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सुआ के माध्यम से गांव की बेटियां कर रहीं छत्तीसगढ़ी परम्परा का संरक्षण ….

बांस की टुकनी में मिट्टी का सुआ बनाकर घर घर जाकर दे रही सुख समृद्धि का आशीष

 

राजिम। अंचल में इन दिनों बांस की टुकनी में मिट्टी का सुआ बनाकर एक घर से दूसरे घर की ओर आते जाते हुए बच्चियों एवम माताओं की टोलियां बरबस ही मन को आकृष्ट कर लेती है। दीपावली आने से सप्ताह भर पूर्व किया जाने वाला यह लोकनृत्य छत्तीसगढ़ के सभी क्षेत्रों में लक्ष्मी पूजा तक चलता रहता है, जो गौरा गौरी की स्थापना के साथ ही समाप्त होता है। राजिम अंचल के ग्राम दूतकैंया, परसदा जोशी, पोखरा, अरण्ड, बासीन सहित सभी गांवों में यह नजारा आसानी से देख सकते हैं।

सुआ नृत्य के बारे में जानकारी देते हुए अंचल के ख्यातिप्राप्त शिक्षक एवम साहित्यकार श्रवण कुमार साहू ने बताया कि समूह में किये जाने वाले इस नृत्य को स्थानीय बोली में पडकी नाचना कहते हैं। पडकी याने कि मिट्ठू या सुआ। प्राचीन काल में मिट्ठू एक संदेशवाहक के रूप में पत्र का आदान प्रदान करते थे, जो विशेषकर प्रेमी प्रेमिका के मन की तड़प को एक दूसरे तक पहुंचाने का कार्य करते थे। शायद उसी समय से सुआ नाचने की परंपरा चली होगी।

पडकी नाचने वाली बहनें, बेटियाँ एवम मातायें सुआ नृत्य में श्रृंगार परक गीत, विशेषकर वियोग श्रृंगार का गीत गाती है। एक मुख्य गायक का काम करती है, बाकी कोरस के रूप में गीत को आगे बढ़ाती है। नाचते समय हाथों की तालियों एवम लकड़ियों से बने छोटे छोटे चुटकियों की आवाज गीत की लयबद्धता के साथ मिलकर बहुत ही सुकून देने वाली ध्वनि उत्पन्न करती है, जो मन को आनन्दित कर देती है।

नाचने के बाद, उसे घर की गृहणियों के द्वारा चावल, दाल, रुपये पैसे देकर बिदा किया जाता है, जिससे खुश होकर पड़काहरिन बहने नाना प्रकार के आशीर्वाद प्रदान करतीं हैं, जिसे अति शुभ एवम मंगलदायक माना जाता है।

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