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नर्मदा तट के आश्रम और साधु जनों का प्रेमभाव से पूरा होती है परिक्रमा …

नर्मदा परिक्रमा भाग- 7

 

अक्षय नामदेव। सुबह साथी परिक्रमावासियों के जल्दी उठ आपस में बातचीत से जल्दी नींद खुल गई। आंखें खोल बिस्तर छोड़ कर आश्रम से बाहर निकलकर देखा तो बाहर का नजारा कुछ और था। आश्रम को चारों ओर से घेरे पेड़ों पर चिड़ियों का कलरव गान चल रहा था। सामने ही नर्मदा बह रही है। उत्तर दिशा से नर्मदा नदी को छूकर आने वाली ठंडी हवा ऐसे कपकंपा आ रही थी जैसे वह हवा नदी में नहा कर आ रही हो। आश्रम के कार्यकर्ता आश्रम की गायों के लिए चारा भूसा मिलाकर सानी बना रहे थे। रात को जब हम यहां पहुंचे थे तब अंधेरे में पता नहीं चला कि यह आश्रम मां नर्मदा नदी के तट पर इतनी सुंदरता लिये हुए हैं। नर्मदे हर के जयघोष के साथ आश्रम के कार्यकर्ता से सुबह का अभिवादन हुआ। उन्होंने आग्रह पूर्वक कहा-भैया नीचे नर्मदा में जाकर स्नान कर लीजिए। मैंने कहा,जी।

दैनिक क्रिया से निवृत्त होने के बाद मैं निरुपमा एवं बेटी मैंकला को लेकर आश्रम से नीचे उतर कर नदी के तट की ओर चले गए। आश्रम से नीचे नदी तक लगभग डेढ़ सौ मीटर की ढलान थी। कुछ दूर तक सीढ़ियां भी बनी थी। मैं सावधानी से नीचे उतरने लगा। हम तीनों त्यागी महाराज के आश्रम से नीचे नर्मदा तट पहुंचे तो वहां देखा कि विद्यावती बहन, अनसूइया बहन, बिसेन चाची नहा कर मां नर्मदा के पूजा अर्चन में जुटी हुई है। नर्मदे हर कर हमने एक दूसरे का अभिवादन किया। अचानक विद्यावती गुप्ता बहन मेरी ओर देखते हुए भावुक होकर कहने लगी-नन्हा बेटा तुम लोगों के साथ यहां नर्मदा परिक्रमा आने का संजोग लगा है।

मुझे कितनी खुशी हो रही है मैं बता नहीं सकती? बहुत साल पहले तुम्हारा भाई अन्ना हमें अपनी कमांडर जीप में लेकर नासिक कुंभ का दर्शन कराने ले गया था। तुम्हारी मां तुम्हारे पिताजी, बिसेन चाचा बिसेन चाची मैं सब साथ थे। तुम्हारी मम्मी बहुत अच्छी थी मुझे बहुत चाहती थी। सुबह सवेरे नर्मदा तट पर विद्या बहन के श्री मुख से मां का स्मरण मुझे रोमांचित कर गया। मैं विद्यावति बहन की ओर देखता रहा। देखा वे भावुकता के चरममें थी। मैं काफी देर तक नर्मदा तट पर रेत में टहलता रहा। तब तक मैंकला बेटी नदी में जल क्रीड़ा करती रही और निरुपमा बार-बार उसे डांट रही थी।

यहां पिपरिया में नर्मदा का बड़ा चौड़ा पाट है परंतु कहीं पर भी पानी घुटने से ज्यादा नहीं है इसलिए जिन्हें नदी में नहाने का अवसर कम मिलता है वह ऐसी जगह ज्यादा देर तक नहाना पसंद करते हैं। डूबने का भय जो नहीं रहता। निरुपमा और मैंकला के स्नान के बाद मैं भी चटपट स्नान कर बाहर आ गया और “नमो नमो रेवा महारानी, नमो नमो जय शक्ति सहानी, आदि शक्ति जगदंबा भवानी, कर्म कृपा मम सेवक जानी”का जोर-जोर से नर्मदा तट पर चालीसा का पाठ करने लगा। तब तक सूर्योदय हो चुका था और हम स्नान ध्यान करके त्यागी महाराज के आश्रम पहुंच गए।

त्यागी महाराज के आश्रम में चाय की घंटी बज चुकी थी। वहां एक आश्रम के कार्यकर्ता ने कहा भैया चाय पी लीजिए। हमने चाय पी और आश्रम के इधर-उधर विचरण करते हुए आश्रम के सौंदर्य का अवलोकन करने लगे। कुछ फोटोग्राफी भी की परंतु मोबाइल की बैटरी डाउन होने के कारण ज्यादा फोटोग्राफी नहीं कर सके।

नर्मदा तट पर बनी त्यागी महाराज की यह कुटिया लगभग डेढ़ सौ साल पुरानी है। आश्रम के ठीक बगल में त्यागी महाराज की समाधि लगी हुई है जिसमें वर्ष 1908 प्रेम दास महाराज अंकित है। यही प्रेम दास महाराज त्यागी महाराज कहलाए। वर्तमान में त्यागी महाराज का आश्रम उनके शिष्य लखन दास महाराज देख रहे हैं जो स्वभाव से अत्यंत सरल, धार्मिक , दयालु है। आश्रम में आधुनिक निर्माण बिल्कुल भी नहीं हुआ है। आश्रम खपरैल युक्त है तथा आश्रम के ज्यादातर कमरों में आश्रम की गायों के लिए भूसा चारा रखा हुआ है। आश्रम के आंगन में बरगद का पेड़ स्थित है जिसे त्यागी महाराज ने ही रोपा था।

आश्रम के छोर में नर्मदा तट पर सुंदर यज्ञशाला शोभायमान थी। इतना सुंदर आश्रम नर्मदा तट पर त्यागी महाराज की कठिन तपस्या का फल था जहां परिक्रमा वासियों को अन्न सेवा, आश्रय देने के साथ गौ सेवा भी निरंतर जारी है। हम कुछ देर बाबा लखन दास के पास बैठे रहे और उन्हें जानकारी दी कि अभी हम कुछ देर में आगे निकल जाएंगे। बाबा कहने लगे आज रुको, भंडारा होना है। विदा लेने की मुद्रा में हम ने जवाब दिया बाबाजी आगे फिर कभी माता चाहेंगी तो इस आश्रम में जरूर आएंगे। बाबा ने कहा जो भी जरूरत का सामान चाहिए यहां से ले लो। हमने हाथ जोड़कर कहा नहीं बाबा जरूरत नहीं है अभी कुछ सामान की। अच्छा एक बार और चाय पी लो, क्ह कर रहे अपने शिष्य को फिर से चाय पिलाने को आदेशित कर दिया। परिक्रमा वासी सदस्य स्नान ध्यान से आते जा रहे थे और उन्हें आश्रम के शिष्य चाय देते जा रहे थे।

कुछ देर बाद मैंने एवं तिवारी ने बाबा लखन दास का चरण स्पर्श कर जाने की आज्ञा मांगी।त्यागी महाराज के आश्रम से विदा ले कर हम नर्मदे हर के जयघोष के साथ आगे बढ़ गए। हम अपने मन मस्तिष्क में त्यागी महाराज के आश्रम की कभी ना मिटने वाली छाप लेकर जा रहे थे। धन्य है तपोभूमि नर्मदा तट के साधु सन्यासी जिनकी अपनी त्याग और तपस्या से बने आश्रम परिक्रमा वासियों के आश्रय स्थल बने हुए हैं।

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