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आज भीमसेनी एकादशी जिसे निर्जला व्रत कर रखा जाता है …

आज हम सब निर्जला एकादशी मना रहें हैं। यह हर वर्ष ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को पड़ती हैं। निर्जला एकादशी सभी एकादशियों में सबसे कठिन माना जाता हैं। यह एकादशी सब एकादशियों में सबसे अधिक महत्व रखती हैं। इस एकादशी व्रत को भीमसेनी एकादशी भी कहते हैं। निर्जला एकादशी के दिन बिना जल ग्रहण किए पूरे दिन व्रत रखा जाता हैं और पूजा मुहूर्त में भगवान विष्णु की विधि विधान से आराधना की जाती हैं। भगवान विष्णु की कृपा से समस्त पापों का नाश होता हैं। व्यक्ति को वर्ष भर की सभी एकादशी के फल का पुण्य लाभ होता हैं। मृत्यु के बाद विष्णु लोक में स्थान प्राप्त होता हैं। हमारे हिन्दू धर्म में यही मान्यता हैं।

निर्जला एकादशी का पौराणिक महत्व और आख्यान आज भी कम रोचक नहीं हैं। जब सर्वज्ञ वेदव्यास ने पांडवों को चारों पुरुषार्थ- धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष देने वाले एकादशी व्रत का संकल्प कराया तो महाबली भीम ने निवेदन किया- पितामह! आपने तो प्रति पक्ष एक दिन के उपवास की बात कही हैं। मैं तो एक दिन क्या एक समय भी भोजन के बगैर नहीं रह सकता- मेरे पेट में ‘वृक’ नाम की जो अग्नि हैं, उसे शांत रखने के लिए मुझे कई लोगों के बराबर और कई बार भोजन करना पड़ता हैं, तो क्या अपनी उस भूख के कारण मैं एकादशी जैसे पुण्यव्रत से वंचित रह जाऊँगा?

पितामह ने भीम की समस्या का निदान करते और उनका मनोबल बढ़ाते हुए कहा- नहीं कुंतीनंदन, धर्म की यही तो विशेषता हैं कि वह सबको धारण ही नहीं करता, सबके योग्य साधन व्रत-नियमों की बड़ी सहज और लचीली व्यवस्था भी उपलब्ध करवाता है। अतः आप ज्येष्ठ मास की शुक्ल पक्ष की निर्जला नाम की एक ही एकादशी का व्रत करो और तुम्हें वर्ष की समस्त एकादशियों का फल प्राप्त होगा। निःसंदेह तुम इस लोक में सुख, यश और प्राप्तव्य प्राप्त कर मोक्ष लाभ प्राप्त करोगे।

इतने आश्वासन पर तो वृकोदर भीमसेन भी इस एकादशी का विधिवत व्रत करने को सहमत हो गए। इसलिए वर्ष भर की एकादशियों का पुण्य लाभ देने वाली इस श्रेष्ठ निर्जला एकादशी को लोक में पांडव एकादशी या भीमसेनी एकादशी भी कहा जाता है। इस दिन जो स्वयं निर्जल रहकर ब्राह्मण या जरूरतमंद व्यक्ति को शुद्ध पानी से भरा घड़ा इस मंत्र के साथ दान करता हैं तो उसे इस दान-पुण्य का कई गुना फल प्राप्त होता है और पेयजल के संरक्षण, संवर्द्धन एवं सदुपयोग का संदेश भी।

कुछ मान्यताएं व परम्पराएं आज भी चली आ रही हैं। उसी का रूप हम आज भी घरों में देखते हैं। जय भारत, जय हिन्दू धर्म। जय निर्जला एकादशी। अंत में सभी को एक बार फिर से मेरी और से शुभकामनाएं।

 

©डॉ मंजु सैनी, गाज़ियाबाद                                             

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