इकोनॉमी

संस्कार ….

 (लघुकथा)

 

बसंत पंचमी का दिन था। मेरी सहेली अपनी 7-8वर्ष की बेटी के साथ घर पर आई हुई थी। मैंने सुबह -सुबह पीले वस्त्र पहने। पीले चावल और केसर का हलवा बनाया। अख़बार में से सरस्वतीजी का चित्र काटकर मेज़ पर सजाया। बच्चों को देवी को प्रणाम करने को कहा। बच्चों को पेन, पेंसिल व किताब भेंट में दी।

मेरी सहेली ने रोब जमाने के लिए अपनी बेटी से कहा -“ वसंत पर दस पंक्तियाँ बोलो। ”

बच्ची चुप। माँ को देखती रही। उसने मेरे बेटे से पूछा। जो उसकी बेटी का हमउम्र है। बेटे ने जल्दी -जल्दी बोलना शुरू किया -“ वसंत के दिन सरस्वतीजी का जन्मदिन होता है। सरस्वतीजी धन व विद्या की देवी हैं। इसदिन पीले वस्त्र पहनते हैं। पीले चावल बनाते हैं। सरस्वतीजी की पूजा करते हैं। छोटे बच्चे पढ़ाई शुरू करते हैं। पेन -पेंसिल गिफ़्ट में मिलते हैं। आदि -आदि। ”

मेरी सहेली परेशान हो गई। बोली -“तेरा बेटा बहुत होशियार है। मैंने तो अपनी बेटी को बहुत निबंध याद करवाए। पर जब पूछो इसे कुछ नहीं आता। तुम बेटे को कैसे सब याद कराती हो ?”

मैंने कहा -“मैं इसे कुछ याद नहीं कराती। बस हर त्योहार पर कुछ ऐसा करती हूँ कि उसे उसका महत्व याद रहे। मुझे जो करते वह देखता है। खुद ही सीख लेता है। मैंने कभी उसे किताब से रट्टा नहीं लगवाया। ये संस्कार हैं। जो बच्चे खुद ग्रहण कर लेते हैं। ”

 

 

©डॉ. दलजीत कौर, चंडीगढ़                                                             

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