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आज की शिक्षा और विद्याध्ययन में अंतर व दोनों का महत्त्व ….

आज की शिक्षा को सामने रखती हूँ तो शिक्षा व विद्या में अंतर कर पा रही हूँ। मनुष्य को सुयोग्य बनाने के लिए उसके मस्तिष्क को दो प्रकार से उन्नत किया जाता है- (१) शिक्षा द्वारा, (२) विद्या द्वारा शिक्षा के अन्तर्गत वे सब बातें आती हैं, जो स्कूलों में, कालेजों में, ट्रेनिंग कैम्पों में, हाट बाजारों में, घर में दुकान में समाज में सिखाई जाती हैं।

गणित, भूगोल, इतिहास, भाषा, शिल्प, व्यायाम, रसायन, चिकित्सा, निर्माण व्यापार कृषि संगीत, कला आदि बातें सीखकर मनुष्य व्यवहार कुशल, चतुर, कमाऊ, लोकप्रिय एवं शक्ति सम्पन्न बनता है। आज पैसे को ही सर्वोपरि माना जाने लगा है उसी को साथ रेख आज सभी उसी के प्रवाह में कार्यशील भी हैं। विद्या द्वारा मनोभूमि का निर्माण होता है।

मनुष्य की इच्छा, भावना, श्रद्धा, मान्यता, रुचि एवं आदतों को अच्छे ढाँचे में ढालना विद्या का काम है। चौरासी लाख योनियों में घूमते हुए आने के कारण पिछले पाशविक संस्कारों से मन भरा रहता है, उनका संशोधन करना विद्या का काम है। विद्या मनुष्य को सही जीने की कला सिखाती हैं।यदि मनुष्य इससे वञ्चित रह जाये तो फिर उसका जीवन अविकसित, अनुपयोगी और अपने तथा समाज के लिए भार स्वरूप बन जाता है।

शिक्षक शिक्षा देता है। शिक्षा का अर्थ है- सांसारिक ज्ञान विद्या का अर्थ है- मनोभूमि की सुव्यवस्था। शिक्षा आवश्यक है, पर विद्या उससे भी अधिक आवश्यक है। शिक्षा बढ़नी चाहिए, पर विद्या का विस्तार उससे भी अधिक होना चाहिए अन्यथा दूषित मनोभूमि रहते हुए यदि सांसारिक सामर्थ्य बढ़ी, तो उसका परिणाम भयंकर होगा।

धन की, चतुरता की, विज्ञान की इन दिनों बहुत उन्नति हुई है; पर यह स्पष्ट है कि उन्नति के साथ-साथ हम सर्वनाश की ओर ही बढ़ रहे हैं। कम साधन होते हुए भी, विद्वान् मनुष्य सुखी रह सकता है, परन्तु केवल बौद्धिक या सांसारिक शक्तियाँ होने पर दूषित मनोभूमि का मनुष्य अपने लिये तथा दूसरों के लिए केवल विपत्ति, चिन्ता, कठिनाई, क्लेश एवं बुराई ही उत्पन्न कर सकता है। इसलिए विद्या पर उतना ही नहीं, बल्कि उससे भी अधिक जोर दिया जाना चाहिए, जितना कि शिक्षा पर दिया जाता है।

आज हम अपने बालकों को ग्रेजुएट बना देने के लिए ढेरों पैसा खर्च करते हैं, पर उनकी आन्तरिक भूमिका को सुव्यवस्थित करने की शिक्षा का कोई प्रबन्ध नहीं करते। फलस्वरूप शिक्षा प्राप्त कर लेने के बाद भी वे बालक अपने प्रति, अपने परिवार के प्रति कोई आदर्श व्यवहार नहीं कर पाते। किसी भी ओर उनकी प्रगति ऐसी नहीं होती, जो प्रसन्नतादायक हो। शिक्षा के साथ उनमें जो अनेक दुर्गुण आ जाते हैं, उन दुर्गुणों में ही उनकी योग्यता द्वारा होने वाली कमाई बर्बाद होती रहती है।

इस तथ्य को हमारे पूर्वज जानते थे कि शिक्षा से भी, विद्या का महत्त्व अधिक है। इसलिए वे छोटी सी आयु में अपने बच्चों को गुरु का नियन्त्रण स्थापित करा देते थे। गुरु लोग अपने गम्भीर ज्ञान, विशाल अनुभव, सूक्ष्मदर्शी विवेक और उज्ज्वल चरित्र द्वारा शिष्य को प्रभावित करके उनकी मनोभूमि का निर्माण करते थे। अपनी प्रचण्ड शक्ति-किरणों द्वारा उसके अन्त:करण में ऐसे बीज अंकुरित कर देते थे, जो फलने-फूलने पर उस व्यक्ति को महापुरुष सिद्ध करें ।

 

©डॉ मंजु सैनी, गाज़ियाबाद                                             

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