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बल है तो जल है, जल है तो कल है: भाग 3

अमित जोगी

रिहंद : सूखता सरगुज़ा

अपनी पिछली दो कॉलमों में मैंने बस्तर और छत्तीसगढ़ की मैदानी इलाक़ों की नदियों- इंद्रावती और महानदी और उनकी सहायक नदियों- के बारे में लिखा था। आज मैं सरगुज़ा की जीवनदायिनी रिहंद और उसकी सहायक नदियों की समीक्षा करके अपनी ‘बल है तो जल है, जल है तो कल है’ शृंखला को समाप्त करूँगा।

नदारद नदी ?

बस्तर और मैदानी इलाक़ों से कहीं ज़्यादा चिंताजनक सरगुज़ा की जल स्थिति है लेकिन जहाँ इंद्रावती और महानदी, छत्तीसगढ़ के पड़ोसी राज्यों ओड़िसा, तेलेंगाना और आँध्र प्रदेश के सत्ताधारी क्षेत्रीय दलों की राजनीति के कारण ही सही, भारत के राष्ट्रीय संवाद का हिस्सा बन चुके हैं, वहीं रिहंद पर न तो सरकार, न नेता, न राजनीतिक दल, न नागरिक-समाज और न ही बुद्धिजीवी वर्ग कुछ बोलते हैं। पिछले आठ सालों से इस नदी का छत्तीसगढ़ विधान सभा की कार्यवाही में (2016 में मेरे द्वारा कनहर नदी पर उठाए एक प्रश्न को छोड़) एक बार भी ज़िक्र तक नहीं हुआ है मानो ये नदी- और इस पर निर्भर सरगुज़ा के लाखों लोग- छत्तीसगढ़ के मानचित्र से ग़ायब हो गए हों। इस चुप्पी के दो ही कारण समझ में आते हैं: विषय से अनभिज्ञता और इच्छा-शक्ति का अभाव।

मैनपाट पठार के दक्षिण-पश्चिम में मतिरंगा पर्वत से निकलकर सरगुजा के बीचोंबीच दक्षिण से उत्तर की ओर 160 किलोमीटर की दूरी तय करते हुए रिहंद नदी उत्तरप्रदेश में जाकर सोन नदी से मिल जाती है। सरगुजा में महान, मोराना (मोरनी), गेदर, गागर, गोबरी, पीपरकछार, रमदिया और गलफुल्ला रिहंद की प्रमुख सहायक नदियां है।

जैसे छत्तीसगढ़ और उड़िसा के बार्डर में संबलपुर में महानदी पर दुनिया का सबसे बड़ा कच्चा बांध हीराकुंड 1953 में बना था, ठीक वैसे ही छत्तीसगढ और उत्तरप्रदेश के बार्डर में पिपरी में रिहन्द नदी पर हिन्दुस्तान के सबसे बड़े मानव निर्मित जलाशय गोविंद वल्लभ पंत सागर बांध का 1962 में निर्माण किया गया था। 1953 के हीराकुंड और 1962 के रिहंद बांधों में तीन-तीन दुखद समानता देखने को मिलती है।

  • (1) दोनों के निर्माण में छत्तीसगढ़ की ही जमीन डूबी थी
  • (2) दोनों में 85% पानी छत्तीसगढ़ से जाता है और
  • (3) दोनों का रत्ती भर लाभ- न सिंचाई, न बिजली- छत्तीसगढ़ को नहीं मिल रहा है।

उत्तरप्रदेश में रिहंद की सहायक नदी कनहेर पर वर्तमान में एक बांध निर्माणाधीन है जिससे बलरामपुर का सनावल इलाक़ा डूब जाएगा। रमन सिंह 2011 में इसकी मंज़ूरी दे चुके हैं और आज तक छत्तीसगढ़ सरकार ने इस पर अपना विरोध दर्ज नहीं किया है।

सिंचाई विभाग के अनुसार सरगुजा में फसल भूमि का कुल रकबा 211.449 हजार हेक्टेयर है- जिसमें से 84 छोटे-बड़े बांधों के माध्यम से मात्र 12.4% (25.948 हजार हेक्टेयर) क्षेत्र ही सिंचित है। यह प्रदेश के औसत 36% सिंचित क्षेत्र का एक-तिहाई भी नहीं है।

मेरा कुआँ चोरी हो गया …..

पत्रिका के संवाददाता आशीष गुप्ता ने इन सरकारी सरकारी आंकड़ो को अपनी चौंकाने वाली ग्राउंड रिपोर्ट से चुनौती दी है। उनकी रिपोर्ट के अनुसार-

जमीनी हकीकत बिल्कुल ही अलग है, भीषण गर्मी में न केवल बांध सूख चुके हैं बल्कि कैनाल का कहीं अता-पता ही नहीं है। कुछ गांवों में विभाग द्वारा कैनाल भी बनाया गया था तो विभाग के लापरवाही की वजह से उसे ग्रामीणों द्वारा बंद कर दिया गया है। ग्राम पंचायत मुड़ेसा, लब्जी, असोला, बांकीपुर सहित अन्य ग्राम पंचायतों के लोगों ने बताया कि जब से बांध का निर्माण हुआ है, विभाग के अधिकारी कभी भी गांव आए ही नहीं है। सिंचाई के लिए बांध से आज तक पानी मिला ही नहीं है। ऐसे में मानसून के भरोसे ही फिर से किसानों को खरीफ की खेती करनी होगी।

क्षमता के अनुरूप नहीं हो पा रहा उपयोग

सिंचाई विभाग के अधिकारी इस बात को स्वयं ही स्वीकार कर रहे हैं कि अब तक बांधों का उपयोग उनके क्षमता के अनुरूप नहीं कर पाए हैं। अधिकारियों के अनुसार जिले में लघु सिचाई योजना के तहत बने बांधों का महज 40 से 50 प्रतिशत तक ही उपयोग किया जा रहा है। ग्रामीणों के अनुसार बांधों से महज 25 से 30 प्रतिशत ही पानी मिल पा रहा है। कुछ गांवों में तो इसका प्रतिशत अब तक शून्य ही है। विभाग द्वारा अब कैनाल मरम्मत की बात की जा रही है। इससे लोगों को तो फायदा मिलने की उम्मीद नहीं है।

जल कर का नहीं हो रहा कलेक्शन

विभाग द्वारा जो सिंचित क्षेत्र आंकड़ों में दिखाया जा रहा है। उसके अनुसार जल कर के रूप में विभाग को लाखों रुपए का फायदा होना चाहिए लेकिन ग्रामीणों के अनुसार सिंचाई विभाग द्वारा आज तक पानी ही नहीं दिया गया तो जलकर किस आधार पर वसूला जाएगा। इस संबंध में विभाग के आला अधिकारियों का कहना है कि जितना पानी सिंचाई के लिए दिया जाता है, उसका जल कर वसूला जाता है। सिंचित क्षेत्र का आकड़ा तो विभाग के पास है, लेकिन कितने किलोमीटर कैनाल का निर्माण गांवों में किया गया है। इसका कोई आंकड़ा उनके पास नहीं है। विभाग द्वारा जो लक्ष्य कर्मचारियों को दिया जाता है, उसका ब्यौरा नहीं लिए जाने से यह समस्या आज बनी हुई है। जिला प्रशासन द्वारा पानी किसानी बर यात्रा से कुछ क्षेत्रों को फायदा जरूर पहुंचा है।

15 वर्ष से नहीं मिला पानी

मुड़ेसा निवासी अजय कश्यप ने कहा कि ग्राम पंचायत मुडेसा में वर्ष 1976 में बांध का निर्माण कराया गया था, लेकिन गांव वाले आज तक यह नहीं जान पाए कि विभाग से यहां कौन पदस्थ है। पिछले 15 वर्षों से सिंचाई के लिए पानी नहीं दिया गया है…”।

मतलब सरगुज़ा में काग़ज़ों में संचालित अरबों की सिंचाई योजनाएँ भ्रष्टाचार की आहुति चढ़ चुके हैं और कोई चूं से चाँ नहीं कर रहा है। पूरे विश्व में कुआँ की चोरी का एकमात्र प्रकरण बलरामपुर ज़िले में दर्ज है ! शायद यही कारण है कि छत्तीसगढ़ में राजनांदगांव के बाद सबसे ज़्यादा किसानों की आत्महत्या के प्रकरण सरगुज़ा में दर्ज होते हैं। 2015 में मुझे 5 साल के एक आदिवासी बच्चे की भूख से मृत्यु के विरोध में 5 दिन अनशन पर बैठना पड़ा था। सबसे दुःख की बात तो यह है कि उसका गाँव नर्मदापुर रिहंद के उद्गम की बिलकुल नज़दीक है।

बहुत लोगों का मानना है कि यहाँ के कुछ बेहद प्रभावशाली लोग नहीं चाहते हैं कि ‘सरगुज़ा रियासत’ के लोग अपने पाँवों पर खड़े हो सकें। शायद अच्छी-नियत से ही सही, वे आज भी सरगुज़ा के ‘माई-बाप’  बने रहना चाहते हैं। मुख्यमंत्री रहते समय मेरे पिता जी ने इस मानसिकता को चुनौती दी थी किंतु वे इसमें सफल नहीं हो पाए। उन्होंने 2002 में राजनांदगाँव के कबीरधाम, दुर्ग के बालोद और सरगुजा के प्रतापपुर में शक्कर कारखानों का निर्माण किया था ताकि यहां के कृषकों की धान पर निर्भरता कम करके शक्कर जैसी नकदी-फसल (कैश क्रॉप) लगवाकर उनकी आमदानी बढ़ाई जा सके। जहां कबीरधाम और बालोद में शक्कर कारखाने बेहद कारगार सिद्ध हुए हैं, वहीं सिंचाई के अभाव के कारण सरगुजा में अपेक्षित परिणाम नहीं मिल पाया है। उन्होंने बड़ी जद्दो-जहद के बाद 2001-02 में दुर्ग से अम्बिकापुर पैसेंजर ट्रेन शुरू करवाई थी और सूरजपुर में IFFCO के हज़ारों करोड़ के प्लांट की नींव भी रखी थी। इतिहास में पहली बार सरगुज़ा के नागरिकों को रेल मार्ग से जोड़ा गया था और एक बड़े उद्योग की शुरुआत की गई थी ताकि यहाँ के युवाओं को रोज़गार और व्यापारियों को काम मिल सके। 18 सालों से IFFCO ठंडे बस्ते में है और सरगुज़ा संभाग में आज तक एक भी नया उद्योग नहीं लग पाया है।

स्वराज का सपना

इंद्रावती, महानदी और रिहंद छत्तीसगढ़ की नदियाँ हैं। तीनों का लाभ दूसरे राज्य ले रहे हैं। आँध्रप्रदेश के लिए पोलावरम बाँध बनेगा और छत्तीसगढ़ के कोंटा और सुकमा के लोग जल समाधि ले लेंगे, यह अब संभव नहीं है। उत्तर प्रदेश में कन्हर नदी में बांध बन जायेगा और सनावल के लोग जल समाधि ले लेंगे, यह भी संभव नहीं है। महानदी का सारा पानी का उपयोग उड़ीसा करेगा और छत्तीसगढ़ के किसान लगातार अकाल की मार झेलते रहेंगे, ये भी अब संभव नहीं है। इन सभी मुद्दों पर राष्ट्रीय पार्टियों ने मौन धारण किया हुआ है। आख़िर क्यों? जवाब स्पष्ट है कि अगर एक तरफ़ ओडिशा, आंध्र प्रदेश, तेलेंगाना और उत्तर प्रदेश और दूसरी तरफ़ छत्तीसगढ़ के बीच चुनाव करना है, तो दूसरे राज्यों को ही महत्व दिया जाएगा और छत्तीसगढ़ के हितों को कुचला जायेगा। ऐसे में हम मौन धारण करके नई बैठेंगे। समस्या की जो जड़ है, वहाँ तक हम को पहुँचना पड़ेगा। अगर कांग्रेस और भाजपा के नेता वास्तव में छत्तीसगढ़ का हित चाहते हैं, तो उन्हें अपने ही पार्टी के दिल्ली के नेताओं के सामने प्रदेश वासियों की आवाज़ बुलंद करनी होगी। लेकिन उनमे यह हिम्मत नहीं है।

भारत में जम्मू कश्मीर के यूनियन टेरिटरी बनने के पहले 29 राज्य थे। कोई तो कारण होगा कि उनमें से 26 राज्यों में क्षेत्रीय पार्टियां अपनी सरकार बना चुकी हैं। केवल मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ ही अपवाद हैं। यह अपवाद ज़्यादा दिनों तक नहीं रहेगा। छत्तीसगढ़ में अब लोग जाग रहे हैं। मात्र दो महीने में हमारी पार्टी को अगर 14% वोट मिला है, हमारे सात विधायक आज विधानसभा में बैठे हैं, तो स्पष्ट रूप से दिख रहा कि छत्तीसगढ़ की जनता अपनी क्षेत्रीयता को अहमियत देने लगी है।

पनई नहीं पानी

मुख्यमंत्री भूपेश बघेल का जो सौंठे मरवाने, गेड़ी चढ़ने और खुमरी-पनई पहनने का क्षेत्रीयवाद है, ये मात्र दिखावे का क्षेत्रीयवाद है। अपनी कॉलम के ज़रिए मैंने यह दिखाने की कोशिश की है कि आर्थिक-असमानता, शराब-बिक्री और नदी-बँटवारे जैसे छत्तीसगढ़ के अस्तित्व से जुड़े मुद्दों पर छत्तीसगढ़ की दोनों राष्ट्रीय पार्टियाँ दिल्ली के निर्देशन पर चलती हैं। आज भी भूपेश बघेल जी को अगर कोई फ़ैसला लेना होता है, तो उन्हें दिल्ली जाना पड़ता है। अगर रमन सिंह को कोई फ़ैसला लेना होता है, तो उनको भी दिल्ली जाना पड़ता है। लेकिन अजीत जोगी जी की छत्तीसगढ़ में एकमात्र ऐसी पार्टी है जिसको फ़ैसला लेने दिल्ली नहीं जाना पड़ता है। हमारी पार्टी का आलाकमान दिल्ली के नेता नहीं बल्कि छत्तीसगढ़ की जनता है और उनके लिए हर हद तक लड़ाई लड़ने के लिए हम तैयार हैं।

जय छत्तीसगढ़ !

इंतज़ार करिए, सोमवार, 2 मार्च 2020 तक। : {भाग 4}

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