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केवल जीने से स्वस्थ जीवन जीना अधिक महत्वपूर्ण : मंजू दीदी

बिलासपुर। लम्बे समय जीवन जीने से अधिक महत्वपूर्ण है स्वस्थ व सुखमय जीवन जीना। हम कितना जीते हैं उसकी अपेक्षा हम कैसा जीवन जीते हैं, देश, समाज व परिवार के लिए क्या कर पा रहे हैं, इस पर हमारा ध्यान होना चाहिए। जब हमारा मन शक्तिशाली होता है तो उसका प्रभाव हमारे तन पर भी पड़ता है।

योगी बनने के साथ हमें उपयोगी बनना बहुत जरूरी है। परमात्मा के साथ हमारा जुड़ाव अर्थात् याद ही योग है और यही भारत का प्राचीन योग है इसे राजयोग कहा जाता है राजयोग सर्व योगों का राजा है इसमें ज्ञानयोग, कर्मयोग, भक्तियोग, समत्वयोग, सन्यासयोग सभी शामिल हैं। इसमें आत्मा का परमात्मा से मिलन होता है। परमात्मा से सर्व संबंध जोड़कर दिल से याद करना व उसकी रचना से प्रेम करना ही मेडिटेशन है।

उक्त बातें 7वें विश्व योग दिवस पर रानी दुल्लैया आयुर्वेदिक महाविद्यालय, भोपाल द्वारा दीर्घ जीवन के लिए योग’ विषय पर आयोजित वेबिनार को सम्बोधित करते हुए टिकरापारा सेवाकेन्द्र प्रभारी ब्रह्माकुमारी मंजू दीदी जी ने कही। आपने अपने निजी जीवन में योग, आयुर्वेद और सकारात्मक सोच के प्रभाव का अनुभव साझा किया और एक अनुक्रम बताते हुए कहा कि क्रमशः हमें सकारात्मक चिंतन, ध्यान, प्राणायाम, आसन, एक्यूप्रेशर, घरेलु चिकित्सा व प्राकृतिक चिकित्सा का प्रयोग पहले करना चाहिए क्योंकि ये प्रभावशाली, हानिरहित व निःशुल्क हैं इसके पश्चात ही हमें आयुर्वेदिक, होम्योपैथी, एलोपैथी आदि चिकित्सा की ओर रूख करना चाहिए। पर इन सभी पद्धतियों में सकारात्मक सोच, श्रद्धा व विश्वास का भाव होना बहुत जरूरी है।

दीदी ने बतलाया कि जिस प्रकार जंगल बनाने में मेहनत नहीं लगती बल्कि बगीचा तैयार करने में मेहनत है उसी प्रकार सकारात्मक सोच कोई ओवरनाइट प्रोसेस नहीं है जो एक दिन के सत्संग या चिंतन से हमारा संस्कार बन जाए बल्कि यह एक सतत प्रक्रिया है, रोजाना शरीर के भोजन की तरह मन को भी सकारात्मक विचारों का भोजन देना जरूरी है। दीदी ने इस योगसत्र को संगीतमय बनाते हुए आज से पहले, आज से ज्यादा खुशी आज तक नहीं मिली गीत पर सभी को एक्सरसाइज का अभ्यास भी कराया।

ज्योति विद्यापीठ जयपुर के प्रो-वाइस चांसलर प्रोफेसर कमलेश शर्मा जी ने कहा कि योग भाषण का विषय नहीं योग अभ्यास है। और दीर्घ आयु के लिए योग के अभ्यासों को नित्य जीवन में अपनाना होगा। इस कोरोना काल में बहुत लोग प्रभावित हुए उसमें योग करने वाले भी शामिल थे किन्तु सामान्य और योग अभ्यासी में यही अंतर रहा कि योग अभ्यासी को सामान्य की तुलना में कम कष्ट झेलना पड़ा और वे जल्दी रिकवर हो गए। जितना हमारा योग का इनपुट होगा उतना ही आउटपुट मिलेगा। संजीवनी बटी ज्ञान है जबकि पैरासिटामॉल विज्ञान है। हम योग को जितना फैलायेंगे सभी के जीवन की आयु दीर्घ होगी।

सम्पूर्णन्द आयुर्वेद कॉलेज, वाराणसी के प्रोफेसर डॉ. के.के. द्विवेदी जी ने योग की परिभाषा, आठ अंग व प्रकारों का वर्णन किया। रानी दुल्लैया कॉलेज की डॉ. रचना जैन व डॉ. कृष्णा तिवारी ने मंच संचालन किया।

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