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महायोगी गोविंद भागवत पाद की गुफा नर्मदा तट पर नर्सिंगपुर जिले में …

नर्मदा परिक्रमा भाग -28

अक्षय नामदेव। बरमान घाट से जब हम निकले तो शाम होने लगी थी पर अभी अंधेरा होने में काफी देर थी। हमने निकलते समय तय किया कि हम सीधे जबलपुर भेड़ाघाट जाकर रुकेंगे भले ही आज रात के 8 क्यों ना बज जाएं। लगभग 1 घंटे चलने के बाद हम नरसिंहपुर जिले के ही मुख्य मार्ग स्थित डोंगरगांव में सड़क किनारे एक गुमटी में चाय पीने के लिए रुके, तब तक शाम के लगभग 5:30 बज चुके थे। चाय इतनी अच्छी थी कि हमने दोबारा चाय बनवा कर पी। चाय पीते पीते मैंने और तिवारी ने आपस में विमर्श किया कि रात्रि में जबलपुर पहुंचकर रुकने के लिए स्थान ढूंढना ठीक नहीं होगा। इसलिए क्यों ना यहीं कहीं नर्मदा तट पर विश्राम किया जाए तथा सुबह स्नान ध्यान कर जबलपुर पहुंचा जाए। हमने चाय वाले से पूछा, यहां से नर्मदा तट कितनी दूर है। उसने कहा करीब 5 किलोमीटर। तब मैंने उससे पूछा वहां घाट पर कोई रुकने का स्थान है क्या? क्या वहां खाना बनाने की व्यवस्था हो जाएगी? उसने कुछ सोच कर जवाब दिया-यहां रुकने की बजाय आप सीधे गुरु गुफा हीरापुर चले जाएं। शंकराचार्य का गुरु स्थान है। उसने बताया कि मुख्य मार्ग पर 7 किलोमीटर सीधे जाने पर एक गुरु गुफा का बोर्ड मिलेगा। वहां से दाहिने वन मार्ग में जाने पर गुरु गुफा का स्थान है। वहां आपके रुकने खाने सब की अच्छी व्यवस्था हो जाएगी।

गुरु गुफा आश्रम नर्मदा तट पर स्थित है इसे शंकराचार्य घाट आश्रम भी कहा जाता है। महायोगी गोविंद भागवतपाद की तपोभूमि गुरु गुफा है। लगभग 1 फीट का प्रवेश द्वार वाली गुफा में 20 फीट नीचे जमीन पर 107 फीट चलने पर 120 वर्ग फीट का साधना कक्ष है। जिसमें महायोगी गोविंद भगवत पाद ने तपस्या की थी। केरल में जन्मे शंकराचार्य 8 वर्ष की उम्र में जब गुरु और ज्ञान की खोज में निकले तो मध्यप्रदेश के नरसिंहपुर जिले में नर्मदा तट पर धूमगढ़ सांकलघाट में आकर उनकी खोज पूरी हुई और उन्होंने यहां गोविंद भगवत पाद से गुरु दीक्षा ली। नर्मदा तट पर स्थित यह गुरु गुफा विश्व पटल के मानचित्र पर अध्यात्म का बड़ा केंद्र है।

चाय वाले के बताए अनुसार हम मुख्य मार्ग छोड़कर वन मार्ग में गुरु गुफा की खोज में जा रहे थे। रात्रि के लगभग 8 बज चुके थे। घने जंगल में घुमावदार, उतार-चढ़ाव वाले पहाड़ी मार्ग में रास्ता ठीक समझ नहीं आ रहा था। बीच रास्ते में अनेक रास्ते कटे होने के कारण हम ऐसी जगह पर पहुंचे जहां सामने नर्मदा नदी बह रही थी तथा नदी के उस पार बिजली की चकाचौंध से जगमगाता गुरु गुफा आश्रम। रात में वहां की भौगोलिक बनावट समझने में हमें परेशानी हो रही थी। अन्य कोई मार्ग नहीं आश्रम पहुंचने के लिए यह हमें सूझ नहीं रहा था कि हम आश्रम कैसे पहुंचे? क्या हमें नर्मदा को लांघ कर उस आश्रम में पहुंचना पड़ेगा? इस भ्रम के कारण हम जिस मार्ग से आए थे उसी मार्ग में लौटने लगे तभी मार्ग में एक संकेतक देखा जिसमें लिखा था हीरापुर 6 किलोमीटर। अब हम हीरापुर की ओर जाने लगे इस बात का ध्यान रखते हुए कि कहीं नर्मदा को ना लांघ जाएं।

हम हीरापुर गांव की ओर बढ़ ही रहे थे कि गांव के बाहरी किनारे पर एक गुमटी नुमा झोपड़ी दिखी जिसमें एक बल्ब की रोशनी थी। वह झोपड़ी चारों ओर से खुली थी। जिसमें गांव के हिसाब से जरूरत का कुछ किराना सामान, बीड़ी माचिस, आलू एवं टमाटर वगैरा बेचने के लिए था। हमने गाड़ी खड़ी कर आवाज लगाकर पूछा भैया हम परिक्रमा वासी हैं। मार्ग भटक गए हैं। हम गुरु गुफा जाना चाहते थे पर जा नहीं पाए भटक गए। आप हमें गुरु गुफा तक पहुंचा सकते हैं क्या?

झोपड़ी से आवाज आई,, आओ चाय पी लो। वहां तीन चार युवक भी बैठे थे। हम नीचे उतरे और कहा चाय नहीं पीना है भाई गुरु गुफा जाना चाहते हैं। परिक्रमा वासी हैं आज वहीं विश्राम करेंगे। हमने उन्हें बताया कि जंगल में टेढ़े मेढ़े रास्ते में भटक गए और सामने नर्मदा बह रही थी और आश्रम था पर जाने का रास्ता नहीं सूझ रहा। दुकानदार ने कहा कुछ देर रुक जाओ मैं आपको वहां तक छोड़ दूंगा। मैंने यह सोच कर कि वहां जाकर खाना वगैरह बनाना पड़ेगा दुकानदार से आलू और टमाटर खरीद लिए। पूछने पर दुकानदार ने अपना नाम कुन्नूलाल बर्मन बताया। वह अपनी पत्नी और अपने नाती के साथ हीरापुर जाने के इस मार्ग में किनारे एकांत में इस झोपड़ी में रहता है। झोपड़ी भले ही सड़क में है पर एकदम जंगल से सटी है। झोपड़ी के सामने सिद्ध बाबा की पहाड़ी भी है।

थोड़ी देर बाद कुन्नूलाल ने कहा कि गुरु गुफा सुबह चले जाना। अभी रात हो गई है। पता नहीं आश्रम में गेट खोलते हैं या नहीं? आज यहीं रुक जाइए। आज यही दाल बाटी का प्रसाद हो जाए। कुन्नूलाल भाई की आग्रह पूर्ण सलाह टालने योग्य नहीं थी! मैंने तिवारी एवं निरुपमा से पूछा क्या यह ठीक रहेगा? दोनों ने कोई आपत्ति नहीं जताई। आखिर पूरी बात तो वे भी सुन रहे थे।

अब हम कुन्नूलाल की झोपड़ी के सामने डेरा डाल दिए। सड़क किनारे की झोपड़ी के बाहर वहां एक बड़ी चटाई पहले से बिछी थी। हमने अपनी दो चटाईयां और लाकर बिछा दी। हम सभी बैठ गए। कुन्नूलाल ने इशारे ही इशारे में दो लड़कों को गांव से कुछ सामान लाने को कहा। लड़कों को गांव जाते देख मैं खड़ा हुआ और किनारे जाकर उन्हें कुछ द्रव्य देने की चेष्टा की। वे ना ना करने लगे मगर मैंने बड़ा भाई बनकर उनके जेब में द्रव्य डाल दिया, कहा बड़े भाई की बात नहीं टालते। लड़के मोटरसाइकिल से सामान लेने चले गए और कुछ देर बाद ही वे आटा, घी, दाल, एक बोरी कंडा इत्यादि लेकर वापस आ गए।

इस बीच निरुपमा ने कुन्नू लाल से कहा भैया आज शाम नर्मदा नदी में दीपदान नहीं किया है। क्या नर्मदा नदी यहां से काफी दूर है? कुन्नूलाल ने कहा-पास में ही है हमारे गांव के किनारे। यहां नर्मदा नदी में आकर हिरन नदी मिली है। चलिए आपको मैं संगम लेकर चलता हूं। अब हम नर्मदा नदी एवं हिरण नदी के संगम जाने लगे। समय रात्रि के लगभग 9 बजे। मैकला ऊंघ रही थी इसलिए उसे झोपड़ी में ही सोने रहने दिया तथा मैं कुनूलाल भैया, तिवारी एवं निरुपमा संगम दीपदान करने चले गए। कुन्नू लाल भैया जाते जाते भाभी को कंडा जोड़कर आग जलाने को कह दिया था तथा एक युवक को आटा तैयार रखने को कह दिया। ऊंचे नीचे रास्ते से होकर हम हीरापुर गांव पार कर गांव के एकदम किनारे हिरण नदी एवं नर्मदा नदी के संगम पहुंच गए। होली के तीसरे दिन भी चंद्रमा पूरी सफेदी लिए चमक रहा था तथा उसकी सफेदी से संगम स्थल आलोकित हो रहा था। दुर्गम निर्जन स्थान होने के बावजूद भी हम बिल्कुल निर्भय थे और संगम तट पर बैठ गए। निरुपमा दीपदान करने लगी।

कुन्नूलाल भैया बताने लगे-भैया संगम के दक्षिण तट पर जबलपुर जिले का पहला गांव जोगीपुर है तथा उत्तर तट में हमारा गांव हीरापुर नरसिंहपुर जिले का आखिरी गांव है। हमारा गांव बड़ा ऐतिहासिक ग्राम है यहां के राजा हृदय शाह लोधी थे। उनका 10 मन का टोप और और 12 मन का कोट तथा 40 किलो का तोप हुआ करता था। सन 1842 से 1857 तक अंग्रेजों के खिलाफ हुई क्रांति में उन्होंने अंग्रेजों से टक्कर ली थी। 1884 गांव की मालगुजारी हृदय शाह की थी। हृदय शाह के भाई राजकुमार पुरंदर सिंह के पास 10 हाथियों का बल था। कुन्नूलाल ने हमें बताया कि जो लड़के आपकी सेवा में हैं वे सब उसी राज परिवार के हैं। इस राज परिवार ने अंग्रेजों से टक्कर लिया परंतु इनके परिजनों के साथ न्याय नहीं हुआ। जीने खाने तक के लिए जमीन नहीं छोड़ी गई जबकि अंग्रेजों की गुलामी करने वाले अनेक राजपरिवार आज हजारों एकड़ जमीन के मालिक बने बैठे हैं। हम कुन्नूलाल भैया का धाराप्रवाह बातचीत ध्यान से सुनते रहे। संगम में दीपदान करने के बाद हमने कुछ खाली बोतलों में जल भी भर लिया और वापस आ गए।

जब हम वापस कुन्नु लाल भैया की झोपड़ी में पहुंचे तो वहां दाल बाटी की ज्यादातर तैयारी हो चुकी थी। भाभी ने दाल अंदर चूल्हे में चढ़ा दिया था तथा आटे की बड़ी-बड़ी लोई बनकर तैयार थी जिसमें उन्होंने अजवाइन भी मिला दिया था। संगम जाते समय निरुपमा ने अजवाइन एवं अन्य जरूरी सामान निकाल कर भाभी को दे दिए थे।  और टमाटर भी भूंज दिए गए थे।

हम आकर वहीं बैठ गए और हमारी चर्चा आगे बढ़ने लगी। कुनू लाल भैया ने दाल बाटी बनाने में सहयोग करने वाले सूरजभान, गोलू भाई, अरविंद एवं आदेश सेन से हमारा परिचय कराया। सूरजभान ने बातों ही बातों में कहा-भाई साहब नर्मदा तट पर परिक्रमा वासियों की सेवा करना हमारा धर्म हैं तथा पूर्वजों से यह सेवा चलती आ रही है। सब बारी-बारी से अपनी बात कह रहे थे। कुन्नूलाल भैया ने बताया कि पहले वह संगम के पास ही अपनी दुकान रखता था पास ही उसका घर भी है परंतु उसे भीड़ भाड़ वाली जगह पसंद नहीं। एकांतवास अच्छा लगता है। उसने यह भी बताया कि इस गांव में ट्रैक्टर का पंचर बनाने का काम सिर्फ वह जानता है इसलिए किनारे होने के बावजूद भी लोग उसके पास पहुंच जाते हैं जिससे उसकी रोजी मजदूरी पर्याप्त निकल जाती है। घर में दो लड़के अपना काम संभालते हैं मै नाती को लेकर यहां पत्नी के साथ रहता हूं। इस बीच भाभी ने जानकारी दी कि झोपड़ी में दो बड़े-बड़े बिच्छू निकल आए हैं। अब कुन्नू लाल उन बिच्छूओं को भगाने चले गए। भगाने के बाद जाकर सामने सिद्ध बाबा की पहाड़ी में एक नारियल रख आए। कहा- झोपड़ी में मेहमान आए हैं। भोलेनाथ ध्यान रखो। सिद्ध बाबा ने कुन्नू लाल भैया की बात सुन ली।

अब दाल बाटी एवं भरता बनकर तैयार था। पूरी एक टोकरी भर बाटी बनी हुई थी। बाटी को घी में डुबाने की जवाबदारी निरुपमा को दी गई। दाल बाटी बनते बनते दो तीन ग्रामीण आकर सत्संग में शामिल हो गए थे। हमारे पास दोना पत्तल था। सब की पत्तल में बाटी एवं भरता तथा दोने में दाल भरकर परोस दी गई। भाभी ने चावल भी बना दिया था। दाल बाटी भरता एवं चावल। हम सब ने जी भर खाया तथा रात लगभग 12 बजे तक हम चर्चा करते हुए सोने का प्रयास करने लगे। खुले आसमान में कुन्नूलाल भैया की झोपड़ी के सामने महलों का सुख भी फीका दिखाई जान पड़ रहा था। चारों तरफ से आ रही ठंडी हवा के झोंकों के बीच हमें कब नींद ने अपने आगोश में ले लिया पता ही नहीं चला। नर्मदा परिक्रमा के दौरान हिरण नदी एवं नर्मदा नदी के संगम तट बसे गांव हीरापुर की दाल बाटी, कुन्नुलाल भैया एवं भाभी का प्रेम, एवं राज परिवार के उन युवकों का सेवा भाव अविस्मरणीय रहेगा।

 

 हर हर नर्मदे

 

 क्रमशः

 

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