
RBI ने तोड़ दिया बड़ा रिकॉर्ड! रुपये को बचाने के लिए 1 साल में बेच डाले 53 अरब डॉलर, आखिर क्यों बढ़ा इतना दबाव?
RBI ने बनाया नया रिकॉर्ड! रुपये को संभालने के लिए एक साल में बेचे 53.13 अरब डॉलर, जानिए क्या है पूरा मामला
भारतीय अर्थव्यवस्था से जुड़ी एक बड़ी खबर सामने आई है। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने वित्त वर्ष 2025-26 में ऐसा रिकॉर्ड बना दिया, जिसने बाजार विशेषज्ञों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। रुपये को लगातार कमजोर होने से बचाने के लिए RBI ने विदेशी मुद्रा बाजार में 53.13 अरब डॉलर की शुद्ध बिक्री की है। यह किसी भी वित्त वर्ष में केंद्रीय बैंक द्वारा की गई अब तक की सबसे बड़ी डॉलर बिक्री मानी जा रही है।
अब सवाल यह है कि आखिर RBI को इतना बड़ा कदम क्यों उठाना पड़ा? क्या भारतीय रुपये पर कोई बड़ा खतरा मंडरा रहा था? और इसका आम लोगों की जेब पर क्या असर पड़ सकता है? आइए विस्तार से समझते हैं।
RBI ने क्यों बेचे इतने ज्यादा डॉलर?
दरअसल, पिछले वित्त वर्ष में भारतीय रुपये पर लगातार दबाव बना रहा। इसके पीछे कई बड़ी वजहें थीं—वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता, विदेशी निवेशकों (FPI) की भारी निकासी, कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में डॉलर की मजबूती।
जब विदेशी निवेशक भारतीय शेयर और बॉन्ड बाजार से पैसा निकालते हैं, तब वे रुपये को डॉलर में बदलते हैं। इससे डॉलर की मांग बढ़ जाती है और रुपया कमजोर होने लगता है। ऐसे हालात में RBI बाजार में डॉलर बेचकर रुपये की कीमत को स्थिर रखने की कोशिश करता है।
वित्त वर्ष 2025-26 में यही स्थिति देखने को मिली, जिसके चलते केंद्रीय बैंक को रिकॉर्ड स्तर पर डॉलर बेचने पड़े।
पिछले साल से कितना ज्यादा रहा हस्तक्षेप?
अगर पिछले आंकड़ों से तुलना करें तो RBI की यह कार्रवाई काफी बड़ी दिखाई देती है। वित्त वर्ष 2024-25 में केंद्रीय बैंक ने 34.51 अरब डॉलर की शुद्ध बिक्री की थी, जबकि इस बार यह आंकड़ा बढ़कर 53.13 अरब डॉलर पहुंच गया।
यानी एक साल में RBI की डॉलर बिक्री में भारी उछाल देखने को मिला। इससे साफ संकेत मिलता है कि रुपये को स्थिर रखने की चुनौती पहले से ज्यादा कठिन हो गई थी।
मार्च में फिर बढ़ी चिंता
RBI के मासिक बुलेटिन के अनुसार मार्च महीने में केंद्रीय बैंक ने 9.76 अरब डॉलर की शुद्ध बिक्री की। यह पूरे वित्त वर्ष में तीसरी सबसे बड़ी मासिक बिकवाली रही।
दिलचस्प बात यह है कि फरवरी में RBI ने 7.41 अरब डॉलर की शुद्ध खरीद की थी। उस दौरान बैंक ने 19.89 अरब डॉलर खरीदे, जबकि 29.64 अरब डॉलर बेचे थे। लेकिन मार्च में हालात बदलते ही RBI फिर डॉलर बेचने की स्थिति में लौट आया।
यह उतार-चढ़ाव बताता है कि बाजार की स्थिति लगातार अस्थिर बनी हुई थी और केंद्रीय बैंक को समय-समय पर रणनीति बदलनी पड़ी।
अक्टूबर और दिसंबर बने सबसे तनाव वाले महीने
पूरे वित्त वर्ष के दौरान RBI ज्यादातर समय डॉलर का शुद्ध विक्रेता बना रहा। सबसे बड़ी मासिक बिक्री अक्टूबर में दर्ज की गई, जब RBI ने 11.88 अरब डॉलर बेचे।
इसके बाद दिसंबर में 10.02 अरब डॉलर की बड़ी बिक्री देखने को मिली। इन महीनों में विदेशी पूंजी निकासी और वैश्विक बाजार में तनाव ने रुपये पर भारी दबाव डाला।
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर RBI यह हस्तक्षेप नहीं करता, तो रुपये में और ज्यादा गिरावट देखने को मिल सकती थी।
आखिर रुपया इतना कमजोर क्यों हुआ?
वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान भारतीय रुपया करीब 9.9 प्रतिशत कमजोर हुआ। यह गिरावट मामूली नहीं मानी जाती।
इसके पीछे कई वजहें रहीं—
1. विदेशी निवेशकों की भारी निकासी
पिछले एक साल में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) ने भारतीय बाजार से बड़ी रकम निकाली। इससे डॉलर की मांग बढ़ी और रुपये पर दबाव आया।
2. कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें
भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा तेल आयात करता है। जब तेल महंगा होता है, तब ज्यादा डॉलर खर्च करने पड़ते हैं। इसका सीधा असर रुपये पर पड़ता है।
3. वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता
अमेरिका सहित कई बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में ब्याज दरों और आर्थिक मंदी की आशंकाओं ने उभरते बाजारों की मुद्राओं पर दबाव बढ़ाया।
4. डॉलर की मजबूती
जब अमेरिकी डॉलर मजबूत होता है, तब दुनिया की कई मुद्राएं कमजोर पड़ती हैं। भारतीय रुपया भी इससे अछूता नहीं रहा।
ट्रेजरी प्रमुख ने क्या कहा?
एक निजी बैंक के ट्रेजरी प्रमुख ने कहा कि पिछले एक साल में विदेशी निवेशकों की भारी निकासी के कारण रुपये पर लगातार दबाव बना रहा। ऐसे में RBI ने अस्थिरता को नियंत्रित करने और बाजार में घबराहट रोकने के लिए सक्रिय भूमिका निभाई।
विशेषज्ञों का मानना है कि RBI का उद्देश्य रुपये की एक निश्चित कीमत तय करना नहीं होता, बल्कि बाजार में अचानक आने वाले बड़े उतार-चढ़ाव को रोकना होता है।
REER में गिरावट का क्या मतलब है?
अप्रैल के अंत तक भारतीय रुपये की रियल इफेक्टिव एक्सचेंज रेट (REER) घटकर 88.06 रह गई, जो मार्च के अंत में 89.23 थी।
सरल भाषा में समझें तो REER यह बताता है कि दूसरे देशों की मुद्राओं और महंगाई के मुकाबले भारतीय रुपया कितना मजबूत या कमजोर है।
अगर REER 100 से ऊपर होता है, तो इसका मतलब रुपया मजबूत माना जाता है। लेकिन बहुत ज्यादा मजबूती निर्यात के लिए नुकसानदेह भी हो सकती है क्योंकि भारतीय सामान विदेशी बाजार में महंगे पड़ने लगते हैं।
मौजूदा गिरावट यह संकेत देती है कि भारतीय मुद्रा प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति बनाए रखने की कोशिश में है।
आम लोगों पर क्या असर पड़ेगा?
RBI की इस रिकॉर्ड डॉलर बिक्री का असर सीधे और परोक्ष रूप से आम जनता पर भी पड़ सकता है।
- विदेश यात्रा महंगी हो सकती है, क्योंकि कमजोर रुपया डॉलर को महंगा बनाता है।
- इलेक्ट्रॉनिक सामान और आयातित वस्तुएं महंगी हो सकती हैं।
- पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है, क्योंकि तेल आयात डॉलर में होता है।
- हालांकि निर्यातकों को फायदा मिल सकता है क्योंकि कमजोर रुपया भारतीय उत्पादों को विदेशी बाजार में सस्ता बनाता है।
क्या आगे भी जारी रहेगा RBI का हस्तक्षेप?
विशेषज्ञ मान रहे हैं कि अगर विदेशी निवेशकों की निकासी जारी रही और वैश्विक दबाव बना रहा, तो RBI आगे भी विदेशी मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप कर सकता है।
हालांकि भारत के पास मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार मौजूद है, इसलिए केंद्रीय बैंक के पास बाजार को स्थिर रखने के पर्याप्त विकल्प हैं।
लेकिन आने वाले महीनों में वैश्विक तेल कीमतें, अमेरिकी ब्याज दरें और विदेशी निवेशकों का रुख तय करेगा कि रुपया कितना मजबूत या कमजोर रहेगा।
निष्कर्ष
RBI द्वारा एक साल में 53.13 अरब डॉलर की रिकॉर्ड बिक्री यह दिखाती है कि भारतीय रुपये को संभालना वित्त वर्ष 2025-26 में कितनी बड़ी चुनौती बन गया था। विदेशी निवेशकों की निकासी, कच्चे तेल की कीमतों और वैश्विक दबाव के बीच केंद्रीय बैंक ने बाजार में स्थिरता बनाए रखने के लिए बड़ा दांव खेला।
अब सबकी नजर इस बात पर है कि आने वाले महीनों में रुपया कितनी मजबूती दिखाता है और क्या RBI को फिर इसी तरह आक्रामक हस्तक्षेप करना पड़ेगा।
















