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आदिवासियों के हित में ऐसे विचारपरक आयोजन होते रहना चाहिए : कवासी लखमा…

रायपुर। राष्ट्रीय आदिवासी नृत्य महोत्सव 2021 के अवसर पर राजभाषा आयोग और गोंडवाना स्वदेश पत्रिका के संयुक्त तत्वावधान में ‘‘मूल निवासियों की भाषा एवं संस्कृति के विविध आयाम, आदिवासी समाज की दशा एवं दिशा’’ विषय पर आयोजित तीन दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का समापन हुआ। संगोष्ठी राजधानी रायपुर स्थित शहीद स्मारक भवन में 28 अक्टूबर से आयोजित थी। इस तीन दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का शुभारंभ मंत्री अमरजीत भगत ने किया। दूसरे दिन उद्योग और आबकारी मंत्री कवासी लखमा भी संगोष्ठी में शामिल हुए। श्री लखमा ने कहा कि ऐसे विचारपरक आयोजन हमेशा होते रहेंगे। उन्होंने गोंडवाना स्वदेश के संपादक रमेश ठाकुर को पत्रिका के निरंतन प्रकाशन के लिए बधाई और शुभकामनाएं दी। कार्यक्रम आयोजन के लिए छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग को धन्यवाद दिया। आदिवासी समाज की दशा और दिशा पर आधारित संगोष्ठी में देश के अलग-अलग राज्यों से आये बुद्धिजीवियों, विचारकों, समाजसेवियों, शोधकर्ताओं ने अपने विचार एवं शोधपत्र प्रस्तुत किए। संस्कृति मंत्री भगत ने राष्ट्रीय संगोष्ठी में आए अतिथियों का आत्मीय स्वागत किया। संगोष्ठी में मंत्री भगत के निरंतर जुड़ाव ने अतिथियों का दिल जीत लिया।

राष्ट्रीय संगोष्ठी कार्यक्रम के मुख्य अतिथि प्रो. वर्जिनियस खाखा, अध्यक्ष खाखा कमेटी न्यू दिल्ली और बिपिन जोजो ,टाटा इन्स्टीट्यूट मुंबई थे। उल्लेखनीय है कि वर्जिनियस खाखा ने आदिवासियों की दशा और दिशा पर 431 पेज की रिपोर्ट तैयार की है जिसे खाखा कमेटी रिपोर्ट कहा जाता है। ये कमेटी आदिवासियों के समस्याओं के निराकरण हेतु तैयार किया गया है। संगोष्ठी में वर्जिनियस खाखा ने कहा कि आदिवासियों की वर्तमान स्थिति को जानना है तो उनके इतिहास को समझना होगा। उन्होंने कहा कि आदिवासी एक निर्माता है, वह शिकार भी करता है पर प्रकृति और प्राकृतिक संसाधनों का अतिदोहन नहीं करता।

राष्ट्रीय आदिवासी संगोष्ठी में झारखंड से आए डॉं. मुकेश बरूआ ने कहा कि आदिवासियों के सारे अनुष्ठान दाएं से बाएं दिशा की ओर होती है जो बिल्कुल पृथ्वी का सूरज का परिक्रमा करना, भंवर का घूमना, डायनेमों की कायलिंग भी दाएं से बाएं होता है। डॉ. बरूआ का कहना था कि अगर दक्षिण दिशा की ओर से सिर रखकर सांस रोककर रहा जाए तो कोई भी जानवर मनुष्य को अपना शिकार नहीं बनाएगा। उन्होंने कहा कि 2004 के सुनामी ने जन-जीवन को काफी नुकसान पहुंचाया किंतु ऐसे विकट समय में आदिवासी सुरक्षित रहे। यदि बादल फटने की घटना भी होती है तो आदिवासियों की प्रकृति के करीब होने के चलते जीवन भी बचा रहता है। रविशंकर युनिवर्सिटी के डॉ. जितेन्द्र प्रेमी ने कहा कि आदिवासियों की जान को वास्तव रूप में किसी ने नहीं समझा। यदि आदिवासी को नहीं समझेंगे तो आने वाले समय में दुनिया को नहीं बचा सकते।

संगोष्ठी में विभिन्न प्रांतों से आए शोधार्थियों ने भी आदिवासी कला, संस्कृति और परंपरा तथा जल-जंगल-जमीन जैसे विषयों पर आधारित शोधपत्र प्रस्तुत किया। संगोष्ठी में लुप्त होती आदिवासी प्रजाति, कोरकू जनजाति, सहरिया जनजाति, राजस्थान, संथाल जनजाति, भारिया जनजाति आदि पर भी अपने-अपने तथ्यात्मक विचार रखा। संगोष्ठी के तीनों दिन के स्वरूप के बारे में छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के सचिव अनिल भतपहरी ने जानकारी दी ,कार्यक्रम का संचालन डॉ गोल्डी एम.जार्ज ने किया, आभार गोंडवाना स्वदेश के संपादक रमेश ठाकुर ने किया।

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