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पराली जलाने से रोकने के लिए 22.49 अरब रुपये गए पानी में, नहीं बुझी खेतों की आग ….

नई दिल्ली । किसानों को कटाई के बाद खेत साफ करने के लिए आग लगाने से रोकने के लिए सरकार ने एक योजना बनाई थी। इस योजना पर 22.49 अरब रुपये खर्च हुए लेकिन आग नहीं बुझी। पिछले चार साल में कई अरब रुपये खर्च करने के बावजूद भारत में खेतों में फसल कटाई के बाद लगाई जाने वाली आग से होते प्रदूषण को कम नहीं किया जा सकता है। वायु की गुणवत्ता की निगरानी करने वाली एजेंसी सफर के मुताबिक पंजाब और हरियाणा के खेतों में लगाई जाने वाली आग अक्टूबर और नवंबर में 30-40 प्रतिशत वायु प्रदूषण के लिए जिम्मेदार है। 2018 में भारत सरकार ने इस समस्या से निपटने का बीड़ा पूरे जोर शोर से उठाया था। किसानों को धान के भूसे से निपटने के लिए मदद करने के वास्ते एक फंड स्थापित किया गया था। चार साल में इस फंड में 22.49 अरब रुपये खर्च किए जा चुके हैं लेकिन किसानों को आग लगाने से रोककर हवा की गुणवत्ता में सुधार की कोशिश कामयाब नहीं हो पाई है।

सफर के आंकड़े बताते हैं कि इस महीने भी दिल्ली की हवा ‘बहुत खराब’ रही। दिल्ली से 117 किलोमीटर दूर करनाल जिले में 12 गांवों के दर्जनों किसानों ने बताया कि इस योजना में कई खामियां हैं जिन्हें अधिकारी दूर नहीं कर पाए हैं। किसानों का कहना है कि भूसा हटाने के लिए जो मशीन सुझाई गई है उसकी कीमत इतनी ज्यादा है कि वे ना उसे खरीद पा रहे हैं ना किराये पर ले पा रहे हैं। एक किसान किशन लाल ने बताया, “कागजों पर तो सब्सिडी की यह योजना अच्छी लगती है लेकिन व्यवहारिक समस्याओं के लिए कुछ नहीं करती। सब्सिडी के बावजूद ये मशीनें हमारी जेब की पहुंच से बाहर हैं.” इस बारे में सरकार ने कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया तो नहीं दी लेकिन नाम न छापने की शर्त पर दो अधिकारियों ने माना कि योजना का असर नहीं हुआ है और अभी इसे कारगर बनने में कुछ वक्त लगेगा। क्या है योजना? किसानों को आग लगाकर फसल का बचा हुआ हिस्सा जलाने से रोकने के लिए यह योजना शुरू की गई थी। इस योजना के तहत किसानों को फसल के बचे हुए हिस्से की कटाई और सफाई के लिए एक मशीन खरीदने के वास्ते सब्सिडी दी जाती है। एक किसान को 50 प्रतिशत तक सब्सिडी मिलती है जबकि किसानों के सहकारी समूह को 80 प्रतिशत तक सब्सिडी का प्रावधान है।

यह सब्सिडी तो केंद्र सरकार से मिलती है। इसके अलावा पंजाब सरकार भी फसल के बचे हुए हिस्से के प्रबंधन पर 10.45 अरब रुपये खर्च चुकी है। किसानों का कहना है कि मशीन के तीन हिस्से हैं जिनकी कीमत ढाई से तीन लाख रुपये है। साथ ही कम से कम तीन ट्रैक्टर और दो ट्रॉली भी खरीदनी पड़ती हैं। सब्सिडी में ट्रैक्टर ट्रॉली की कीमत शामिल नहीं है, जबकि इसकी कीमत साढ़े आठ लाख रुपये तक आती है। क्यों नाकाम हुई योजना? किसानों को पहले सारी कीमत खुद देनी पड़ती है तब वे सब्सिडी के लिए दावा करत सकते हैं। किसान जगदीश सिंह बताते हैं कि सब्सिडी की रकम वापस मिलने में दस महीने तक लग जाते हैं। इतना ही नहीं, सब्सिडी उन्हीं किसानों को मिलती है जो सरकार द्वारा बताई गईं दुकानों से सामान खरीदेंगे जबकि किसानों का दावा है कि ये दुकानें मशीनों को ज्यादा दाम पर बेचती हैं.

पिछले महीने रायपुर जट्टां, शाहजहांपुर और गगसीना गावों के किसानों ने मिलकर मशीनें खरीदने की योजना बनाई लेकिन उन्हें पता चला कि तीन गावों की नौ हजार एकड़ जमीन के लिए ये काफी नहीं थीं। किसान राकेश सिंह बताते हैं, “ये मशीनें 20 दिन में 200-300 एकड़ मुश्किल से पूरा कर पाती हैं। तीन गांवों की बात तो आप भूल ही जाएं, यह मशीन एक के लिए भी काफी नहीं थी। हमें गेहूं की बुआई करनी होती है तो इतना वक्त नहीं होता.” धान की कटाई के बाद किसानों के पास गेहूं की बुआई से पहले 20-25 दिन ही होते हैं। अगर वे देर से बुआई करेंगे तो फसल कम होगी। लिहाजा, मशीन पर निर्भर रहने के बजाय वे जलाने को प्राथमिकता दे रहे हैं।

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