आते हैं और पटवारी मालवा से। ऐसे में अरुण यादव भी इस दौड़ में बने रहना चाहते हैं। उपचुनाव में वे सक्रिय रहकर यह भी बताने की कोशिश करेंगे कि वे पार्टी लाइन पर काम कर रहे हैं। ऐसे में उनके चुनाव नहीं लड़ने के फैसले को कांग्रेस में मौजूदा नेतृत्व को चुनौती देने और चुनाव नहीं लड़ने के बाद भी जीतने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।

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