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अनकहे अल्फाज ….

कुछ अनकहे अल्फाज
रह गए,
दिल के पन्नों पर!
जो अब स्मृतिपटल तक भी
उभरते नहीं शायद,
बहुत तेज दृष्टि डालने पर
ज्ञात होता
“कुछ अनकहे अल्फाज” लिखे हैं!
स्पष्ट दृष्टिगोचर नहीं होते!
जिन्हें समय से कह दिया होता,
तो जीवन-पलक कुछ
तो बदला होता शायद!
ये अल्फाज
“अधूरी चिट्ठियों”से जान पड़ते हैं!
जिन्हें पूरा करने का वक्त
ना मिला शायद!
यादों की गगरी में उफनती घटनाएं,
बहते झरनों सदृश्य
व्यक्तित्व को सराबोर कर देती!
भावों से अपूर्ण,
सपनों से अनजान,
खुशियों से आतुर करती!
अतीत में जाकर त्रुटि सुधारने
को मन तत्पर!
पर बीता समय कहां लौटता?
यौवन की मासूमियत
अज्ञात होती है जीवनानुभूतियों से!
कुछ अनकहे अल्फाज,
कुछ अधूरी सी आश,
रहस्य ही रह गए जीवन की!
एहसास किया क्या तुमने…..

 

©अल्पना सिंह, शिक्षिका, कोलकाता                            

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