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लेखक की कलम से

लेखक की कलम से

मैं कौन हूँ …

मैं मानव ‘योनि’ हूँ एक उम्र गुज़र जाती हैं बस ये जानने में कि मैं कौन हूँ? और क्यों हूँ? तमाम प्रयोग करतीं हूँ और अंत में बस हाथ खड़े कर देती हूँ मैं कौन हूँ? बस ये ही प्रश्न बना रहता है। इस गूढ़ प्रश्न का उत्तर ढूंढने में। …

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अपनों सी दुनिया …

नज्म भ्रम मिथ्या में डूबी, दुनिया रहस्यों में नित्य उलझी दुनिया प्रेम बस मोक्ष द्वार, जहां से पर पाखंड में जकड़ी दुनिया विश्वास फलसफा समझा जग को पर समझ के विपरीत निकली दुनिया पराया बना कर रखा, हमको पर समझाते थे अपनों सी दुनिया क्षणभंगुर जीवन यहाँ सबका पर सत्य …

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चलो सब साथ मिलकर विश्व शांति की कामना करते हाथ उठाएं …

हे ईश्वर हम चोरी, भ्रष्टाचार, दंगे, बलात्कार और धर्मांधता के आदि तो बन चुके हैं। अब रहम करो हर कोई अपने स्वजन खो रहे हैं, कहीं मौत की खबर सुनने के आदि होते रहे-सहे अहसास भी ना खो दें। ये सोचते हुए कि होता है, चलता है, ज़िंदगी है। कहीं …

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संभावनाएं अपार …

दोहागीत मौलिकता हो सृजन में, श्रेष्ठ भाव संचार । सर्वश्रेष्ठ प्राणी मनुज, संभावना अपार ।। मौलिकता अरु सृजन का, है गहरा संबंध। सृजन अर्थ है जन्म का, भरी नवीन सुगंध ।। मौलिक मिट्टी डालकर, चले भेड़ की चाल । बदल जमाने का चलन, ले खुद में सब ढाल ।। औरों …

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नाम हरि का सुमिर मन रे …

भर गया स्वर्णिम किरण से, आज ये आंगन तुहिन से। बाल रवि को साथ लेकर, चमक भर रोशन गगन से। राज रजनी का मिटा है, खुल रहे सारे नयन से। भर गईं अनथक उमंगें। स्फूर्त कर जाएंगी तन ये। हो भी जा आशा निषेचित, नाम हरि का सुमिर मन रे।। …

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हे दुर्गा मां …

अब कुछ ऐसा कर दो मां तन में प्रतिरोध भर दो मां। जग जननी तुम, जग माता हो सब जन की भाग्य विधाता हो। हे ब्रह्मचारिणी तप संबल दो दुष्ट वायरस को भस्म कर दो। मां दुर्गा शेरों वाली ऐसी तेरी ललकार हो। सब जन हो जाएं सुखी बंद यह …

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