मध्य प्रदेश

सांची: जहां पत्थर बोलते हैं, जानें यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर की सूची में शामिल सांची के अतीत से जुड़ी कुछ रोचक बातें

सांची में दो दिवसीय बौद्ध महोत्सव का शुभारंभ, देश-विदेश से पहुंचे हजारों श्रद्धालु, कोरोनाकाल के बाद पहली बार आयोजित समारोह को लेकर बौद्ध अनुयायियों में भारी उत्साह

भोपाल (कैलाश गौर)। एमपी की राजधानी भोपाल के नजदीक सांची में बौद्ध वार्षिक महोत्‍सव धूमधाम से मनाया जा रहा है। विश्व पर्यटन स्थल एवं बौद्ध तीर्थ सांची में 65वां बौद्ध महोत्सव आज सुबह लगभग 7 बजे बौद्ध अनुयायियों के भक्ति संगीत के साथ शुरू हुआ। बड़ी संख्या में पहुंचे श्रीलंका और अन्य देशों के बौद्ध अनुयाई पारंपरिक ढोल-नगाड़ों के साथ कतारबद्ध होकर श्रीलंका महाबोधि सोसायटी से स्तूप पहाड़ी स्थित बुद्ध मंदिर पहुंचे। इस समारोह में भारत के साथ ही श्रीलंका, जापान, वियतनाम सहित अन्‍य देशों के हजारों श्रद्धालु शिरकत करने पहुंचे हैं।

हाथों में फूलों के थाल और श्रीलंका के ध्वज लिए हुए अनुयाई बड़े स्वामी वानगल उपतिस्स महाथेरो के नेतृत्व में बुद्ध मंदिर पहुंचे। जहां प्रशासनिक अधिकारियों की उपस्थिति में मंदिर के तहखाने में रखे भगवान बुद्ध के शिष्य सारिपुत्र और महामुगलयान के अस्थि कलश को बाहर निकाला गया और अस्थियों की पूजा-अर्चना कर उत्सव की शुरूआत की। इस दो दिवसीय आयोजन में दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संघ (सार्क) देशों अफगानिस्तान, बांग्लादेश, भारत, भूटान, मालदीव, नेपाल, पाकिस्तान, श्रीलंका के अलावा जापान, चीन, ताइवान, भूटान, थाईलैंड सहित अन्य देशों के सरकारी प्रतिनिधि भी शामिल हैं। सांची महोत्सव में दोनों दिन शाम के समय विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाएगा, जिनमें प्रदेश सरकार के संस्कृति मंत्री सुरेंद्र पटवा और रायसेन जिले के प्रभारी मंत्री सूर्यप्रकाश मीणा शामिल होंगे। शनिवार शाम 7 बजे से सांस्कृतिक कार्यक्रमों की शुरुआत होगी। कल रविवार को महोत्सव का समापन होगा, जिसमें लगभग एक लाख लोगों के शामिल होने की संभावना है।

तहखाने में रखी गई हैं भगवान बुद्ध के दो परम शिष्यों की

अस्थियां साल में दो बार दर्शन के लिए निकाला जाता है बाहर

महोत्‍सव के दौरान यहां पर्यटक बौद्ध दर्शन के साथ सनातन संस्कृति भी देख सकेंगे। सांची के प्राचीन शिलालेखों में बौद्ध दर्शन व सनातन संस्कृति का समावेश नजर आता है। महोत्सव में सांची में भगवान बुद्ध के दो परम शिष्यों सारिपुत्र व महामोग्गलायन की पवित्र अस्थियों को सार्वजनिक रूप् से दर्शन के लिए चैत्यागिरी विहार मंदिर में रखा गया है। मध्यप्रदेश स्थित सांची का स्तूप, यूनेस्को की विश्व धरोहर में शामिल है। यहां रोजाना सैकड़ों पर्यटक आते हैं। इस स्तूप को लेकर इस बात को कम ही लोग जानते हैं कि इसके परिसर में बने तहखाने में भगवान बुद्ध के दो शिष्यों की अस्थियां रखी हैं। वर्ष में सिर्फ दो दिन यह अस्थियां प्रशासन व पुलिस की सुरक्षा में स्तूप से निकालकर सार्वजनिक रूप से दर्शन के लिए रखी जाती हैं। बाकी समय ये तहखाने में रख दी जाती हैं। इस तहखाने पर बड़ा सा ताला लगा रहता है, जिसकी एक चाबी कलेक्टर, तो दूसरी महाबोधि सोसायटी के पास रहती है। महोत्सव के दौरान दोनों चाबियों को मिलाकर इसे खोला जाता है। स्तूप की खोज से लेकर अब तक इसकी यात्रा में कई पड़ाव आए। यहां खजाने को ढूंढ़ने के लिए इसका विध्वंस भी किया गया, बाद में पुनर्निर्माण भी हुआ।

सम्राट अशोक ने बनवाया था सांची का मुख्य स्तूप

भोपाल से 46 और विदिशा से 10 किमी दूर बेतवा नदी किनारे बना सांची स्तूप रायसेन जिले में स्थित है। इतिहासकारों व पुरातत्वविदों के मुताबिक ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी (करीब 2300 साल पहले) में सम्राट अशोक ने कलिंग युद्ध के बाद सांची में स्तूप का निर्माण करवाया था। बता दें कि कलिंग युद्ध के बाद सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म अपना लिया था। स्तूप का निर्माण कार्य सम्राट ने पत्नी सक्यकुमारी महादेवी को सौंपा था। महादेवी विदिशा के एक व्यापारी की बेटी थीं। सम्राट अशोक और महादेवी की शादी भी सांची में हुई थी। स्तूप का निर्माण ईंटों से हुआ है। आज यहां छोटे-बड़े कई स्तूप हैं, जिनमें से स्तूप नंबर-2 सबसे बड़ा है। यह चारों ओर हरियाली और कई तोरण द्वारों से घिरा है। स्तूप नंबर-1 के पास छोटे-छोटे अन्य कई स्तूप हैं। सम्राट अशोक ने जिस सिंह स्तंभ को बनवाया, उसमें ब्राह्मी लिपि का उपयोग किया गया है। ब्राह्मी लिपि को संस्कृत के समान सनातन लिपि माना जाता है।

स्तूप के तोरण द्वारों पर उकेरी गई हैं भगवान बुद्ध से जुड़ी जातक कथाएं

विश्व संरक्षित धरोहर सांची का स्तूप भारत के सबसे बड़े स्तूपों में से एक है, जिसकी ऊंचाई करीब 21.64 मीटर और व्यास 36.5 मीटर है। स्तूप में 4 तोरण द्वार हैं, जिन पर महात्मा गौतम बुद्ध के जीवन से लेकर परिनिर्वाण तक की कथाएं चित्रित हैं। इन जातक कथाओं में भी सनातनी संस्कृति मिलती है। जिस प्रकार सनातन धर्म में भगवान विष्णु के विभिन्न अवतारों की कथा है, उसी तरह भगवान बुद्ध की जातक कथाओं का चित्रण स्तूप के तोरण द्वारों पर मिलता है। भगवान बुद्ध के पूर्व जन्मों की जातक कथाओं को पत्थरों के स्तंभों पर उकेरा गया है। प्रत्येक तोरण में दो चौकोर स्तंभ हैं, जिसमें चार शेर, हाथी, बंदर इत्यादि उकेरे गए हैं। इनमें पांच जातकों के दृश्य मिलते हैं। इन पांच जातकों में छद्दन्त जातक, महाकपि जातक, महावेस्सन्तर जातक, अलम्बुस जातक और साम जातक। भगवान बुद्ध के जीवन से संबंधित जिन दृश्यों को तोरणों में उकेरा गया है, उनमें भारतीय दर्शन नजर आता है। सांची स्तूप के तोरण द्वारों पर गौतम बुद्ध सहित पहले के छह मानुषी बुद्धों को प्रतिकात्मक रूप से दर्शाया गया है। आज भी यह धर्म पिपासुओं, पर्यटकों और इतिहास के विद्वानों के लिए यह अपूर्व अध्ययन केंद्र है। स्तूप का निर्माण कुछ इस प्रकार से किया गया है कि बौद्ध धर्म की शिक्षा और उसका अध्ययन करने वाले लोगों को आसानी हो। सांची के स्तूप नंबर-1 में ब्रह्मी लिपि में लिखे कई शिलालेख पाए गए हैं। इस स्तूप की संरचना और शिल्पकारिता के कारण साल 1989 में यूनेस्को ने इसे विश्व धरोहर स्थल सूची में शामिल कर लिया।

यहां स्थित ब्राह्मी लिपि के शिलालेख को माना गया है विश्व का प्राचीनतम शिलालेख

सांची में मौजूद सम्राट अशोक के स्तंभ पर ब्राह्मी लिपि में मौजूद शिलालेख को विश्व का प्राचीनतम शिलालेख माना जाता है। कुछ इतिहासकार व पुरातत्वविद ब्राह्मी लिपि को संस्कृत का भी भाग मानते हैं। क्योंकि सम्राट अशोक ने संस्कृत में शिक्षा-दीक्षा प्राप्त की थी। इससे यह बात स्पष्ट होती है कि सनातन संस्कृति का उनके जीवन पर गहरा प्रभाव था। गौतम बुद्ध के पूर्वज भी सनातन धर्म के ही मानने वाले थे। गौतम बुद्ध ने अपने जीवनकाल में जो शिक्षा प्राप्त की, उसमें सनातन की परंपराएं शामिल हैं। जैसे गौतम बुद्ध का निर्वाण, आध्यात्मिक व नैतिक साधनाएं, दुख का निदान, ज्ञान, कर्म के बंधन से छुटकारा, पुनर्जन्म के चक्र से मुक्ति इत्यादि में सनातन समाहित हैं।

शुंग राजा ने बिगाड़ा और उनकी पीढ़ियों ने ही संवारा

इतिहासकारों के मुताबिक ईसा पूर्व शुंग वंश के सम्राट पुष्यमित्र शुंग ने स्तूप का विध्वंस कर दिया था। इसके बाद पुष्यमित्र के ही बेटे अग्निमित्र ने पत्थरों से स्तूप को पुन: बनवाया। शुंग काल के आखिर तक स्तूप के मूल रूप का करीब दोगुना विस्तार हो चुका था। इस दौरान स्तूप के गुंबद को चपटा करके एक हिस्से के ऊपर छतरियां बनवा दी गईं। स्तूप के शिखर पर धर्म का प्रतीक और विधि चक्र लगा था। सातवाहन काल में तोरण द्वारों और कटघरों का निर्माण कराया गया था, जिन्हें सुंदर रंगों से रंगा गया था। कहा जाता है कि द्वार पर बनाई गई कलाकृतियां और द्वारों के आकार को खुद सात वाहन राजा सातकर्णी ने ही निर्धारित किया था।

संरक्षण के अभाव के चलते खजाने के लालच में किया जाता रहा स्तूप का विध्वंस

14वीं शताब्दी तक स्तूप दयनीय स्थिति में पहुंच गया था। उस दौर के किसी भी शासक ने स्तूप के संरक्षण पर ध्यान नहीं दिया। सन् 1615 तक भारत की भूमि पर ईस्ट इंडिया कंपनी ने पैर पसारने शुरू कर दिए थे। समय बीतता गया, वर्षों पुराना इतिहास समेटे सांची स्तूप की स्थिति भी दयनीय होती गई। इस दौरान खजाने के लालच में लोगों ने स्तूप के पास जमकर खुदाई की, जिससे इस धरोहर को काफी क्षति पहुंची

ब्रिटिश शासन में वर्ष 1912 में पुन: हुआ स्तूप का पुननिर्माण

उपलब्ध इतिहास के मुताबिक ब्रिटिश शासनकाल में वर्ष 1818 में एक ब्रिटिश अधिकारी जनरल टेलर ने सांची के स्तूप की खोज की। इन्होंने स्तूप के बारे में जानकारी इकट्‌ठा की। स्तूप की निर्जन हो चुकी अवस्था को देखते हुए ब्रिटिश सरकार ने सर जॉन मार्शल को इसके पुनर्निर्माण का कार्य सौंपा। इसके बाद सर मार्शल ने साल 1912 में दोबारा स्तूप का पुनर्निर्माण शुरू कराया और 1919 तक स्तूप को दोबारा खड़ा कर लिया गया। यह वही निर्माण है, जो आज भी विद्यमान है। वर्ष 1919 में ही सर मार्शल ने स्तूप के संरक्षण के लिए एक पुरातात्विक संग्रहालय की स्थापना की, जिसे बाद में सांची पुरातत्व संग्रहालय के रूप में बदल दिया गया।

इंग्लैंड से अस्थियां सांची लाए, तब से मनाते हैं महोत्सव

महाबोधि सोसायटी के तपस्वी स्वामी के अनुसार वर्ष 1818 में ब्रिटिश अफसर ने सांची की खोज की थी। साल 1851 में जनरल कनिंघम और कैप्टन मेसी सांची और सतधारा स्तूपों से भगवान बुद्ध के दो परम शिष्यों सारीपुत्र और महामोदग्लायन की अस्थियों को निकालकर ब्रिटेन ले गए। कैप्टन और जनरल ने शिष्यों के अस्थि कलश को इंग्लैंड के विक्टोरिया अल्बर्ट म्यूजियम में रख दिया था। इसके बाद साल 1936 में श्रीलंका की महाबोधि सोसायटी ने इन अस्थियों को भारत लाने का प्रयास किया। भोपाल के तत्कालीन नवाब और महाबोधि के प्रयासों से अस्थियों को सांची लाया गया और चेतियागिरी विहार का निर्माण कराया। इसके बाद 1947 में देश आजाद होने के बाद 30 नवंबर 1952 को तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू ने दोनों शिष्यों की इन पवित्र अस्थियों को सांची में स्थापित करवाया। तब से ही हर साल नवंबर में बौद्ध सांची महोत्सव मनाया जा रहा है।

हर साल नवंबर में होता है आयोजन

भगवान बुद्ध के परम शिष्य सारिपुत्र और महामोदग्लायन की अस्थियों के दर्शन के लिए हर साल नवंबर के आखिरी शनिवार और रविवार को बौद्ध महोत्सव मनाया जाता है। महोत्सव के अस्थि कलशों को चेतियागिरी विहार के तलघर से निकालकर श्रद्धालुओं के लिए रखा जाता है। इन 2 दिनों में अस्थि कलशों की कलश यात्रा निकाली जाती है और मुख्य स्तूप की परिक्रमा लगाई जाती है। महोत्सव का आयोजन महाबोधि सोसायटी और प्रशासन के संयुक्त तत्वावधान में किया जाता है।

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