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… जब फिल्में तवायफों के कोठे के गाने से हिट हुई, चित्रपट के भीगे भाव पर डॉ. विभा सिंह की खास प्रस्तुति …

भारतीय फिल्मों के प्रारम्भिक तीन-चार दशकों में अधिकतर ठुमरियाँ तवायफों के कोठे पर ही फिल्माई गईं। दरबारों से लेकर तवायफ के कोठे तक ठुमरियों का फिल्मांकन हुआ। सिने इतिहास में ऐसी कई फिल्में हैं जिनके मुजरों ने दर्शकों को खूब लुभाया। क्योंकि ये मुजरे विभिन्न संगीत घरानों के शास्त्रीय राग पर आधारित रहे हैं।

फिल्म “अदालत” में नर्गिस के मुजरे “उनको ये शिकायत है कि…” को लोग आज भी गुनगुनाते हैं। इस मुजरे के गीतकार थे राजेन्द्र कृष्ण और संगीत दिया था मदनमोहन ने। लता मंगेश्कर द्वारा गाया यह मुजरा आज भी कानों में रस घोल देता है–फिल्म :’अदालत’ (1958), संगीतकार : मदन मोहन,

गीतकार : राजिन्दर क्रृष्ण,गायिका: लता मंगेशकर,

राग : मालगुंजी

” उन को ये शिकायत है कि हम कुछ नहीं कहते

अपनी तो ये आदत है कि हम कुछ नहीं कहते

मजबूर बहुत करता है ये दिल तो ज़बाँ को

कुछ ऐसी ही हालत है कि हम कुछ नहीं कहते

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कुछ कहने पे तूफ़ान उठा लेती है दुनिया

होंठों को सी चुके तो ज़माने ने ये कहा

ये चुप सी क्यों लगी है अजी कुछ तो बोलिये

खुद दिल से…”

अब न ऐसे नग्में लिखे जाते हैं, न ऐसा संगीत, न ही ऐसी गायकी! लताजी की आवाज़ दिल को छू जाता है। ये वो सुनहरा वक्त था जब सभी शायर एक से बढ़कर एक रचना किया करते थे। राजेंद्र कृष्ण की बेहतरीन रचना और मदन मोहन ने सभी गाने अलग – अलग राग में गवाकर उन्हें अमर कर दिया।

फिल्म ‘देवदास’ (1955) में चंद्रमुखी का मुजरा भी दर्शनीय बन पड़ा था। यह वो देवदास थी, जिसमें वैजयंती माला ने मुजरा किया था और गीत के बोल थे—वो ना आएंगे पलटकर कभी, हम रोए बार-बार। इस मुजरे को गाया था मुबारक बेगम ने। संगीतकार: सचिन देव बर्मन, गीतकार

: साहिर लुधियानवी —

“वो न आएँगे पलट कर

उन्हें लाख हम बुलाएँ

मेरी हसरतों से कह दो

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तेरी बेरुखी से सदके

मेरी ज़िन्दगी की खुशियाँ

तू अगर इसी में खुश है

तू खुशी से कर जफाएँ

वो न आएँगे पलट कर…”

अपने समय की लोकप्रिय जोड़ी दिलीप कुमार और वैजयन्ती माला अभिनीत इस फिल्म का एक और गीत जिसमें अपने दिल की चाहत का इज़हार कर उसको (प्रिय को) रिझाने का सुंदर चित्रण, लताजी की आवाज़ में है। हालांकि ये मुजरा के मूल रूप में न होते हुए भी इसे उस रूप में देखा जा सकता है क्योंकि इस फिल्म में वैजयन्ती माला एक कोठे वाली बनी है और गाने आरंभ भी उसी अदा से करती है।

संगीतकार: सचिन देव बर्मन, और

गीतकार: साहिर लुधयानवी —

“जिसे तू क़ुबूल कर ले, वो अदा कहाँ से लाऊँ

तेरे दिल को जो लुभा ले, वो सदा कहाँ से लाऊँ

मैं वो फूल हूँ के जिसको गया हर कोई मसल के

मेरी उम्र बह गयी है, मेरे आँसुओं में ढल के

+ – + – +

मेरी बेबसी है ज़ाहिर, मेरी आहें बेअसर से

कभी मौत भी जो माँगी, तो ना पाई उसके दर से

जो मुराद ले के आये वो, दुआ कहाँ से लाऊँ

तेरे दिल को जो लुभा ले…”

हालाँकि ‘देवदास’ का ही एक अन्य मुजरा ‘आगे तेरी मर्जी..’ को बॉलीवुड का पहला हिट मुजरा कह सकते हैं। गीतकार: साहिर, संगीतकार एस.डी. बर्मन और स्वर लताजी का–

“दिलदार के क़दमों में

दिलदार के क़दमों में दिल डाल के नज़राना

महफ़िल से उठा और ये कहने लगा दीवाना

क्या?

हो मोरे सैयां हो मोए बलमा

बेदर्दी आगे तेरी मर्ज़ी

+ – + – +

अब आगे तेरी मर्ज़ी…

सीने में मोहब्बत के जज़्बात का तूफाँ है

जीने की भी हसरत है, मरने का भी अरमाँ है

अब आगे तेरी मर्ज़ी…”

वैजयंतीमाला पर ही फिल्माया गया फ़िल्म ‘संघर्ष’ (1968) का मुजरा गीत, आशाजी का गाया, गीतकार शक़ील बदायूनी और संगीतकार नौशाद साहब। इस गीत में सितार के बहुत ख़ूबसूरत पीसेस सुनाई देते हैं, और साथ ही इंटरल्युड संगीत में ग्रूप वायलिन्स का भी प्रयोग हुआ है लेकिन जो बेसिक रीदम जो है वह क़व्वाली शैली का है। इस गीत को सुनते हुए एक अजीब सी थिरकन महसूस होती है और बार बार सुनने का मन होता है —

“तस्वीर-ए-मोहब्बत थी जिसमें हमने वो शीशा तोड़ दिया,

हँस हँस के जीना सीख लिया घुट घुट के मरना छोड़ दिया।

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तक़दीर के ग़म से घबरा कर रुख़ ज़िंदगी का मोड़ दिया,

तस्वीर-ए-मोहब्बत थी जिसमें हमने वो शीशा तोड़ दिया।”

बँगला कथाकार विमल मित्र के उपन्यास पर आधारित फिल्म

‘साहिब बीवी और गुलाम’ (1962) में भी एक मुजरा था जिसके बोल लिखे थे शकील बदायंनू ने और गाया था आशा भौसले ने। राग भैरवी पर आधारित इस मुजरे को हेमंत मुखर्जी ने संगीतबद्ध किया था। परदे पर उस जमाने की चर्चित अदाकारा मीनू मुमताज ने इस मुजरे पर काफी वाहवाही बटोरी थी —

“साक़िया, आज मुझे नींद नहीं आयेगी

सुना है तेरी महफ़िल में रत जगा है

आँखों आँखों में यूँ ही रात गुजर जायेगी

सुना है तेरी महफ़िल में रत जगा है

+ – + – +

किसकी दुनिया यहाँ तबाह नहीं

कौन है जिस के लब पे आह नहीं

हुस्न पर दिल ज़रूर आयेगा, इस के बचने की कोई राह नहीं

ज़िन्दगी आज नज़र मिलते ही लूट जाएगी”

पहले समय के महलों की भव्यता एवं राजा – महाराजा तथा जमीदारों की सभ्यता का द्योतक यह मुजरा है। जिसमें प्रत्येक कलाकार ने अपनी उत्तम कला का प्रदर्शन किया है। इसका चित्रीकरण भी अनुपम है, मुख्य नार्तिका मीनू मुमताज पर प्रकाश है और सारी सहनार्तिका छाया में है। बेहतरीन सिनेमेटोग्राफी, जिसके लिए इस फिल्म को फिल्मफेयर अवार्ड मिला।

राग भैरवी पर ही आधारित एक और मुजरा विमल राय की हिट फिल्म ‘मधुमती’ में भी था। ‘हम हाले दिल सुनाएंगे सुनिए कि न सुनिए’ नाम का यह मुजरा मुबारक बेगम ने गाया था। फिल्म में संगीत दिया था सलिल चौधरी ने और गीतकार थे शैलेंद्र —

“तुम्हारा दिल मेरे दिल के, बराबर हो नहीं सकता

वो शीशा हो नहीं सकता, ये पत्थर हो नहीं सकता

हम हाल-ए-दिल सुनायेंगे, सुनिये कि न सुनिये

+ – + – +

अजब है आह मेरी, नाम दाग है मेरा

तमाम शहर जला दोगे, क्या जला के मुझे

हम हाल-ए-दिल सुनायेंगे…”

फिल्म “कल्पना” (1960) में आशा भोंसले ने भी एक मुजरा गाया और परदे पर पद्मिनी ने यह मुजरा किया था।” बेकसी हद से गुजर जाए, कोई बताए ऐ दिल जिए कि मर जाए” को दर्शक आज भी नहीं भूले हैं–

“बेकसी हद से जब गुज़र जाए

कोई ऐ दिल जिए की मर जाए

बेक़सी हद से जब गुज़र जाए

+ – + – +

गम नहीं मुझपे जो गुज़र जाए

कोई ऐ दिल जिए की मर जाए

बेकसी हद से जब गुज़र जाए.”

इसी तरह “ममता” (1966) फिल्म में सुचित्रा सेन ने जिन मोहक अदाओं से मुजरा अभिनीत किया, वह कमाल का था। इस मुजरे के बोल मजरूह सुल्तानपुरी ने लिखे थे, संगीतकार रौशन और स्वर दिया लता ने —

“रहते थे कभी जिनके दिल में

हम जान से भी प्यारों की तरह

बैठे हैं उन्ही के कूचे में

हम आज गुनहगारों की तरह

+ – + – +

सौ रुप धरे जीने के लिये

बैठे हैं हज़ारों ज़हर पिये

ठोकर ना लगाना हम खुद हैं

गिरती हुई दीवारों की तरह

रहते थे…”

1958 की लोकप्रिय फिल्म “कालापानी” की ठुमरी -“नज़र लागी राजा तोरे बंगले पर….” इस गीत में मजरुह सुल्तानपुरी के लोक- तत्वों से गूँथे शब्द, सचिनदेव बर्मन द्वारा निबद्ध राग “खमाज” के स्वर और ठुमकते हुए ताल दादरा की थिरकन का अनूठा संयोजन है। फिल्म में तवायफ के कोठे पर अभिनेत्री नलिनी जयवन्त पर फिल्माया गया ये मुजरा खूब लोकप्रिय हुआ–

“नज़र लागे राजा तोरे बंगले पर

जो मैं होती राजा बन की कोयलिया

कुहुकु रहती राजा तोरे बंगले पर

+ – + – +

जो मैं होती राजा तेरी दुल्हनिया

मटक रहती राजा तोरे बंगले पर

नज़र लागे राजा तोरे बंगले पर ”

1964 में आई फिल्म ‘जहाँ आरा’ में मीनू मुमताज पर दो मुजरा ‘ वो चुप रहे तो…'(लता), और ‘ जब -जब तुम्हें भुलाया ‘ (लता, आशा) फिल्माया गया है। गीतकार राजेंद्र कृष्ण और सांगीकार मदन मोहन। युग बदल गया,समय बदल गया पर इनका कशिश आज भी बरकरार है!–

“मैं तेरी नज़र का सुरूर हूँ

तुझे याद हो के ना याद हो

तेरे पास रह के भी दूर हूँ

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कई आफ़ताब चमके कई चाँद झगमगाए

मरने की आरज़ू में हम जी रहें हैं ऐसे

जैसे कि लाश अपनी खुद ही कोई उठाए ”

 

और –” वो चुप रहें तो मेरे दिल के दाग़ जलते हैं

जो बात कर लें तो बुझते चिराग जलते हैं

कहो बुझें कि जलें

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खामोशियों से तो दिल और दिमाग जलते हैं

वो चुप रहें तो मेरे दिल के दाग़ जलते हैं॥”

मुंशी प्रेमचंद के उपन्यास ‘गबन’ (1966) फिल्म में मीनू मुमताज पर ही फिल्माया ‘तुम बहुत याद आए..’शैलेंद्र, शंकर ज्यकिशन, लता; अद्भुत रूमानियत भरी एक बेहतरीन सदाबहार नग्मा है। मीनू मुमताज की अदायगी, खूबसूरत भाव – भंगिमा इसे और भी दिलकश बनाता है —

“मैं हर रात जागी कि इस बार शायद

मोहब्बत तुम्हें इस तरफ़ खींच लाए

तुम्हारी क़सम तुम बहुत याद आए

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ज़रा एक नज़र इस तरफ़ अब तो देखो

ज़माना हुआ है हमें मुस्कुराए

तुम्हारी क़सम तुम बहुत याद आए”

अजन्ता आर्ट के बैनर तले बनी

‘मुझे जीने दो'(1963) फिल्म में वहीदा रहमान की नृत्य – भंगिमा, सुनील दत्त की आंखें, असीमित प्रतिभाशाली अमर गीतों के रचयिता जयदेव के बोल, पूरी ऑर्केस्ट्रा का टीम वर्क — तबला, ट्रम्पेट, सारंगी, हारमोनियम ; सचिनदेव बर्मन का आत्मा को छू लेने वाला संगीत! सब मिलकर अद्भुत दृश्य उपस्थित कर देता है इस मुजरा में —

“रात भी है कुछ भीगी-भीगी

चाँद भी है कुछ मद्धम-मद्धम

तुम आओ तो आँखें खोलें

सोई हुई पायल की छम छम

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तुझको पाने की कोशिश में

दोनों जहाँ से खो गए हम

छम-छम, छम-छम, छम-छम, छम-छम, रात …”

‘अमर प्रेम ‘1972 में प्रदर्शित,

आर॰ डी॰ बर्मन द्वारा संगीतबद्ध, गीतकार आनद बक्शी और लता मंगेशकर द्वारा गाए ‘रैना बीती जाए…’ अन्य मुजरा गीतों से भिन्न दृश्य उपस्थित करता है। समाज के द्वारा बहिष्कृत गाँव के ही एक व्यक्ति द्वारा कलकत्ता के एक कोठे पर बेच दी गई खामोश स्त्री की भूमिका में शर्मिला टैगोर का बिलकुल थिर चेहरा और मन में उठती-गिरती भावनाओं को अपनी गहरी काली आँखों, तिरछी होती भौंहों, और कँपकँपाते होंठों से गाया गया।

“रैना बीती जाये, श्याम न आये

निंदिया न आये, निंदिया न आये

शाम को भूला, श्याम का वादा

संग दीये के, जागे राधा

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किस बैरन से लागी नज़रिया

निंदिया न आये, निंदिया न आये

रैना बीती जाये..”

बेहतरीन शब्द लेखन और संगीत संरचना का अद्भुत संयोजन! एक स्त्री के मन पर पड़ने वाले प्रभाव, पल-पल बदलते अहसास और विचलित कर देने वाले दुःख की अभिव्यक्ति है।

बॉलीवुड की गिनी चुनी फिल्मों में से एक 4 फरवरी 1972 को रिलीज ‘पाकीजा’ एक तवायफ की मार्मिक कहानी है, जिसे मीना कुमारी ने अपने अभिनय से जीवंत बना दिया है। यह फिल्म अपने गीतों के लिए आज भी याद की जाती है, जिनका संगीत गु़लाम मोहम्मद ने दिया था और उनकी मृत्यु के पश्चात फिल्म का पार्श्व संगीत नौशाद ने तैयार किया। फिल्म का शायराना अंदाज, दिल को छू लेने वाले संवाद और मदहोश कर देने वाला संगीत हमें उस दौर में जाता है, जब यह फिल्माई गई थी —

“इन्हीं लोगों ने, इन्हीं लोगों ने

इन्हीं लोगों ने ले लीना दुपट्टा मेरा

हमरी न मानो बजजवा से पूछो

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जिसने बजरिया में छीना दुपट्टा मेरा

दुपट्टा मेरा, दुपट्टा मेरा

इन्हीं लोगों ने, इन्हीं लोगों ने

इन्हीं लोगों ने ले लीना दुपट्टा मेरा”

मजरूह सुल्तानपुरी के बोल, लता की गायकी, राग कल्याण, संगीत गुलाम मोहम्मद और कमाल अमरोही के निर्देशन ने कोठा संस्कृति को सजीव कर दिया है। इस मुजरा की खासियत यह है कि मीना कुमारी के फिल्माए गए दृश्यों के पीछे भी कोठों पर कई मुजरे चल रहे हैं।

इसी फिल्म का दूसरा मुजरा —

“चाँदनी रात बड़ी देर के बाद आई है

ये मुलाक़ात बड़ी देर के बाद आई है

आज की रात वो आए हैं बड़ी देर के बाद

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मैं तो चुपके से

अजी हौले से खोलूँगी द्वार रे

ठाड़े रहियो…”

और यह तीसरा मुजरा मीना कुमारी के भाव पूर्णअभिनय, लता के स्वर राग कैफ भोपाली में, संगीत गुलाम मोहमद का — “आज हम अपनी दुआओं का असर देखेंगे

तीर-ए-नज़र देखेंगे, ज़ख्म-ए-जिगर देखेंगे

आप तो आँख मिलाते हुए शरमाते हैं,

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शमा हो जयेगी जल जल के धुंआ आज की रात

आज की रात बचेंगे तो सहर देखेंगे

तीर-ए-नज़र देखेंगे, ज़ख्म-ए-जिगर देखेंगे”

भारतीय फि़ल्म संगीत के इतिहास में नर्तकियों, तवायफ़ों एवं गणिकाओं को लेकर बनी फि़ल्मों के लिए जितना सफल और प्रयोगधर्मी संगीत रचा गया है, उसमें,पाकीज़ा, उमराव जान का वशिष्ट स्थान है। मिर्जा हादी रुसवा के उपन्यास ‘उमराव जान अदा ‘ पर आधारित 19वीं सदी की कहानी जिसमें एक किशोरी को वेश्यागृह में बेच दिया जाता है। वह प्रसिद्ध गणिका और कवियत्री उमराव जान कहलाती है। मुज्जफर अली का निर्देशन और खय्याम का संगीत से “उमराव जान” में रेखा के मुजरों ने समाँ बाँध दिया था। “ये क्या जगह है दोस्तों”, “इन आंखों की मस्ती के” और “दिल चीज क्या है” मील का पत्थर माने जाते हैं। “मुकद्दर का सिकंदर” का “सलामे इश्क मेरी जान” भी रेखा पर फिल्माया गया था।

इनके अतिरिक्त फिल्मी मुजरों की लम्बी फेहरिस्त है। अनारकली का (जब प्यार किया तो डरना क्या)’ मैं तुलसी तेरे आंगन की (सैंया रूठ गए मैं मानती रही, शोभा गुर्टू द्वारा गाया गया), खिलौना, शराफत, तवायफ आदि न जाने कितनी फिल्म है। पुरानी फिल्मों के रीमेक में ‘देवदास’ में माधुरी का ‘मार डाला…’, उमराव जान में ऐश्वर्या का। मंगल पांडे में रानी मुखर्जी, एजेंट विनोद में करीना कपूर, रज्जो में कंगना रानौत आदि पर फिल्माए हुए मुजरे आजकल अपनी जगह बनाए हुए हैं।

अंत में नारी जीवन के कटु सत्य को लेकर शायर गीतकार साहिर लुधियानवी का लिखा फिल्म ‘साधना ‘(1958) का यह गीत जो मुजरा रूप में भले ही फिल्म में प्रस्तुत नहीं किया गया है परंतु सामाजिक विडंबना का चित्रण अपने इस गीत में तल्ख़ शब्दों में व्यक्त किया है। संगीतकार एन दत्ता, स्वर लताजी का —

“औरत ने जनम दिया मर्दों को मर्दों ने उसे बाज़ार दिया

जब जी चाहा मसला कुचला जब जी चाहा धुत्कार दिया

तुलती है कहीं दीनारों में बिकती है कहीं बाज़ारों में

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अवतार पयम्बर जन्नती है फिर भी शैतान की बेटी है

ये वो बद-क़िस्मत माँ है जो बेटों की सेज पे लेटी है

औरत ने जनम दिया मर्दों को मर्दों ने उसे बाज़ार दिया”

“रात भी है कुछ भीगी – भीगी,राम करे कहीं नैना न उलझे, ठाडे रहियो ओ बांके यार री व चलते – चलते यूं ही कोई मिल गया था… इन गीतों को जिन्होंने भी सुना होगा, वे इस बात से अवश्य सहमत होंगे कि फिल्म संगीत के वितान से थोड़ा अलग हटकर बैठकी एवं खड़ी महफिलों में गायी जाने वाली ठुमरी और दादरों की तरह की अदायगी का लता मंगेशकर ने इन मुजरा गीतों में पुनर्वास किया है। इन फिल्मों के मुजरा – गीत तो बरबस रसूलनबाई, बड़ी मोतीबाई, विद्याधारी बाई एवं सिद्धेश्वरी देवी के दादरों एवं बोल – बनाव की ठुमरियों की याद दिलाते हैं। इन्हें सुनते हुए लगता ही नहीं कि फिल्म के संगीतकारों ने कोई कम स्तर की चीज़ दर्शकों और श्रोताओं के लिए परोसी है। वह उतनी ही गरिमामय और शास्त्रीयता से प्रेरित लगती है।” (यतींद्र मिश्र, लता सुर – गाथा)

 कहा जा सकता है कि रुपहले पर्दे की कोई भी अभिनेत्री तब तक पूर्ण नहीं मानी जाती जब तक वह किसी फिल्म में तवायफ का किरदार न निभा ले। कुछ अपवादों को छोड़ दें तो हर अभिनेत्री ने किसी न किसी फिल्म में तवायफ की भूमिका की है।

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