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गुजरात का समुद्र तटीय क्षेत्र मांडलेश्वर महादेव और चमत्कारिक बलबला कुंड का दर्शन …

नर्मदा परिक्रमा भाग -14

अक्षय नामदेव। डेडियापाडा जिला नर्मदा गुजरात स्थित जलाराम आश्रम से आगे बढ़ने पर सूरज की लालिमा कुछ इस तरह दिखाई दे रही थी जैसे शाम हो गई है परंतु अभी उतनी शाम नहीं हुई थी। समुद्र तटीय इलाका होने के कारण शाम होने का भ्रम जैसा हो रहा था। समय देखा तो शाम के 4:30 ही बज रहे थे। हम अब अंकलेश्वर पहुंच चुके थे। अंकलेश्वर नर्मदा तट का समुद्र समीप शहर है। अंकलेश्वर में मांडवेश्वर महादेव का प्राचीन मंदिर है। अंकलेश्वर को अक्ररेश्वर तीर्थ भी कहा जाता है। यहां से आगे हम हंसोट पहुंचे। वहां बलबलाकुंड मंदिर का दर्शन किया। यहां स्थित भोलेनाथ के मंदिर में अद्भुत शांति है। बहुत से परिक्रमावासी भी यहां मिले। लंबी यात्रा के बाद विश्राम अच्छा लगता है। परिक्रमा वासी में से कुछ अपने कपड़े धो रहे थे तो कुछ आपस में बैठकर सत्संग कर रहे थे। यहां स्थित बलबलाकुंड के पास जाकर नर्मदे हर कहने से कुंड का पानी उफान मारने लगता है। हममें से अनेक परिक्रमा वासियों ने कुंड में नर्मदे हर की आवाज लगाकर कुंड के जल की परीक्षा ली। अब यह रासायनिक प्रभाव है या देवी शक्ति ? माता रानी जाने। मैं स्वयं इस तरह कुंड की परीक्षा लेने के पक्ष में नहीं था। कुंड के जल को प्रणाम किया और वापस मंदिर की ओर आ गया।

हंसोट स्थित बलबलाकुंड से आगे निकल कर हम अब आगे बढ़े और रेवा सागर संगम विमलेश्वर के लगभग एकदम समीप आ गए। विमलेश्वर और अंकलेश्वर के बीच की दूरी लगभग 20 किलोमीटर ही है। समुद्र तटीय इलाका होने के कारण यह क्षेत्र मैदानी है तथा बड़े-बड़े खेतों में गेहूं की फसल बोई गई थी। ट्यूबेल से खेतों में सिंचाई हो रही थी परंतु ट्यूबवेल का पानी खारा था। अब लगभग शाम हो चुकी थी और सूर्यास्त के समय हम रेवा सागर संगम पहुंच चुके थे। रेवा सागर संगम का दक्षिण तटीय गांव कठपोर है। इतने बड़े रेवा सागर संगम तीर्थ विमलेश्वर से लगे होने के बावजूद भी इस गांव का विकास नहीं के बराबर है। ऐसा लगा इस गांव में विकास की कोई ललक नहीं है। पारंपरिक रूप से समुद्री तटीय जीवन बिताने के यहां के लोग आदि हैं। छोटी मोटी जरूरत की दुकानों को छोड़ दें तो यहां चाय नाश्ते भोजन कि कोई भी दुकाने नहीं है। यह भी कह सकते हैं कि यह गांव अभी आधुनिकता एवं व्यवसायिकता से काफी दूर है।

विमलेश्वर दक्षिण तट की परिक्रमा का अंतिम पड़ाव है यहां समुद्र पार करके उत्तर तट की परिक्रमा आगे बढ़ती है। हम विमलेश्वर मंदिर परिसर में नर्मदे हर के जयघोष के साथ प्रवेश किए। वहां मंदिर परिसर में बने शेड के नीचे अनेक परिक्रमा वासी पहले से ही थे जिन्होंने हमारे नर्मदे हर के जयघोष का जवाब हर हर नर्मदे से देकर हमारा उत्साह बढ़ाया। ऐसा लगा एक ही जाति एक ही समुदाय, एक ही वर्ण ,एक ही देश के लोग एक ही जगह मिल रहे हैं वह जाति, वह समुदाय, वह देश है नर्मदे हर,,।

हम सभी साथी परिक्रमा वासी अपना अपना सामान मंदिर परिसर में बने शेड में रखने लगे और अपनी-अपनी चटाई चद्दर इत्यादि बिछाकर बैठ गए। इस बीच विमलेश्वर मंदिर परिसर घंटा घड़ियाल की आवाज से गूंज उठा। विमलेश्वर मंदिर परिसर में स्थित मां नर्मदा मंदिर में संध्याकालीन आरती शुरू हो गई। ओम जय जगता नंदी, मैया जय जगता नंदी, ब्रह्मा हरिहर शंकर, रेवा शिव हरी शंकर रुद्री पालंती।। ओम जय जगता नंदी।।

रेवा सागर संगम विमलेश्वर तीर्थ में संध्या कालीन आरती में भाग लेने के बाद हम सभी परिक्रमा वासियों ने रात्रि भोजन की सुध ली। वहां मंदिर प्रबंधन से जानकारी ली तो पता लगा कि यहां कोई व्यवस्था नहीं है। हमने प्रबंधन के लोगों से बातचीत कर उनका रसोई इस्तेमाल करने की इजाजत मांगी। बताया कि हमारे पास सब खाद्य सामग्री इत्यादि है हम अपना भोजन स्वयं कर तैयार कर लेंगे परंतु वे रसोई देने के लिए तैयार नहीं थे फिर भी हमने दबाव देकर उनसे रसोई उपयोग करने की इजाजत ले ली। रेवा सागर संगम विमलेश्वर तीर्थ में इस तरह की अव्यवस्था से हमारे मन में स्वाभाविक रूप से यह सवाल आया कि ऐसा क्यों है? बाद में वहां शेड के नीचे विश्राम कर रहे हैं एक अनुभवी परिक्रमा वासी ने हमें जानकारी दी कि पहले विमलेश्वर तीर्थ की व्यवस्था संतो के हाथ में थी जो निस्वार्थ भाव से वहां पहुंचने वाले परिक्रमा वासियों की चकाचक व्यवस्था सेवा करते थे परंतु वहां के स्थानीय ग्राम वासियों को यह नागवार गुजर रहा था और उन्होंने विमलेश्वर तीर्थ को एक कमाई वाला स्थान मानकर स्थानीय विधायक से दबाव दिलवा कर विमलेश्वर तीर्थ को ग्राम पंचायत के कब्जे में ले लिया। अब ग्राम पंचायतों या नगर पंचायतों के कर्मचारियों कर्ता-धर्ताओं का क्या हाल है यह किसी से छिपा नहीं है? इसलिए इस तरह की समस्या वहां विमलेश्वर तीर्थ के लोगों को होती है।

हमारे परिक्रमा वासी दल के सदस्यों ने मिलजुल कर रात्रि का भोजन दाल चावल रोटी सब्जी तैयार की और हम लोग रात लगभग 11:00 बजे भोजन इत्यादि से निवृत हो सुबह जल्दी उठने के इरादे से सो गए।

25 मार्च 2021 की सुबह सभी परिक्रमा वासी जल्दी उठकर स्नान ध्यान करने लगे। मंदिर के घंटा घड़ियाल की आवाज सुनकर जब मेरी नींद सुबह खुली तो देखता हूं कि रात्रि में शेड के नीचे विश्राम करने वाले परिक्रमा वासी नहा धोकर अपनी अपनी जगह में बैठे मां नर्मदा की पूजन आरती में लीन है। मेरे साथी परिक्रमा वासी भी बारी बारी से नहा धोकर तैयार हो रहे हैं। मैं भी उठा और मैंकला बेटी से अपने उपयोग की सामग्री लेकर नहाने धोने चला गया। आकर स्वच्छ कपड़े पहने और विमलेश्वर तीर्थ में भोलेनाथ का दर्शन किया। मां नर्मदा मंदिर में जाकर पूजन अर्चन किया। वहां उपस्थित परिक्रमा वासियों का चरण छूकर दक्षिणा दी आशीर्वाद मांगा। मां नर्मदा से मन ही मन कामना की कि माता इसी तरह आप अपनी कृपा बनाए रखते हुए अपने तटों का दर्शन देते रहना । फिर परिक्रमा में बुलाना।पूजा पाठ एवं मंदिर परिसर में फोटोग्राफी करते करते सुबह के लगभग 10:00 बज गए तभी नाव वाला वहां उपस्थित जनों की गिनती करने आया। विमलेश्वर रेवासागर संगम से नाव तभी रवाना होती है जब लगभग 40 से ज्यादा यात्री उसे मिल जाते हैं। वह मंदिर के चबूतरे पर बैठकर लोगों का नाम पता फोन नंबर इत्यादि लिखने लगा तथा प्रत्येक व्यक्ति के हिसाब से ढाई सो सौ जमा कराने लगा। कहने लगा संख्या पूरी हो जाएगी और सही समय में ज्वार आया  तो दोपहर 1:00 बजे समुद्र तट से नाव रवाना होगी। दरअसल नाव की रवानगी रेवा सागर संगम तट पर समुद्री ज्वार भाटे पर निर्भर करती है। जब समय पर ज्वार आता है तभी तट पर नाव लग पाती है और नाव रवाना होती है।अभी संख्या लगभग 30 हुई थी ऐसे में लग रहा था कि आज नाव रवाना होगी या नहीं? हमने अपना नाम पैसा जमा करा कर बाकी मैया की इच्छा जान कर वहां से किनारे हो गए। तब तक और भी परिक्रमा वासी विमलेश्वर तीर्थ पहुंच गए थे ।इस तरह लगभग 40 परिक्रमा वासियों की एक खेप समुद्र पार करने को तैयार थी पर अब समुद्री ज्वार पर हमारी यात्रा निर्भर थी।

 

नाव रवाना होने में एक या डेढ़ बज सकते हैं इसकी कल्पना करके हमने एक बार पुनः भोजन बनाने का विचार करने लगे और व्यवस्था में जुट गए परंतु हमारी कोशिश बेकार रही। ग्राम पंचायत के कर्मचारियों ने जो मंदिर प्रबंधन में थे उन्होंने हमें वहां रसोई देने से स्पष्ट इनकार कर दिया। हमने भी सोचा शायद मां नर्मदा की यही इच्छा है। तब तक हमारे परिक्रमा वासी दल की सक्रिय सदस्य श्रीमती मधु एवं राम निवास तिवारी गांव जाकर दही ले आए । अब लस्सी बनाई गई और सभी ने लस्सी का आनंद उठाया।

 

         क्रमशः

 

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